सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
द्वितीयः सर्गः १९ इतरोऽपि तदन्वयोद्भवोऽजयपालः स कथं न गण्यताम् ! उपपुष्करमन्यदुष्करं निरमाद् योऽजयमेरुदुर्गकम् ॥५६॥ हाँ, उनके वंश में जो अजयपाल हुए उनकी गिनती भी क्यों न की जाय ? क्योंकि उन्होंने पुष्कर तीर्थ के समीप अन्य लोगों के लिये दुष्कर अजयमेरु (अजमेर) दुर्ग का निर्माण किया ॥५६॥ श्रमविक्रमनीतिरीतिभिस्त्वमसाधारणमर्जयन् यशः । भवितासि भुवि प्रतिष्ठितो ध्रुवमाकल्पमनल्पपौरुषः ॥५७॥ महापौरुषवान् आप पराक्रम और राजनीति की रीतियों से असाधारण यश प्राप्त करके प्रलय-काल तक इस संसार में निश्चित ही प्रतिष्ठित हो जायेंगे ॥ ५७ ॥ मतिमानतिमानुषं यशः पदवीं वा प्रतिपित्सुरुच्छ्रिताम् । तपसा जपसाधनेन वा वरिवस्येद् विधिनेष्टदेवताम् ॥५८॥ जो बुद्धिमान् अतिमानुष यश अथवा अलौकिक पद प्राप्त करना चाहता है उसे चाहिए कि विधिपूर्वक तप और जप के साधन से इष्ट देवता को प्रसन्न करे ॥ ५८ ॥ अखण्डब्रह्माण्डं सहचरितगाण्डीववलयः स्वदोर्दण्डेनैव प्रसभमपहर्तुं प्रभुरपि । समाराध्य श्रद्धासमुचिततपोभिः पशुपतिं प्रपेदे रौद्रास्त्रं स किल नरनामा नरहरिः ॥५९॥ मनुष्यों में श्रेष्ठ अर्जुन, जिनका दूसरा नाम 'नर' भी था, सदा साथ रहनेवाला गाण्डीव धनुष ही जिनका वलय था, और जो अपने भुज-दण्ड के पराक्रम से सारे ब्रह्माण्ड को हठात् वश में करने में समर्थ थे, उन्होंने भी पूर्ण श्रद्धा के साथ उचित तपस्या करके भगवान् शंकर को प्रसन्न किया और उनसे रौद्रास्त्र प्राप्त किया। ॥ ५९ ॥ त्वमप्येवं देवं कमपि सुखसेवं परतरं भजञ्छ्रद्धा श्रद्धाधिकतरविशुद्धाशयतया । अरण्ये पुण्ये वा क्वचन पशुशून्येऽपि विषये ध्रुवां सिद्धिं विद्धि प्रगुणितसमृद्धिं करगताम् ॥६०॥ आप भी अब किसी पवित्र वन में या किसी प्राणि-शून्य निर्जन स्थान में पूर्ण श्रद्धा से अपने हृदय को विशुद्ध करके किसी परात्पर, सुख से सेवा किये जाने योग्य, आशुतोष देवता का भजन करें और निश्चय ही प्रगुणित समृद्धि से युक्त सिद्धि को अपनी मुट्ठी में आई हुई समझें ॥ ६० ॥ शुम्भाऽसुरप्रशमनी सकलार्थदात्री शाकम्भरी जनपदे भवति प्रतीता । आराधयन्नभिमतां परदेवतां तां वीतान्तरायमवधारय सिद्धमर्थम् ॥६१॥ शुम्भ दैत्य को मारने वाली, सम्पूर्ण सिद्धियों को देनेवाली, भगवती इस देश में (साँभर में) शाकंभरी के नाम से प्रसिद्ध है। इन परमपूज्य परदेवता भगवती की आराधना करके आप विघ्नों को नष्ट और अर्थ को सिद्ध समझें ॥ ६१ ॥
२० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इति गिरमनुरूपां नीतिसौहार्दरीत्योः सुनयमुखसमुत्थां सोपि सम्यग्विचार्य । नरपतिरतिभूमिं प्राप्तया मोदलक्ष्म्या विकसितवदनश्रीरादरादभ्यनन्दत् ॥६२॥ चरम सीमा को प्राप्त हुई प्रसन्नता के कारण विकसित हुईं मुख की शोभा से युक्त राजा विश्वपति ने सुनय के मुख से निकले हुए नीति और मित्रता की रीति के अनुकूल वचनों को अच्छी तरह सोच समझ कर बड़े आदर के साथ उनका अभिनन्दन किया ॥ ६२ ॥ अथ सुनयसहायः सम्यगह्नि प्रसन्नः परिणतसचिवेषु स्वां धुरं सन्निवेश्य । गिरिविपिनविहारव्याजतो राजवर्यः परिमितपरिवारः प्रौढसारः प्रतस्थे ॥६३॥ इसके बाद विनम्र मन्त्रियों पर अपने राज्य का भार छोड़कर, सुनय के साथ एक दिन शुभ मुहूर्त में बलवान् और प्रसन्न राजा विश्वपति ने इने-गिने लोगों को साथ लेकर वनों और पर्वतों में विहार करने के बहाने (शाकंभरी देवी के मन्दिर की ओर) प्रस्थान किया ॥ ६३ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये द्वितीयः सर्गः
तृतीयः सर्गः पुरस्कृतः पार्श्वचरैरथाल्पैः प्रजेश्वरः पुष्परथाधिरूढः । प्रसन्नचेता दिवसे प्रशस्ते द्विजैः कृतस्वस्त्ययनः प्रतस्थे ॥ १ ॥ उस शुभ दिन प्रसन्नचित्त राजा विश्वपति ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवा कर, इनेगिने अनुचरों को अपने आगे करके, पुष्पों से सज्जित रथ पर आरूढ़ होकर चले ॥ १ ॥ तमन्वगान् मानवदेवमुच्चैः प्रेमानुबन्धेन वशो वयस्यः । यशो जगत्सु प्रथयिष्यमाणं राजा ऋतूनामिव कामदेवम् ॥ २ ॥ निकट भविष्य में ही विश्व में अद्वितीय यश को पर्याप्त मात्रा में फैला देने वाले उन नरपति विश्वपति के पीछे, कामदेव के पीछे ऋतुराज वसन्त के समान, दृढ़ प्रेम-पाश में बँधे हुए मित्र सुनय चल रहे थे ॥ २ ॥ तमुत्तराशां तरसा प्रयान्तं तेजःप्रकर्षं प्रतिलप्स्यमानम् । गुरोस्तनूजोऽनुजगाम धाम्नामधीशमह्नाय यथा निदाघः ॥ ३ ॥ उत्तर दिशा की ओर वेग से प्रयाण करने वाले और शीघ्र ही और भी उत्कृष्ट तेज को प्राप्त करने वाले उन तेजःपुञ्ज विश्वपति के पीछे, उत्तरायण और प्रचण्ड सूर्य के पीछे ग्रीष्म ऋतु के समान, गुरु-पुत्र सुनय चल रहे थे ॥ ३ ॥ अनुप्रयाणाय कृतानुबन्धान् निवर्त्य बन्धून् वसुधाधिनाथः । संभाव्य पौरानपि पौरकान्तः कान्तैर्वचोभिर्निरियाय पुर्याः ॥ ४ ॥ साथ चलने का प्रयत्न करनेवाले बन्धु-वर्ग को राजा ने वापस लौटा दिया। मधुर वचनों से प्रजा का सत्कार कर वै प्रजाप्रिय नरेश नगरी के बाहर चले गये ॥ ४ ॥ समश्नुवानान् स्वपरोपतापाद्वह्निप्रवेशोग्रतपःफलानि । कुम्भस्तनीभिः परिरब्धकण्ठान् संभावयामास स पूर्णकुम्भान् ॥ ५ ॥ अपने उत्कृष्ट परिपाक के लिये जो अग्नि-प्रवेश रूपी कठिन तप किया था मानों उसी का पुण्य फल भोगने वाले, घट के समान पीवर स्तन वाली कामिनियों द्वारा आलिंगित कण्ठ वाले, जल से भरे हुए, घड़ों का (शुभ शकुन होने के कारण) राजा ने स्वागत किया (अथवा कलश बँधाने की प्रथा पूर्ण की) ॥ ५ ॥ (२) प्रथयिष्यमाणं विस्तृतं करिष्यमाणम् । (४) पौरेषु पौराणां वा कान्तः मनोहरः प्रजाप्रियश्चेत्यर्थः । (५) स्वस्य यः पर उत्कृष्ट उपतापरूपः सन्तापरूपो वह्नौ प्रवेशस्तदेवोग्रं तपस्तस्य फलानि समश्नु- वानान् उपभुञ्जानान् । संभावयामास इति पदेन शुभशकुनरूपत्वादपि राज्ञस्तत्राऽऽदरातिशयो व्यञ्जितः।
