सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें४० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् हूणाः स्थूणा इवासन् तनयधनसुहृच्छोकसंदानदूनाः मद्राः स्वीकृत्य भद्राकरणमपि निजं त्यक्तभद्रासनास्थाः । चीना मन्दाक्षहीनाः सपदि रणमुखे दुद्रुवुर्दीनदीना म्लेच्छाः स्वेच्छाविहारं प्रणिजहुरितरे प्राप्य मूर्च्छाविरामम् ॥५२॥ पुत्र, धन और मित्र के शोक के सन्ताप से दुखी हूण स्तम्भ के समान स्तंभित हो गये । मद्र देश के लोगों ने अपने राजसिंहासनों की आस्था छोड़कर (यतियों के समान) शिरोमुण्डन स्वी- कार कर (वन की ओर प्रस्थान किया) । चीन देश के लोग अपनी छोटी-छोटी आँखों से भी हीन हो अत्यन्त दीन बन कर शीघ्र रण से भाग गये । अन्य म्लेच्छ मूर्च्छित होकर स्वेच्छा विहार से हीन हो गये ॥५२॥ जित्वैवं यवनाञ् जवेन विजयश्रीचिह्नमुर्वीपति- दुर्गं योधपुरं च मण्डपपुरस्याभ्यर्णतो निर्ममे । यस्याद्यापि विलोकनात् स्मृतपुरावृत्तास्तु तुच्छा जनाः कम्पार्ताः पतितं विदन्ति न शिरस्त्राणं पुरस्त्रासतः ॥५३॥ राजा हरिराज ने इस प्रकार उन यवनों को वेग से जीत कर अपनी विजय-लक्ष्मी का स्मारक योधपुर (जोधपुर) नामक दुर्ग मण्डपपुर के समीप बनवाया । आज भी जिस दुर्ग को देखकर प्राचीन वृत्त का स्मरण कर भय से कम्पित होने वाले तुच्छ पुरुषों को अपनी नीचे गिर जाने वाली पग- ड़ियों तक का बोध नहीं होता ॥५३॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये चतुर्थः सर्गः (५२) भद्राकरणं सर्वमण्डनम् । त्यक्ता सिंहासनेषु आस्था यैस्ते ।