सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् भूरीणि भूयिष्ठफलानि दानान्यदाद् वदान्यप्रवरः सदापि । उपस्थितायामथ कामनायामन्यैव धन्याऽजनि दानधारा ॥२०॥ दानी-शिरोमणि सिंहराज सदा ही उत्कृष्ट फल वाले विपुल दान दिया करते थे। अब पुत्र की कामना के कारण तो उनकी एक विलक्षण तथा स्तुत्य दान-परंपरा प्रारंभ हुई ॥२०॥ स भारतादिश्रवणे द्विजेन्द्रान् सभारतान् सन्ततमाश्रितोऽपि । सन्तानकादप्यधिकं दुरापं सन्तानकामो मनुते स्म कामम् ॥२१॥ सदा महाभारत आदि पुण्य ग्रन्थों के श्रवण के समय सभारत ब्राह्मण-श्रेष्ठों का आश्रय लेने पर भी, पुत्र की कामना वाले सिंहराज ने अपनी इच्छा को कल्पवृक्ष से भी अधिक दुष्प्राप्य माना ॥२१॥ बोधिद्रुमं बुद्धिमती कथञ्चित् परोत्य पारिप्लवलोचना सा । रूक्षत्वचं वक्षसि योजयन्ती कदर्थनं स्वार्थवशाद् विषेहे ॥२२॥ बुद्धिमती मनोरमा ने, डबडबाई आँखों से पीपल के पेड़ की परिक्रमा करके, पुत्र की कामना के कारण किसी प्रकार उसकी रूखी छाल को वक्षःस्थल पर धारण करने का कष्ट सहा ॥२२॥ वैद्यैः सुविद्यैर्यशसानवद्यैः सिद्धौ प्रसिद्धैरपि शुद्धवृत्तैः । प्रसाधितां सन्ततिमौषधानां सा सन्ततं सन्ततये सिषेवे ॥२३॥ शुद्ध आचरण वाले, अनवद्य यश वाले, सिद्धि में प्रसिद्ध, विद्वान् वैद्यों द्वारा तैयार की गईं नाना प्रकार की ओषधियों का मनोरमा ने सन्तानार्थ निरन्तर सेवन किया ॥२३॥ एवंविधैस्तैर्विविधैरुपायैः प्रयासभाजोप्यवनीभुजोऽस्य । मनोरथे नाऽभवदङ्कुरोऽपि चिरन्तने बीज इवोषरोप्ते ॥२४॥ उपर्युक्त प्रकार के और इनसे भी विविध प्रकार के उपायों द्वारा पुत्रप्राप्ति की इच्छा को पूर्ण करने का प्रयास करने वाले सिंहराज के मनोरथ में, ऊसर भूमि में बोये गये पुराने बीज के समान, ज़रा भी अंकुर नहीं उगा ॥२४॥ सोऽचिन्तयत् सञ्चितपुण्यकर्मा मर्माविधं वीक्ष्य विधेर्विधित्साम् । मनीषिते स्वे नितरान्निराशः प्रियाकरिष्यन् निजपूर्वजानाम् ॥२५॥ संचित पुण्य वाले और पूर्वजों को प्रसन्न करने की इच्छा रखने वाले सिंहराज ने विधि के विधान को मर्मस्पर्शी और विपरीत जानकर अपनी इच्छा की पूर्ति में बिलकुल निराश होकर इस प्रकार विचार किया—॥२५॥ श्रद्धानुबद्धान्यपि वैदिकानि केनापि नाङ्गेन वियोजितानि । कर्माणि हन्त स्वफले पराञ्चि को वेद भावं भवितव्यतायाः ॥२६॥ अत्यन्त श्रद्धा के साथ सांगोपाङ्गतया विधिपूर्वक किये गये वैदिक यज्ञादिक कर्म भी जब अपना फल देने में विमुख हो रहे हैं तो भवितव्यता को कौन जान सकता है ? ॥ २६॥ (२१) सन्तानकात् कल्पद्रुमात् । (२५) प्रियाकरिष्यन् प्रियं विधित्सुरित्यर्थः ।