२२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मालाः सिताम्भोजदलाभिरामा नृपः पताका इव कार्यसिद्धेः । प्रसारितास्ता अपि चारुदृष्टीः प्रत्यग्रहीन् मालिकनागरीणाम् ॥ ६ ॥ कार्यसिद्धि की पताका के समान शोभित होने वाली एवं मालिन स्त्रियों द्वारा पहनाई गईं श्वेत कमल दल की सुन्दर मालाओं को, उन स्त्रियों के मनोहर कटाक्षों के साथ साथ, राजा ने ग्रहण किया ॥ ६ ॥ तस्योपरिष्टात् परितः पतन्तं निवारयन्तो रविरश्मिजालम् । विनैव दण्डेन शरत्पयोदाः सितातपत्रत्वमयुस्तदानीम् ॥ ७ ॥ राजा के ऊपर चारों ओर से गिरनेवाले सूर्य की किरणों के समूह को रोक कर शरद् ऋतु के शुभ्र बादल उस समय बिना दण्ड के श्वेत छत्र के समान सुशोभित हुए ॥ ७ ॥ गन्धानुमेयानपनोतनिद्रसरोजराजीमकरन्दबिन्दून् । उपाहरन्तो मिहिरांशुतप्तं सिषेविरे तं सरसीसमीराः ॥ ८ ॥ सरोवरों के शीतल पवन, जो प्रफुल्ल कमलों की पंक्तियों के मकरन्द-बिन्दुओं से सुगन्धित थे, सूर्य की किरणों से तप्त राजा की सेवा कर रहे थे ॥ ८ ॥ पर्यन्तमासाद्य ततः पदव्या दिनैः कियद्भिः सुकृती सुखेन । पूर्वोपदिष्टं सुनयेन दूराच्छाकम्भरीदेशमपश्यदग्रे ॥ ९ ॥ पुण्यात्मा राजा कुछ दिनों में सुखपूर्वक मार्ग के अन्त तक जा पहुँचे और सुनय द्वारा पहले बताया गया सांभर देश उन्होंने दूर से अब अपने आगे देखा ॥ ९ ॥ ज्ञातस्तदाऽभ्रङ्कषया विदूराद् देव्याः पुरो हर्म्यपताकयैव । नृपाय तस्मै पुनरुक्तवाग्भिरावेदितो जानपदैः स देशः ॥१०॥ विश्वपति बहुत दूर पहले से ही शाकंभरी देवी के मन्दिर की आकाश को छूने वाली पताका को देख कर उस देश को पहचान गये थे । वहाँ पहुँचने पर जब लोगों ने उस देश का नाम बताया तो उसकी पुनरुक्ति मात्र हुई ॥ १० ॥ दृष्ट्वा जयन्तीमथ वैजयन्तीमानन्दतः स्यन्दनतोऽवरुह्य । साष्टाङ्गपातः मुहुरष्टमूर्तेः कुटुम्बिनीं विश्वपतिर्ववन्दे ॥११॥ विजय से फहराती हुई मन्दिर की पताका को पास देखकर राजा विश्वपति बड़े आनन्द से रथ से उतर गये और भगवान् शिव की अर्द्धांगिनी भगवती शाकंभरी की बार बार साष्टाङ्ग प्रणामों द्वारा वन्दना की ॥ ११ ॥ पुरोपकण्ठं प्रतिपत्स्यमानं पुरोधसा तेन समं निशम्य । प्रत्युद्ययुः पौरजनाः प्रमोदान् नृपोचितोपायनपाण्यस्तम् ॥१२॥ यह सुन कर कि पुरोहित सुनय के साथ राजा अब शीघ्र नगर के समीप पहुँच जायेंगे, वहाँ के प्रजा जन बड़ी प्रसन्नता से राजा को भेंट देने योग्य वस्तुयें हाथों में ले लेकर पहुँचे ॥ १२ ॥
तृतीयः सर्गः २३ आतिथ्यसम्भारभरां सपर्यां प्रगृह्य तेषां सुमनाः स राजा । प्रश्नैरुदारैः कुशलप्रदानैरनुग्रहो विग्रहवान् बभूव ॥१३॥ नृपोचित आतिथ्य की वस्तुओं से युक्त उन भेटों को ग्रहण कर विशाल हृदय वाले राजा ने बड़े प्रेम से उन प्रजाजनों से कुशल-प्रश्न पूछे और राजा उनके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह बन गये ॥ १३ ॥ तत्रैव बाह्योपवनेऽतिवाह्य निशीथिनीं तां शिथिलाध्वखेदः । प्राप्तः परेद्युः प्रयतान्तरात्मा पतिः प्रजानामविशत् पुरं तत् ॥१४॥ संयमी राजा विश्वपति ने नगर के बाह्य उपवन में ही वह रात बिता कर मार्ग का श्रम दूर किया और दूसरे दिन नगर में प्रवेश किया ॥ १४ ॥ स ग्रामसीम्नामवस्थितान् तान् विनायकादीन् विनयात् प्रणम्य । अपश्यदाश्चर्यतरङ्गितात्मा तरङ्गिणीरोधसि पुष्पवाटीम् ॥१५॥ गाँव की सीमा पर स्थित गणेश आदि देवताओं को सविनय प्रणाम कर, आश्चर्य से उद्वेलित [
२४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् यस्यां निनादैर्विशदच्छदानां पुंस्कोकिलानां कलकण्ठनादैः । स्पर्धाऽनुबन्धीनि विरामशून्यं विरेजिरे बर्हिणकूजितानि ॥१९॥ जहाँ हंसों और सारसों के मधुर निनाद को तथा कोकिलों के मनोहर कण्ठस्वर को सुन सुन कर मोर मानों स्पर्धा से निरन्तर कूज रहे थे ॥१९॥ यस्यां लवङ्गीमपि मल्लिकां च जातीं च रोलम्बयुवाऽवलम्ब्य । पिबन् मुहुः स्तोकतरं मरन्दं चकार तासामिव तारतम्यम् ॥२०॥ जहाँ युवा भ्रमर लवङ्गी, मल्लिका और जाति के फूलों का थोड़ा थोड़ा मकरन्द रस बार बार पीकर मानों उनके उत्कर्षापकर्ष की परीक्षा ले रहा था ॥२०॥ स्वर्नायिकाकल्पितकर्णपूरमन्दारगुत्सेन सहावतीर्णाः । यत्पुष्पवल्लीषु विलासलोलाः पुनर्न दध्युस्त्रिदिवं द्विरेफाः ॥२१॥ (भगवती के दर्शनार्थ आने वाली) स्वर्ग की देवियों के कानों में पहने गये मन्दार पुष्पों के गुच्छों के साथ-साथ उस उद्यान में उतरने वाले भ्रमर वहाँ की पुष्पवल्लियों के साथ विलास में अनुरक्त होकर फिर वापस स्वर्ग जाने का नाम नहीं लेते थे ॥२१॥ दृशोरिदम्पूर्वतया विशेषादाकर्षणों तामवलोकमानः । विशां पतिर्विस्मयविस्मृतेन नासीन् निमेषेण कृतान्तरायः ॥२२॥ उस पुष्पवाटिका की प्रत्येक वस्तु अनुपम सुन्दर होने के कारण नेत्रों को मानों 'पहले मुझे देखिये' कह कर विशेष रूप से आकर्षित कर रही थी । राजा विश्वपति अत्यन्त आश्चर्य से चकित होकर उसे निर्निमेष देखने लगे ॥२२॥ ततो भृतोत्साहभरे नरेन्द्रे निधाय दृष्टिं स निधिर्गुणानाम् । जगाद योग्यं जगदम्बिकाया विगाहमानः सुनयो वनान्तम् ॥२३॥ तब गुणनिधि सुनय ने जगदम्बा के उस उद्यान में प्रवेश किया और उत्साह से भरे हुये राजा पर दृष्टि डाल कर उस समय के योग्य इस प्रकार निवेदन किया ॥