सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः ४३ अनङ्गसर्वस्वमथाङ्गमङ्गं तारुण्यसारं तरलायताक्षी । सा बिभ्रती विभ्रमकौशलेन विशां पतिं तं वशमानिनाय ॥१३॥ चञ्चल और विशाल नेत्रों वाली मनोरमाने, जिनका प्रत्येक अंग मानों यौवन का सार और कामदेव का सर्वस्व था, अपने हाव-भाव के कौशल द्वारा सिंहराज को वश में कर लिया ॥ १३ ॥ तयोस्तथान्योन्यमनोऽनुवृत्तौ सदानुकूलव्यवसायभाजोः । निशीथिनीभिः कियतीभिरेव जगाम काष्ठां प्रणयानुबन्धः ॥१४॥ सदा एक दूसरे की इच्छा के अनुकूल व्यवहार करने वाले उन दम्पत्ति का प्रेम कुछ रात्रियों में ही पराकाष्ठा पर पहुँच गया ॥१४॥ तस्याः प्ररूढेन स सौहृदेन सन्दानितान्तःकरणः सदैव । अमन्यत स्वं खलु सापराधं छायावलोकेऽप्यपराङ्गनायाः ॥१५॥ मनोरमा ने अपने सुदृढ़ प्रेम-पाश से सिंहराज के मन को इतना बन्दी बना लिया कि वे किसी दूसरी स्त्री की छाया तक देखने में स्वंयं को अपराधी समझने लगे थे ॥१५॥ समृद्धराज्यो बहुभार्यतायां राजोचितायामपि सिंहराजः । वितीर्यमाणा अपि वीतदोषा नाङ्गीकरोति स्म नरेन्द्रकन्याः ॥१६॥ समृद्ध साम्राज्य के अधिपति सिंहराज ने, अनेक रानियाँ रखना राजाओं की प्रथा के अनुकूल होत हुये भी, अन्य राजाओं द्वारा आग्रहपूर्वक दी जाने वाली दोषरहित राजकुमारियों को भी स्वीकार नहीं किया ॥१६॥ प्रतीक्षमाणः सुतमात्मतुल्यं मनोरमायां मनुजाधिनाथः । पराङ्मुखः सोऽन्यपरिग्रहेषु समाहितात्मा समयं निनाय ॥१७॥ अन्य राजकन्याओं के पाणिग्रहण में विरक्त जितेन्द्रिय सिंहराज मनोरमा के गर्भ में (रूप, गुण, शील आदि में) अपने तुल्य पुत्र के आने की प्रतीक्षा करते हुये समय व्यतीत करने लगे ॥१७॥ उपासितारौ सततं सुतार्थे तत्रोपयुक्तान्यथ दैवतानि । तौ दम्पती संप्रयतौ प्रयत्नात् पृथग्विधान्याददतुर्व्रतानि ॥१८॥ पुत्र की कामना के लिये विविध देवताओं की पूजा करने वाले उन सावधान और वशी दम्पती ने बड़े प्रयत्न से भिन्न भिन्न व्रत स्वीकार किये ॥१८॥ ऋत्विग्भिरभ्यस्तसमस्ततन्त्रैः सदागमाऽऽसादितसिद्धमन्त्रैः । अप्रीणयत् पुत्रदपुण्यलिप्सुः सप्तार्चिषं सोऽर्पितसम्यगृद्धिः ॥१९॥ सम्पूर्ण तन्त्रों का अभ्यास करने वाले एवं श्रेष्ठ आगमों के सिद्धि दायक मंत्रों को सिद्ध करने वाले श्रोत्रिय ब्राह्मणों द्वारा सम्पादित पुत्रेष्टि यज्ञ में पुत्र देनेवाले पुण्य को प्राप्त करने की इच्छा वाले तथा ब्राह्मणों को समृद्धि दने वाले राजा सिंहराज ने यज्ञ की अग्नि को उत्कृष्ट हव्य पदार्थों द्वारा प्रसन्न किया ॥१९॥ (१५) सन्दानितं निगडितं अन्तःकरणं यस्य सः ।