२३॥ उद्यानमेतन् मदनारिपत्न्याः सदृतुभिः षड्भिरुपास्यमानम् । निषेवमाणो विजितारिष्टकः समश्नुते षण्मुखगां समृद्धिम् ॥२४॥ कामदेव को भस्म करने वाले भगवान् शिव की अर्द्धाङ्गिनी भगवती पार्वती का यह उद्यान सदा छहों ऋतुओं (वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त और शिशिर) से सुशोभित रहता है । यहाँ रह कर छहों शत्रुओं को (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य को) जीतने वाला भगवती का भक्त देव-सेनापति स्वामी कार्तिकेय की सी दिव्य समृद्धि प्राप्त कर लेता है ॥२४॥ भृङ्गावलीझङ्कृतिसङ्कुलेन वनप्रियाणां कलकूजितेन । तिरोहितं पञ्चमगीतमस्मिन्नाकर्ण्यते किन्नरकामिनीनाम् ॥२५॥ भ्रमरों की पंक्तियों की गूंज के साथ मिश्रित कोकिलों के मधुर पञ्चम स्वर के कारण यहाँ किन्नरों की कामिनियों द्वारा पञ्चम स्वर में गाये गये गीत सुनाई नहीं देते ॥२५॥ (१९) विशदच्छदानां हंसानाम् ।
४ तृतीयः सर्गः २५ कदम्बवीथीमनुवेदिमध्यमध्यासिता व्योमसदां सुमध्याः । अस्मिन् भवानीमुपवीणयन्ति वाणीमुखादुल्लसितैः प्रबन्धैः ॥२६॥ यहाँ कदम्बों के कुञ्ज के पास बनी हुई वेदी के बीच में बैठ कर स्वर्ग की पतली कमर वाली देवियाँ स्वयं सरस्वती के मुखारविन्द से निकले हुये स्तुतिगीतों को वीणा पर बजाते हुये गाकर भगवती की आराधना किया करती हैं ॥२६॥ अस्यान्तरे सन्ततरत्नजालैर्हिरण्मयोऽसौ खचितः समन्तात् । प्रासादराजो गिरिराजपुत्र्याः पुरोऽपरो राजति रत्नसानुः ॥२७॥ इस उद्यान के बीच में वह सामने दिखाई देने वाला देवी पार्वती का भव्य मन्दिर जो सोने का बना है और जिसमें चारों ओर देदीप्यमान रत्न जड़े हैं एक दूसरे रत्नशिखर के समान शोभित हो रहा है ॥२७॥ विनिर्मितं हीरदलैरुदारैः प्रालम्बिमुक्तालतिकं समन्तात् । दण्डं महानीलमयं दधानं पश्यातपत्रं सितमद्रिपुत्र्याः ॥२८॥ चारों ओर बड़े-बड़े मोतियों से जड़ा हुआ और अमूल्य हीरों के समूहों से बना हुआ तथा महानील मणियों (नीलम) से बने हुये लम्बे दण्ड वाला भगवती पार्वती का यह श्वेत छत्र देखिये ॥२८॥ श्रियं सितच्छत्रतले दधाति दण्डो महानीलविनिर्मितोऽयम् । स्वर्भानुदन्तव्रणवर्त्मनाऽधःपतन्निवेन्दोस्तनुरेखयाङ्कः ॥२९॥ श्वेत छत्र के नीचे यह महानील मणियों (नीलम) का बना हुआ दण्ड इस प्रकार शोभित , हो रहा ह मानों राहु के दाँतों के प्रहार से चन्द्रमा के शरीर पर पड़े हुये छेद के मार्ग से चन्द्रमा के नीले धब्बे का एक बारीक लम्बा टुकड़ा आ गिरा हो ॥२९॥ अधो दधानं नवनीलदण्डं छत्रं पुरः पश्य सितांशुगौरम् । उपेन्द्रपादोपरि वर्त्तमानं स्थिरं महावर्त्तमिव द्युनद्याः ॥३०॥ देखिये सामने (हीरोंकी) शुभ्र-किरणों से जगमगाता हुआ यह श्वेत छत्र, जिसके नी' नीलम का दण्ड सुशोभित है, ऐसा लग रहा है मानों भगवान् विष्णु के (नीले) पाँव पर स्थित गंगाजी के जल की स्थिर भँवर हो (गंगा जी विष्णु भगवान के पैर के अँगूठे से निकलीं हैं। विष्णु का रंग नीला है। गंगाजल का रंग श्वेत है।) ॥३०॥ तरङ्गिता मन्दतरैर्मरुद्भिर्निशाकरांशुप्रतिमाः पताकाः । अनेकधा भिन्नतयाऽतिसूक्ष्मा विभान्ति धारा इव नाकनद्याः ॥३१॥ मन्द मन्द पवन से हिलोरें लेती हुईं ये चन्द्रकिरणों के समान धवल पताकायें, आकाश-गंगा की कई मार्गों में बँट जाने के कारण अत्यन्त सूक्ष्म दिखाई देने वाली धाराओं के समान, सुशोभित हो रही हैं ॥३१॥ (३०) उपेन्द्रो विष्णुः ।
२६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अमूनि चालोकय पाण्डुरत्नैश्चत्वारि चामीकरतोरणानि । येषां बहिस्था हरितामधीशाः सेवां वहन्ति प्रतिहारहार्याम् ॥३२॥ श्वेत रत्नों से जड़े हुये सुवर्णनिर्मित इन चार बाहर के दरवाजों को देखिये जिनके बाहर खड़े हुये दिक्पाल द्वारपाल का कार्य कर रहे हैं ॥३२॥ विनिह्नुतं दीप्तिवितानकेन सितांशुरत्नस्य वितानजालम् । अन्तर्हितस्वर्गत रुपसूनमालोपगूढालिरुतैः प्रतीतम् ॥३३॥ उज्ज्वल श्वेत किरणों वाले रत्नों से निर्मित यह गोल छत्र (देवी के) तेजःपुञ्ज के घेरे से छिपा हुआ भी, अपने भीतर स्थित स्वर्ग के मन्दार पुष्पों की मालाओं के अन्दर छिपे हुये भ्रमरों की गूंज से प्रतीत हो रहा है ॥३३॥ अत्रागतानां सहसैव सिद्धिर्मा भैष्ट विघ्नादिति हस्तचिह्नम् । दिदेश देवी निजशासनं तु पञ्चाङ्गुलीकैतवतो गृहेषु ॥३४॥ मन्दिर की भित्ति पर देवी का हस्तचिह्न बना हुआ है। उसकी पाँचों खुली हुई अँगुलियों के बहाने मानों देवी यह निर्देश दे रही है—"यहाँ भक्तिपूर्वक आनेवालों को सहज ही में सिद्धि प्राप्त हो जाती है, उन्हें विघ्नों से कोई भय नहीं।" ॥३४॥ शुभ्रत्रिपुण्ड्रच्छलतो दधानास्त्रिस्रोतसं मूर्धनि साधकेन्द्राः । रुद्राक्षदामोज्वलनीलकण्ठाः सर्वज्ञतां साधु भजन्ति एते ॥३५॥ यहाँ उपासना करने वाले साधक-श्रेष्ठ धवल त्रिपुण्ड्र तिलक के बहाने मानों तीन स्रोत वाली गंगाजी को मस्तक पर धारण किये हुये हैं और नीली रुद्राक्ष-मालाओं को गले में पहन कर 'नीलकण्ठ' बने हुये हैं तथा उत्कृष्ट साधना द्वारा शिव-ज्ञान का साक्षात्कार करके वास्तव मे 'सर्वज्ञ' बन गये हैं अर्थात् ये श्रेष्ठ साधक शिव के समान केवल 'गंगाधर' और 'नीलकंठ' ही नहीं बने हुये हैं किन्तु 'सर्वज्ञ' बनकर वास्तव में शिव-स्वरूप हो गये हैं ॥३५॥ पद्मासनस्था अपि हंसलीनाः श्रुत्या निरुक्तं विधिमन्वयुर्ये । ध्यायन्ति धन्या नगराजकन्यापदाम्बुजं तेऽत्र समाधिभाजः ॥३६॥ पद्मासन लगाकर बैठे हुये भी हंस में स्थित (आत्मा में लीन), बिना कही बातों को भी सुनने वाले अर्थात् हृदय के भावों को भी जानने वाले और वेदों द्वारा प्रतिपादित विधियों का पालन करने वाले (अपने वाहन हंस पर पद्मासन लगाकर बैठे हुये वेदपाठी ब्रह्मा जी के समान सुशो- भित होने वाले) ये धन्य साधक-श्रेष्ठ समाधि लगाकर भगवती पार्वती के चरण-कमलों का ध्यान कर रहे हैं ॥३६॥ (३४) 'अत्र मन्दिरे आगतानां सहसैव सिद्धिर्भवति, यूयं विघ्नान्मा भैष्ट' इति हस्ताक्षरितं निजशासनं मन्दिरभित्तिषु पञ्चाङ्गुल्ल्यात्मकहस्तचिह्नव्याजेन देवी दत्तवती । (३६) हंसलीनाः हंसस्थाः हंसे आत्मनि लीनाश्च । श्रुत्या निरुक्तं श्रुतिप्रतिपादितम् । निरुक्तमनुक्तं श्रुत्या कर्णेनानुजग्मुरिति विरोधः, निरुक्तं प्रतिपादितमिति परिहारः । पद्मासनेन हंसासीनं विधिं विधातार- मनुचक्रुरित्यपि गम्यते ।
तृतीयः सर्गः २७ क्रोडीकृतायामपि नाम लक्ष्म्यां सत्वैकमूर्तिः पुरुषोत्तमोऽयम् । आस्ते जगतपालनयोग्यमत्र लोकोत्तरं पौरुषमीहमानः ॥३७॥ सत्व की (सत्व गुण की और पराक्रम की) साक्षात् मूर्ति, प्राणियों में श्रेष्ठ ये भगवान् विष्णु भी जिन्होंने समूची लक्ष्मी को अपनी गोद में बैठा रखा है, यहाँ जगत् के पालन करने की क्षमता प्रदान करने वाले अलौकिक पराक्रम को प्राप्त करने की इच्छा से भगवती की उपासना कर रहे हैं ॥३७॥ कस्तूरिकाकर्दमितप्रतीराः ससैकताश्चन्द्रपरागपूरैः । कालागुरुश्यामलितेः क्वचिच्च सशैवलाः केसरगुच्छपुञ्जैः ॥३८॥ विलेपनैर्ग्रन्थितगन्धसारद्रवप्रधानैर्घनगन्धसारैः । विनिर्मिताः पार्थिव पश्य कुल्याः कुलान्यलीनां भृशमन्धयन्तीः ॥३९॥ राजन् ! देखिये (देवी पर चढ़ाये गये) उत्कृष्ट सुगन्ध वाले चन्दन आदि के विलेपनों की ये छोटी-छोटी नदियाँ बह निकली हैं जिनके तटों पर कस्तूरी का कीचड़ है, कपूर की रेत है, काले अगुरु (धूप) से श्यामल केसर के गुच्छों के समूह काई या कुमुदिनी के समान लग रहे हैं, और जो अपनी तीव्र सुगन्ध से भ्रमरों के समूहों को अत्यन्त मदान्ध बना रही हैं ॥३८-३९॥ आवृत्य वक्त्रं वसनाञ्चलेन पुरो भ्रमद्भृङ्गभयेन भीरुः । निर्मातुकामा कमलस्य मालां गुणे निजं गुम्फति पाणिपद्मम् ॥४०॥ अपने ऊपर मँडराते हुये भौंरे के भय से (स्वभाव से ही) भीरु इस कामिनी ने अपने मुख को साड़ी के अञ्चल से ढक लिया है। यह कमलों की माला गूंथ रही है, किन्तु (मुँह ढका होने के कारण) कमल के बजाय अपने कर-कमल को ही सूत्र में पिरो रही है ॥४०॥ उच्चेतुकामागुरुसारधूमं गता गवाक्षावधि भृङ्गपङ्क्तिः । तस्मिन् गते सूक्ष्मतयाऽनुजालैर्नतानतेयं शनकैर्निवृत्ता ॥४१॥ (सुगन्ध से आकृष्ट होकर) अगुरु धूप के सुगन्धित धूम को पकड़ने के लिये भ्रमरों की ऊपर जाली के झरोखे तक गई। धुआँ तो झरोखे की सूक्ष्म जालियों में से बाहर निकल फिर भी भ्रमर-पंक्ति ऊपर नीचे कई बार मँडरा कर धीरे धीरे वहाँ से हटी ॥४१॥ अशेषतः सञ्चरितेऽपि धूमे न धूपपात्रं तरुणी जहाति । प्रतार्यमाणा श्वसितानुसारं भ्रमद्भिरभ्यर्थनया द्विरेफैः ॥४२॥ अपनी (सुगन्धित) साँसों पर मँडराने वाले भ्रमरों के अपने पास पास ही उड़ते रहने के कारण उनके द्वारा ठगी गई तरुणी ने धूप के पूरा जल जाने पर भी और धूम के चारों ओर फैल जाने पर भी, धूप के पात्र को हाथ से नहीं हटाया ॥४२॥ (३८) चन्द्रपरागः कर्पूररजः । (३९) गन्धसारश्चन्दनः । कुल्याः क्षुद्रनद्यः ।
२८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् प्रद्योतयन्ती परितः प्रदीपान् स्वभूषणेषु प्रतिबिम्बिताङ्गान् । मनोभुवो मूर्तिमतातपेनालिङ्गितेव प्रतिभाति तन्वी ॥४३॥ कोईं सुमध्या तरुणी चारों ओर दीपक जला रही है। उसके आभूषणों में दीपकों का प्रति- बिम्ब पड़ने से ऐसा प्रतीत होता है मानों कामदेव के मूर्तिमान् प्रताप ने उसका आलिङ्गन कर रखा हो ॥४३॥ इयं भवानीभवनं पुनः किं चित्रेण सम्भावयति स्म सुभ्रूः । अलभ्यवस्तुप्रतिपादनेन चित्रं प्रकृत्यैव समस्तमस्य ॥४४॥ कोई सुन्दर भौंहों वाली तरुणी देवी के मन्दिर में चित्र बना रही है। यह मन्दिर तो (अपने भक्तों को) अलभ्य वस्तु प्रदान करने के कारण स्वभाव से ही 'चित्र' अर्थात् विचित्र महिमा वाला है। फिर इसको दोबारा 'चित्र' से सुसज्जित करने का प्रयास क्यों ? ॥४४॥ असौ स्वभक्तिप्रतिपादनाय भक्तिं शिवासद्मभुवस्तनोतु । तथापि कामं कमलाननानां
तृतीयः सर्गः २९ नृत्य-कुशल मयूरों की अत्यन्त मनोहर ‘केका’ ध्वनि सुनाई दे रही है। तथा कहीं ब्राह्मणों के वेदपाठ की ध्वनि और ‘जय’ ‘जय’ कार के शब्दों की ध्वनि से मिश्रित, श्रद्धा से हाथ जोड़े हुये जन-समूह के द्वारा भक्तिपूर्वक आनुपूर्वी से पढ़े जाने वाले, श्रुति और स्मृति के पवित्र स्तोत्रों की ध्वनि सुनाई दे रही है। कहीं अत्यन्त भक्ति के कारण ‘पहले मैं जाऊँ’ ‘पहले मैं जाऊँ’ इस प्रकार की स्पर्धा से मन्दिर के भीतरी भाग में प्रवेश करने के लिये उद्यत जन-समूह के कोलाहल की ध्वनि सुनाई दे रही है। कहीं ढोल, शंख, नगाड़े और घंटे आदि के दिशाओं को गूंजा देने वाले शब्द सुनाई पड़ रहे हैं और कहीं इसी प्रकार के अन्य सुन्दर वाद्यों की ध्वनि सुनाई दे रही है। उपर्युक्त सब ध्वनियों का एक साथ मिल कर एक विचित्र प्रकार का अनिर्वचनीय घोष सुनाई दे रहा है, जैसे नाना प्रकार के पुष्पों की सुगन्धियों को एक साथ वहन करने वाले पवन की एक विचित्र प्रकार की मिश्रित सुगन्ध आती हो ॥४६-५०॥ एवं स शृण्वन् सुनयस्य वाणीं विनीतवेशः प्रविवेश वेश्म । पुष्पादि-संभारभृतोऽथ भृत्यास्तमन्वयुः केचन मानवेन्द्रम् ॥५१॥ सुनय के इन वचनों को सुन कर राजा विश्वपति विनीत वेश धारण करके मन्दिर के अन्दर प्रविष्ट हुये। उनके अनुचर पुष्प आदि पूजा की सामग्री लेकर उनके पीछे पीछे गये ॥५१॥ यथोपचारं स नृपः सपर्यां समाप्य सोमार्धभृतो महिष्याः । प्रणम्य सम्यक् स्तुतिपाठगीतैरगात् सदः साधकसत्तमानाम् ॥५२॥ चन्द्रचूड़ शिव की अर्द्धांगिनी भगवती पार्वती की सांगोपांग विधिवत् पूजा समाप्त करके तथा विधिवत् स्तुतिपाठ करके देवी को प्रणाम कर, विश्वपति साधकों में श्रेष्ठ मुनिवरों के समाज में गये ॥५२॥ तत्राभिवाद्य प्रथमं मनीषी मनीषितं चाथ निवेद्य तेभ्यः । साङ्गं स विद्यां विदुषां प्रसङ्गादासेदिवान् सिद्धिमिवाद्धितीयाम् ॥५३॥ मनीषी राजा ने पहले उनका सादर अभिवादन किया और फिर अपनी इच्छा प्रकट कर उन विद्वानों से राजा ने सांग विद्या, अद्वितीय सिद्धि के समान, प्राप्त की ॥५३॥ अक्षीणया दक्षिणया स तेषां दाक्षिण्यभाजां प्रथमः प्रमोदम् । सम्पाद्य सद्यः प्रतिपद्यते स्म तथानुपूर्व्या विधिमर्हणायाः ॥५४॥ चतुर पुरुषों में अग्रगण्य राजा ने अपनी अक्षीण दक्षिणा से उन विद्वानों को प्रसन्न कर उनसे आनुपूर्वी सहित अनुष्ठान की विधि प्राप्त की ॥५४॥ अजातरूपाभरणोपि मूर्ध्नि स जातरूपो जनितो जटाभिः । विमुक्तवानक्षगुणेषु सङ्गं भृशं बभूवाक्षगुणेषु सक्तः ॥५५॥ यद्यपि राजा के मस्तक पर कोई ‘जातरूपाभरण’ (स्वर्ण के आभूषण) नहीं थे, फिर भी वे जटाओं से ‘जातरूप’ (सुन्दर) प्रतीत होते थे। उन्होंने ‘अक्ष-गुण’ (चौपड़-पासों के शौक) का संग छोड़ दिया था, फिर भी ‘अक्ष-गुण’ में (रुद्राक्ष माला फिराने में) अत्यन्त आसक्त थे॥५५॥
३० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मुदं विधानात् किल देवतानां विशुद्धपक्षाश्रयणात् स राजा । वृत्तं दधानः परिपूर्णमेव बभौ मृगेणेव मृगाजिनेन ॥५६॥ यज्ञादि कर्मों से देवताओं को प्रसन्न रखने वाले, शुद्ध पक्ष का आश्रय लेने वाले, पूर्ण विशुद्ध चरित्र वाले वे राजा विश्वपति मृगचर्म पर, देवों के प्रिय एवं पूर्ण विम्ब धारण करने वाले शुक्ल- पक्ष के मृगांक चन्द्रमा के समान सुशोभित हुये (शुक्लपक्ष में पूर्ण बिम्ब से शोभित होने वाला मृगलाञ्छन चन्द्रमा देवताओं को अमृत पिला कर तृप्त करता है) ॥५६॥ वन्यं फलं मूलमथार्द्रपर्णं शुष्कं तदेवेति नृपः क्रमेण । प्रकल्पयन् भक्ष्यमपेततृष्णो दर्भास्तृतं स्थण्डिलमध्यशेत ॥५७॥ वे क्रम से पहले वन के फल, फिर कन्द-मूल, फिर हरे पत्ते और फिर सूखे पत्ते खाते थे एवं तृष्णा छोड़कर एक छोटे से मिट्टी के चबूतरे पर दर्भ का आसन बिछा कर सोते थे ॥५७॥ श्रद्धासमृद्धागमसम्प्रदायसत्वानुरूपैरखिलो पहारैः । त्रिसन्ध्यमेवान्धकवैरिजायामाराधयामास धरावतंसः ॥५८॥ पूर्ण श्रद्धालु भूमि-भूषण राजा ने आगम सम्प्रदाय के अनुकूल सब प्रकार की विधियों से— प्रातः, मध्याह्न और सायं—तीनों समय, शिवपत्नी भगवती की आराधना की ॥५८॥ कुर्वन् यथाकालमुपात्तकृत्यं निराकृतप्रावरणो नृवीरः । अम्बापदद्वन्द्वनिवेशितात्मा न द्वन्द्वदुःखानि विदाञ्चकार ॥५९॥ यथासमय विधिवत् कार्य करने वाले नरपति का अज्ञान आवरण हटने लगा और भगवती के चरणों में मन लगा देने के कारण उन्हें द्वन्द्व दुःखों का अनुभव नहीं हुआ ॥५९॥ यमेन नित्यं नियमेन चायं नितान्तमासादितभावशुद्धिः । सिंहासनार्होऽप्युचितं मुनीनां पद्मासनं शान्तमना बबन्ध ॥६०॥ नित्य यम-नियम का पालन करने से उन्हें उत्कृष्ट सत्त्व-शुद्धि प्राप्त हुई । राजसिंहासन पर बैठने वाले विश्वपति अब शान्तमना होकर मुनियों के योग्य पद्मासन लगा कर बैठने लगे ॥६०॥ सप्राणपञ्चेन्द्रियसंयमेन स निस्तरङ्गं निजमन्तरङ्गम् । नासाग्रसंदंशितशान्तदृष्टिर्नियोजयामास निजेष्टदेवे ॥६१॥ पंच प्राण और पंच इन्द्रियों का संयम करके तथा नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि गाड़ कर शान्तमना राजा ने अपने (चंचल) मन को स्थिर बना कर इष्ट देवी भगवती में लीन कर दिया ॥६१॥ सर्वेन्द्रियाणां विनिरुध्य वृत्तिं स वीतसङ्कल्पतया कथञ्चित् । शनैः शनैः सानुमतस्तनूजामन्तःपदव्याः पथिकीञ्चकार ॥६२॥ संकल्प-विकल्प से ऊपर उठ कर, इन्द्रियों की विषय-वृत्ति को रोक कर, चित्त-वृत्ति का निरोध कर, राजा ने धीरे धीरे भगवती पार्वती को अपने अन्तःकरण में उतार लिया ॥६२॥ (५६) चन्द्रः शुक्लपक्षे सुधाप्रदानेन देवान् रञ्जयति, असौ राजा यज्ञादिकर्मसु हवीरूपसुधादानेन तान् रञ्जयति, पवित्रं पक्षं चाश्रयति । वृत्तं बिम्बं चरित्रं च ।
तृतीयः सर्गः ३१ अभ्यासयोगेन निरन्तरेण निरन्तरायेण हितस्य राज्ञः । विनैव निर्बन्धमवन्ध्यसेवा शाकम्भरी प्रादुरभूदजस्रम् ॥६३॥ विघ्नरहित और निरन्तर योगाभ्यास के कारण राजा से प्रसन्न होकर उनके हित के लिये भगवती शाकंभरी देवी, जिनकी सेवा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती, बिना आग्रह के, साक्षात् प्रकट हुईं ॥६३॥ तद्ध्यानधाराविनिमग्नचेता विस्मृत्य सर्वान् विषयान् वशीन्द्रः । दशासु सर्वासु समस्तदिक्षु ददर्श तां दैवतवृन्दवन्द्याम् ॥६४॥ भगवती के ध्यान की धारा में मग्न चित्त वाले राजा ने सब प्रकार के विषयों को भूल कर एवं सब अवस्थाओं में अपने मन को वश में रख कर (भक्ति के प्रताप से) सब दिशाओं में देवताओं के वृन्दों से वन्द्य भगवती के दर्शन किये ॥६४॥ स्वप्नेषु स प्रेष्ठतमां पुरारेः पश्यन् विशेषात्नतु विस्मितोऽभूत् । ददर्श यज्जागरणेऽपि योगी जगन्ति पूर्णानि तयैव तावत् ॥६५॥ राजा स्वप्नों में भगवती के दर्शन करके अधिक विस्मित नहीं होते थे, किन्तु जब उन्होंने जाग्रत् अवस्था में सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त भगवती के (विराट् रूप के) दर्शन किये (तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ) ॥६५॥ अन्तःस्फुरन्त्याः परदेवताया महीयमानो महसा महीशः । ॰सुदुःसहोऽभूत् तपसा कृशोऽपि यथार्ककान्तः किरणेन भानोः ॥६६॥ अन्तःकरण में सदा स्फुरित रहने वाली भगवती परा शक्ति के तेज से महनीय राजा, तप के कारण दुर्बल होने पर भी, रवि की किरण के सामने सूर्यकान्त मणि के समान, सुदुःसह प्रतीत हुये ॥६६॥ इत्थं जपै रभिवषैर्यजनैस्तपोभिर्ध्यानेन होमविधिना द्विजतर्पणे श्च । अन्यैश्च भक्तिरचितैरुचितोपचारैराविश्चकार जननी नृपतौ प्रसादम् ॥६७॥ इस प्रकार जप, अभिषेक, यज्ञ, तप, ध्यान, होम, द्विज-तर्पण एवं अन्य भक्तिपूर्वक किये गये उपचारों से प्रसन्न होकर जगदम्बा ने विश्वपति पर अपना प्रसाद प्रकट किया ॥६७॥ वरय वरमभीप्सितं ददामि द्रुतमिह विश्वपते न तेऽस्तु भीतिः । निरुपधिवरिवस्ययाऽनया ते मम समजायत सम्प्रति प्रसादः ॥६८॥ विश्वपति ! इच्छित वर माँगो, मैं शीघ्र उसे दूँगी, तुम्हें कोई भय नहीं होगा, तुम्हारी इस निष्कपट सेवा से प्रसन्न होकर में अब अपना प्रसाद प्रकट कर रही हूँ ॥६८॥ आलोक्य तां तरुणभास्करकोटिजैत्रज्योतिर्विशेषविभवादविभाव्यमूर्तिम् । न प्रत्यपद्यत किमप्यवशान्तरात्मा स्विद्यत्सवेपथुतनूर्मनुजाधिनाथः ॥६९॥ करोड़ों प्रचण्ड सूर्यों की प्रभा को जीतने वाली ज्योति के कारण आँखों को चौंधिया देने वाली देवी के दर्शन कर विश्वपति विमूढ हो गये, उनके शरीर में स्वेद और कम्प होने लगा और उन्हें कुछ भी न सूझा ॥६९॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये तृतीयः सर्गः Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi
चतुर्थः सर्गः स क्षणात् प्रकृतिमेत्य पार्थिवः प्रार्थिताधिकफलोपधायिनीम् । स्तोतुमद्रितनयामुपाददे भारतीमिति सुभक्तिभावितः ॥ १ ॥ क्षण भर में ही विश्वपति ने प्रकृतिस्थ हो, प्रार्थना से भी अधिक फल देने वाली भगवती की पूर्ण भक्ति-भाव से यों स्तुति करना प्रारंभ किया ॥ १ ॥ गौरि! शौरिगिरिशाम्बुजासनास्त्वद्गुणोक्तिषु निबद्धवासनाः । आननानि दधतो बहून्यपि स्पन्दयन्ति रसना न साध्वसात् ॥ २ ॥ हे गौरि ! ब्रह्मा, विष्णु और शंकर आपके अपरिमित और अनिर्वचनीय गुणों को वर्णन करने की इच्छा रखते हुये भी और अनेक मुखों को (चतुरानन, पञ्चानन आदि) धारण करते हुये भी, भय से अपनी जिह्वा नहीं खोल पाते हैं ॥ २ ॥ वैभवं तव भवानि ! वेदितुं कोऽहमत्र गुरुमोहविह्वलः । नावधारयितुमुत्सहेत यत् सावधानमपि वैधसं मनः ॥ ३ ॥ हे भवानि ! भारी मोह से घिरा हुआ मैं आपका वैभव कैसे जान सकता हूँ ? ब्रह्मा जी का सावधान मन भी उसे जानने में समर्थ नहीं है ॥ ३ ॥ रूपमौपनिषदः सदातनं चिन्मयं तव वदन्ति केचन । चेतनेति चितिरित्यथाऽपरे शब्दभेदचतुराः पुराविदः ॥ ४ ॥ कोई उपनिषद्-ज्ञानी आपके रूप को कूटस्थ नित्य शुद्ध 'सत्' और शुद्ध 'चित्' बतलाते हैं और कोई शब्द-चतुर प्राचीन विद्वान् उसे 'चेतना' या 'चिति' कहते हैं ॥ ४ ॥ यद्बहिस्थमखिलप्रपञ्चतस्तद्विदामनुभवैकवेदनम् । स्वप्रकाशमवकाशि सर्वतः पार्वति ! त्वमसि तत्ववस्तु तत् ॥ ५ ॥ हे पार्वति ! आप वह अनादि और अनन्त तत्त्व वस्तु हैं जो तत्त्व समस्त-प्रपञ्चातीत है, स्वप्रकाश है, स्वतःसिद्ध है, सर्वव्यापी है और जिसका साक्षात्कार अपरोक्ष स्वानुभूति द्वारा ही हो सकता है ॥ ५ ॥ त्वां विना जननि ! चेतनामयीं नैव चेतितुमपि क्षमः पुमान् । किं पुनस्त्रिभुवनस्य निर्मितौ पालने प्रलयकल्पनेऽथवा ॥ ६ ॥ जगदम्ब ! आप परा चित्-शक्ति हैं। आपके बिना 'शिव' स्पन्दन भी नहीं कर सकते, जगत् के निर्माण, पालन और संहार की तो बात ही क्या । (जगत् के निर्माता ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहर्ता शिव पराशक्ति के ही अंश हैं। परशिव और पराशक्ति में कोई अन्तर नहीं । गुणातीत और प्रपञ्चातीत परशिव शक्ति के कारण सगुण प्रतीत होते हैं। बिना शक्ति के शिव स्पन्दन भी नहीं कर सकते। बिना शक्ति के 'शिव' 'शव' के समान हैं) ॥ ६ ॥
५ चतुर्थः सर्गः ३३ त्वत्कलाभिरणिमादिभिः परं सिद्धिभिः परशिवः समेधितः । ईशितेति गिरिपुत्रि ! गीयते निष्कलोऽपि निखिलार्थदर्शिभिः ॥ ७ ॥ निर्गुण, निष्कल, पर शिव आपकी कलाओं, गुणों और अणिमा-महिमादिक सिद्धियों के कारण सगुण और सकल प्रतीत होकर 'ईशिता' (प्रभु, स्वामी, जगत् के निर्माता, पालक और संहर्ता) कहलाते हैं—ऐसा आगमों के अर्थ को जानने वाले विद्वानों का मत है ॥ ७ ॥ पद्मभूवदनपद्मपावनौ वाङ्मयीं प्रकृतिमाश्रयामि ते । या प्रसूय निगमाञ्जगत्प्रसूः सप्रकाशमकरोज्जगत्त्रयम् ॥ ८ ॥ मैं आपकी वाङ्मयी प्रकृति की शरण लेता हूँ जो समस्त जगत् की जननी है, जो ब्रह्मा जी के मुख-कमल द्वारा पवित्रित है और जिसने वेदों को प्रकट करके तीनों लोकों को सप्रकाश बना दिया है ॥ ८ ॥ निर्गुणस्य न शरीरसंस्थितिः सर्व एव हि गुणास्तदाश्रयाः । ब्रह्मविष्णुगिरिशाः शरीरिणो युक्तमेव वशगास्तवाम्बिके ॥ ९ ॥ निर्गुण, निष्कल, पर शिव की तो शरीर-स्थिति भी संभव नहीं (अर्थात् गुणातीत एवं प्रपञ्चा- तीत होने के कारण वे अशरीरी और अनिर्वचनीय हैं) । हमारी बुद्धि तो केवल गुणों को जान सकती है (निर्गुण को नहीं) और सम्पूर्ण गुणों का आधार आप ही हैं । जगन्मातः ! सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहर्ता शिव ये तीनों आप ही के रूप हैं क्योंकि तीनों सगुण और शरीरधारी हैं और आपके वश में हैं ॥ ९ ॥ अप्यनावरणमीश्वरं शिवे ! सर्वतस्तिरयसि प्रभावतः । अप्यलीकमखिलं यथार्थवद् या तनोषि विभुता तवाद्भुता ॥१०॥ हे मंगलमयि ! आपका वैभव अद्भुत है क्योंकि वह अपने प्रभाव से स्वप्रकाश स्वतःसिद्ध पर शिव को भी, जो वस्तुतः कभी आवृत नहीं हो सकते, आवृत करता-सा प्रतीत होता है और इस सम्पूर्ण प्रपञ्च को, जो वस्तुतः मिथ्या है, सत्य-सा प्रतीत कराता है । (सत्य का आवरण करने वाली और मिथ्या की विक्षेप द्वारा प्रतीति कराने वाली आपकी सदसदनिर्वचनीय मा- का वैभव विलक्षण है) ॥१०॥ पञ्चवक्त्रचतुराननौ कथं वैभवं तव विवेक्तुमुद्यतौ । अर्थतस्तव पुरं च शंसितुं यत् सहस्रवदनोऽपि न क्षमः ॥११॥ चतुरानन ब्रह्मा और पञ्चानन शिव आपके वैभव को कैसे जान सकते हैं? जब सहस्रानन शेष भी वस्तुतः आपके विग्रह की महिमा को जान लेने में असमर्थ हैं ॥११॥ ज्ञानशक्तिरसि मुक्तिसाधनं भुक्तिरप्यचलपुत्रि ! मुक्तिदा । बन्धहेतुरसि बन्धुरूपिणी बन्धमोचनकरी च जन्मिनाम् ॥१२॥ हे पार्वति ! आप ज्ञानशक्ति हैं जो मोक्ष प्राप्ति का साधन है । आप ही 'भुक्ति' (भोग मय संसार) हैं और आप ही 'मुक्ति' (मोक्ष रूप कैवल्य) हैं । आप ही 'भुक्ति' (सांसारिक भोग) (११) पुरं अतिशयमहिमान्वितं विग्रहम् ।
३४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् देने वाली हैं और आप ही 'मुक्ति' (मोक्ष) देने वाली हैं। (आप भुक्तिमुक्तिप्रदायिका हैं।) आप ही प्राणियों की सच्ची बन्धु हैं। आप ही बन्धनरूप और बन्ध-हेतु हैं तथा आप ही मोक्ष- रूप और बन्धन छुड़ाने वाली हैं ॥१२॥ निर्गुणोऽपि सगुणस्त्वदाश्रयात् त्वां विना बहुगुणोपि निर्गुणः । इन्दिरे ! हरिहृदेकमन्दिरे ! त्वत्कृपाऽल्पतपसां न पार्श्वगा ॥१३॥ निर्गुण परशिव भी आपके कारण सगुण प्रतीत होते हैं। आपका आश्रय लेने पर गुण- हीन भी गुणवान् बन जाते हैं। आपके बिना गुणवान् भी गुण-हीन हैं। आप पराशक्ति हैं (और जिस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, महेश आपके रूप हैं, उसी प्रकार सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती भी आपके रूप हैं)। आप ही विष्णु के हृदय-मन्दिर की देवी लक्ष्मी हैं (और आप ही सरस्वती और पार्वती हैं)। आपकी कृपा अल्प-पुण्य वालों के भाग्य में नहीं है ॥१३॥ शुम्भदैत्यदलने ! रणाङ्गणे का प्रशस्तिरधिका चकास्ति ते । अप्यखण्डजगदण्डमण्डलं चण्डि ! खण्डयसि हेलयैव यत् ॥१४॥ शुम्भ दैत्य को मारने वाली देवि ! जब आप उग्ररूप धारण कर चण्डी बन जाती हैं तब रण क्षेत्र में आपकी क्या प्रशंसा की जाय, आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को सहज ही में तोड़ सकती हैं ॥१४॥ त्वामपारमहिमोपबृंहितां स्तोतुमुद्यमवती मनागसौ । किं करोमि रसना निरङ्कुशा शङ्कते न खलु शङ्करप्रिये ! ॥१५॥ अपार महिमा से अलंकृत आपकी स्तुति करने के लिये मेरी निरंकुश जिह्वा थोड़ा प्रयत्न कर रही है। देवि ! मैं क्या करूँ, यह निरंकुश जिह्वा मानती ही नहीं ॥१५॥ त्वद्गुणश्रवणसाधनं मया नाश्रितं सदुपदेशिनां सदः । त्वं गता श्रुतिपथं यदि क्वचिन् नादरान् मनसि चाधिरोपिता ॥१६॥ आपके गुण को सुनने के लिये मैंने सदुपदेश देने वाले विद्वानों के समाज का आश्रय नहीं लिया। यदि कभी आपकी महिमा सुन भी ली तो आपको अपने मनमें आदरपूर्वक स्थित नहीं किया ॥१६॥ मादृशाऽलसतया शयालुना कुर्वताप्यनुपपत्तिकल्पनाम् । नैव पाणियुगलं पवित्रितं शैलपुत्रि ! परिचर्यया तव ॥१७॥ मुझ जैसे आलसी और (अज्ञानान्धकार में) सोने वाले मनुष्य ने, अनेक प्रकार की अयुक्त कल्पनायें करते रहने पर भी, कभी, हे पार्वति ! आपकी सेवा करके इन दोनों हाथों को पवित्र नहीं किया ॥१७॥ चिन्तनेन सुलभा त्वमन्तरं प्राणिनां श्रितवती निरन्तरम् । मानसं तदपि न क्षणं मया पादयोस्तव शिवे ! निवेशितम् ॥१८॥ मङ्गलमयि ! आप अन्तर्यामिनी हैं। सब प्राणियों के अन्तःकरणों में निरन्तर निवास करने वाली हैं। आप भक्तिपूर्वक चिन्तन करने पर सुलभ हैं। फिर भी मुझ अज्ञानी ने कभी एक क्षण के लिये भी अपने मन को आपके चरणों में अर्पण नहीं किया ॥१८॥ (१३) सरस्वतीलक्ष्मीपार्वतीनां वस्तुतः पराशक्तिस्वरूपाणामैक्यात् 'इन्दिरे हरिहृदेकमन्दिरे' इति पार्वत्याः सम्बोधनं सुसङ्गतम् ।
चतुर्थः सर्गः ३५ दुर्निवारतरदुष्टवासनासूत्रसंयमितचेतसा मया । एवमेव जननि ! प्रमाद्यता यापितानि जनुषां शतान्यपि ॥१९॥ बड़ी कठिनता से दूर की जाने योग्य, प्रबल और दुष्ट वासनाओं की रस्सी से मेरा मन बँध रहा है (जैसे 'पशु' 'पाश' से बँधा रहता है। शैव-दर्शन के अनुसार जीवात्मा 'पशु' है और संसार 'पाश' ।) जननि ! इसी प्रकार अविद्या, कर्म और माया के मलरूपी पाश से बँधे हुये मुझ पशु ने प्रमादवश सैकड़ों जन्म व्यर्थ खो दिये ॥१९॥ तेन तेन विहितेन कर्मणा तासु तासु विविधासु योनिषु । संसरन् शरणमत्र जन्मनि त्वां गतोस्मि कृपया तवेरितः ॥२०॥ नाना प्रकार की योनियों में नाना प्रकार के कर्म करने के कारण जन्म-मृत्यु के इस संसार- चक्र में भ्रमण करता हुआ मैं इस जन्म में आपकी कृपा से प्रेरित होकर आपकी शरण आया हूँ॥२०॥ भूरिजन्मजनितं महेश्वरि ! क्षन्तुमर्हसि ममागसां शतम् । कर्म किञ्चिदपि साध्वसाधु वा यत् करोमि न विना त्वदाज्ञया ॥२१॥ महेश्वरि ! अनेक जन्मों में कृत मेरे सैकड़ों पापों को आप कृपया क्षमा करें। बिना आपकी आज्ञा के कोई अच्छा या बुरा कर्म नहीं करूँगा ॥२१॥ एतदेव जनुषः फलं महत् यत्र वाऽम्ब ! करुणैकपात्रता । किं पुनस्त्रिदशवृन्ददुर्लभं दर्शनं भुवनवन्दिते ! तव ॥२२॥ जननि ! आपकी करुणा के योग्य बन जाना ही इस जन्म का बड़ा भारी फल है। फिर, हे भुवन-वन्दिते ! देवताओं के समूहों के लिये भी दुर्लभ आपके साक्षात् दर्शन की तो बात ही क्या ? ॥२२॥ चञ्चलाञ्चलविलासचञ्चला रत्नकाञ्चनमहीसमृद्धयः । कीर्तिरन्नमति येन शाश्वती वैभवं वितर देवि ! तन्मयि ॥२३॥ चञ्चल अञ्चल वाली तरुणियों के विलास के समान क्षणिक इन रत्न, सुवर्ण, पृथ्वी और साम्राज्य से उत्पन्न सुखों में क्या धरा है ! देवि ! मुझे आप ऐसा वैभवशाली वरदान दें जिस कारण मेरी कीर्ति शाश्वत होकर व्याप्त रहे ॥२३॥ उल्लसद्विशदभक्तिभावितां भारतीमिति निशम्य भूपतेः । बिभ्रती प्रगुणितां प्रसन्नतां तं जगाद जगदम्बिका पुनः ॥२४॥ उन्नत और निष्कपट भक्ति से भरे हुये राजा विश्वपति के इन वचनों को सुनकर जगज्जननी शाकंभरी देवी अत्यधिक प्रसन्न होकर बोलीं—॥२४॥ सन्ततं मम समाश्रयादयं भूपते ! जनपदः प्रतिष्ठितः । नामधेयमपि मामकं दधन्मूलतो लवणमाशु जायताम् ॥२५॥ राजन् ! यह देश (साँभर) मेरे निरन्तर आश्रय से पवित्र है और मेरे ही नाम से (शाकंभरी या साँभर नाम से) विख्यात है। (मेरी कृपा से) अब इसके मूल में शीघ्र नमक बन जायगा ॥२५॥ (२३) चञ्चलान्यञ्चलानि यासां तास्तरुण्यस्तासां विलासवच्चञ्चल्यः क्षणिकाः ।
३६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् धावनाय निजवाहमीरयन् यावतीं भुवमुपैषि तावती । भाविनी लवणसाद् विवर्त्तिता यावदक्षि न दधासि पृष्ठतः ॥२६॥ अपने घोड़े को दौड़ाते हुये और पीछे दृष्टि न डालते हुये आप जितनी भूमि तय कर लेंगे वह सारी भूमि लवणमय बन जायगी ॥२६॥ क्षोणिपैरधिबलैरनुक्षणं खन्यमानदृढमूलबन्धनः । देश एव विलयं व्रजेदतः काञ्चनस्य न खनिर्विनिर्मिता ॥२७॥ मैंने यहाँ सुवर्ण की खान इसलिये नहीं बनाई कि कहीं बलवान् राजाओं द्वारा लोभ के कारण निरन्तर खोदे जाने से दृढ़ मूलबन्धन भी शिथिल हो जाय और यह मेरा देश ही नष्ट हो जाय ॥२७॥ इत्युदीरितवती तिरोदधे तारकारमणमौलिगेहिनी । तन्निदेशमधिमौलि धारयन् दण्डवद् भुवि ननाम भूपतिः ॥२८॥ यह कह कर भगवान् चन्द्रचूड़ की अर्द्धांगिनी अन्तर्धान हो गईं और उनके आदेश को शिरो- धार्य कर राजा ने भूमि पर साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम किया ॥२८॥ सोऽधिरुह्य तरुणं तुरङ्गमं रंहसा हसितहेलिवाहनम् । ताडयन्नकरुणं कशाञ्चलैः प्राणुदच्छिथिलवल्गमग्रतः ॥२९॥ फिर एक जवान घोड़े पर चढ़ कर, जो अपने वेग से सूर्य के घोड़ों को मात कर रहा था, लगाम ढीली कर जोर से चाबुक लगाते हुये राजा विश्वपति ने उसे आगे दौड़ाया ॥२९॥ पूर्णमेत्य मतिमान् मनोरथं स प्रणम्य परमेश्वरीं पुनः । गीयमानविभवः पुरोगमैर्निवृतो निववृते निजां पुरीम् ॥३०॥ अपने मनोरथ को पूर्ण करके कार्य से निवृत्त हो तथा फिर भगवती शाकंभरी को प्रणाम करके, आगे चलने वाले लोगों द्वारा गाये जा रहे वैभव वाले बुद्धिमान् राजा विश्वपति शान्ति- पूर्वक अपनी नगरी की ओर चले ॥३०॥ सन्निवृत्तमधिगत्य पार्थिवं बान्धवाः प्रकृतयश्च सैनिकैः । प्रत्युदीयुरथ दूरतो द्रुतं वारिवाहमिव बर्हिणां गणाः ॥३१॥ राजा को वापस आया जान कर बन्धु-वर्ग, प्रजा-जन और सैनिक उनका स्वागत करने के लिये दूर तक चल पड़े, जिस प्रकार वेग से आते हुये मेघ का स्वागत करने के लिये मयूर-वृन्द नाच उठते हैं ॥३१॥ रेणुभिः पिहितहेलिमण्डलं प्रोल्लसद्द्विपनिपीतदिङ्मुखम् । धोरणध्वनितयन्त्रिताम्बरं स्वामिनाऽथ समगङ्स्त तद् बलम् ॥३२॥ इसके बाद राज-सेना (सैनिकों और वाहनों के पैरों से उड़ी) धूल से सूर्य-मंडल को ढाँकती हुई तथा मदोत्कट हाथियों के समूह से दिशाओं के मुखों को चूमती हुई और वाद्यों की ध्वनि से आकाश को गुंजाती हुई अपने स्वामी से मिली ॥३२॥ (२६) लवणसाद् विवर्त्तिता लवणरूपेण परिणता ।
चतुर्थः सर्गः ३७ प्रेक्ष्य पाण्डुशतपत्रसोदरं छत्रमस्य पुरतो रथोपरि । स्यन्दनद्विरदवाजिवाहना वाहनान्निज निजादवातरन् ॥३३॥ विश्वपति के रथ का श्वेत कमल के समान सुन्दर छत्र देख कर रथ, हाथी और घोड़ों पर चलने वाले लोग अपने अपने वाहनों से नीचे उतर पड़े ॥३३॥ यावदुद्यमभृतो भवन्ति ते पादचारगमनोपमन्त्रिणः । तावदेव नरदेवनोदितः स्यन्दनः स्यदवशादुपासदत् ॥३४॥ ज्यों ही वे लोग पैदल राजा के समीप जाने के लिये बढ़े त्यों ही विश्वपति द्वारा प्रेरित रथ वेग से पास आ गया ॥३४॥ स प्रणम्य गुरुवर्गमादरात् सौहृदेन परिरभ्य बान्धवान् । प्रीतिचारुभणितैः कृतानतीनत्यरञ्जयदथानुजीविनः ॥३५॥ विश्वपति ने गुरु-वर्ग को सादर प्रणाम किया, बन्धु-वर्ग को बड़े स्नेह से सीने से लगाया एवं झुक कर प्रणाम करने वाले भृत्य-वर्ग को प्रेम से मनोहर वचनों से प्रसन्न किया ॥३
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Check dots before line 4: There are two dots: ".." or dirt/ink spots before "विश्वपति". It's just indentation or ink marks. Same before line 18: ".. विश्वपति".
Everything looks very clear and thoroughly checked.३८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सेवनाद् गिरिभुवो भुवः प्रभुं तं निशम्य सपदि प्रतिष्ठितम् । शत्रवोऽपि शरणार्थिनस्तदा भूयसीर्गिरिभुवः सिषेविरे ॥४०॥ विश्वपति को गिरिजा के मन्दिर की भूमि के सेवन के कारण प्रभुतायुक्त एवं प्रतिष्ठित जान कर शत्रु लोग भी, शरणार्थी बन कर, बड़ी बड़ी गिरि-भूमियों का सेवन करने लगे (अर्थात् विश्वपति के शत्रु कहीं शरण न पाकर पर्वतों की बड़ी बड़ी गुफाओं में छिप गये) ॥४०॥ [