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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् भूभृद्विशालकटकं समकालमेव तस्मिन् रणोद्यमिनि दुर्दिनयाम्बभूव । दानद्रवैर्द्विपकदम्बकुम्भजातैर्बाष्पैश्च वैरिवनितानयनाब्जमुक्तैः ॥३३॥ विश्वपति के युद्ध के लिये उद्यत होते ही राजाओं की विशाल सेना में दुर्दिन (वह दिन जब आकाश में बादलों के कारण अन्धकार सा छा जाता है और घनघोर वृष्टि होती है) छा जाता था क्योंकि हाथियों के गण्डस्थलों से मदजल की झड़ी लगी रहती थी और शत्रुओं की स्त्रियों के नय- नारविन्दों से आँसुओं की धारायें बरसती रहती थीं (तथा उनकी आहों के बादल छाये रहते थे) ॥ ३३ ॥ आह्लादितद्विजगणाऽविरतप्रवाहा पद्मावतारसुरभिं परिभूततृष्णाम् । एतस्य दानजलनिर्झरिणीं विगाह्य को नाम नाऽजनि जनोऽत्र विमुक्ततापः ॥३४॥ जिस प्रकार नदी के प्रवाह में प्रसन्न हंस आदि पक्षी क्रीड़ा किया करते हैं, खिले हुए कमलों से वह सुगन्धित रहती है, लोगों की प्यास बुझाती है और स्नान कर लेने पर उनकी गर्मी शान्त करती है उसी प्रकार विश्वपति के दान-संकल्पों के जल की जो नदी बह चली थी उसमें प्रसन्न ब्राह्मणों के समूह निरन्तर स्नान करते थे तथा वह लक्ष्मी के अवतार के कारण कामधेनु के समान थी एवं याचकों की तृष्णा को शान्त करनेवाली थी । विश्वपति की इस दान-नदी में स्नान करके किस मनुष्य ने अपना सन्ताप दूर नहीं किया ? ॥ ३४ ॥ आकारतो न परमस्य भुजद्वयस्य स्वर्वासिवृक्षविटपैः प्रतिपक्षताऽऽसीत् । अप्राथितं धनमनेन वनीयकेभ्यो विश्राण्य सन्ततमहारि यशोऽपि तेषाम् ॥३५॥ ...तः विश्वपति के सुन्दर और कोमल हाथों ने स्वर्ग के कल्पवृक्षों की केवल आकृति ...ही ग्रहण नहीं की, किन्तु याचकों को बिना माँगे ही निरन्तर धन दे-देकर उनका (कल्पवृक्षों की शाखाओं का) यश भी छीन लिया । (कल्पवृक्ष तो माँगने पर ही धन देता है, किन्तु विश्वपति के हाथों ने बिना माँगे ही धन दिया) ॥ ३५ ॥ वाञ्छाधिकद्रविणवर्षिणि याचकानां यस्योज्ज्वले जगति जाग्रति पञ्चशाखे । वीतप्रयोजनतया सुरपादपानां पञ्चत्वमेव बत युक्ततरं प्रतीमः ॥३६॥ ...हि याचकों को उनकी इच्छा से अधिक धन देने वाले विश्वपति के उज्ज्वल हाथ के विद्यमान रहने पर स्वर्ग के कल्पवृक्षों का कोई प्रयोजन नहीं रहा । अतः कल्पवृक्षों का 'पञ्चत्व' (पाँच की संख्या; मृत्यु) प्राप्त करना युक्त ही है ॥ ३६ ॥ (३४) पद्मानां कमलानां अवतारः पद्मायाः लक्ष्म्याश्च अवतारः । (३५) अस्य राज्ञः भुजयुगलेन पारिजातादिस्वर्गतकविटपानां न केवलं आकार एव अहारि, किन्तु याचकेभ्यः अप्राथितं धनं प्रदाय तेषां यशोऽपि अहारि । स्वर्गकल्पवृक्षास्तु प्रार्थितमेव धनं ददति, अयं राजा च अप्राथितमपि ददातीति अस्य तेभ्यो विशेषः । (३६) पारिजातमन्दारादिस्वर्गकल्पद्रुमाः पञ्चसंख्याकाः सन्ति । ते हि वाञ्छितमेव धनं ददति । अस्य राज्ञः पंचशाखः करः वाञ्छितादपि अधिकं धनं ददाति । अतः अस्य राज्ञः करे जाग्रति सति कल्पद्रुमाणां पञ्चत्व- मेव पञ्चसंख्यात्वं मरणं च युक्ततरमेव ।

२ प्रथमः सर्गः ९ न स्म प्रमाद्यति मदेन स मेदिनीशो नापि प्रमाद्यति रिपौ प्रजिघाय शस्त्रम् । नायं क्वचिद् विमुखतां समितौ जगाम प्रत्यर्थिनं न विमुखं पुनरन्वियेष ॥३७॥ वे नरेश कभी दर्प और प्रमाद नहीं करते थे ! न वे शत्रु पर प्रहार करके कभी आलस करते थे । उन्होंने युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाई और न कभी उन्होंने पीठ दिखाने वाले शत्रु का पीछा किया ॥ ३७ ॥ कामं क्रमेण नितरां दुरतिक्रमेण दोर्वििक्रमेण वसुधां वशयाम्बभूव । भूपालरीतिरिति नीतिपथोपनेतृन् नेता स मन्त्रसचिवान् सममभ्यनन्दत् ॥३८॥ जननायक विश्वपति ने अपने अत्यन्त दुर्धर्ष बाहु-बल द्वारा क्रमशः पृथ्वी के राज्यों को अच्छी तरह वश में कर लिया। ऐसा उन्होंने लोभ या स्वार्थवश नहीं किया, किन्तु इसलिये किया कि यह उत्कृष्ट राजाओं की रीति है। और साथ ही साथ उन्होंने नीति के पथप्रदर्शक मन्त्रिमुख्यों का समुचित आदर-सत्कार किया ॥ ३८ ॥ यस्मिन् जयाऽऽहितमतौ समराजिरेषु जातं रजः प्रतिभटेषु तमस्तदेव । सत्वं सपत्नपृतनासु विपक्षजायावक्षोजहारलतिकास्वपि निर्गुणत्वम् ॥३९॥ युद्धक्षेत्र में शत्रुओं को जीतने की इच्छा रखने वाले विश्वपति की सेनाओं से जो धूल ऊपर उठी वह शत्रुओं के लिये अन्धकार बन गई, अपनी सेनाओं के लिये बल और साहस बन गई तथा शत्रुओं की ललनाओं के वक्षःस्थल के हारों के लिये सूत्र तोड़ देने वाली बन गई । युद्धक्षेत्र में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिये विश्वपति में रजोगुण (शत्रुओं को मारने के वीरकर्म में प्रवृत्ति) उत्पन्न हुआ। आश्चर्य है कि वह रजोगुण शत्रुओं के लिये तमोगुण बन गया (अर्थात् शत्रु निश्चेष्ट हो गये और उनकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया) तथा विश्वपति की सेनाओं के लिये सत्वगुण बन गया (अर्थात् उनकी सेनाओं में बलऔर साहस आ गया) और शत्रु-ललनाओं के वक्षःस्थल के हारों के लिये निर्गुण बन गया (अर्थात् वैधव्य की सूचना देते हुए शत्रुललनाओं के हारों का 'गुण' अर्थात् सूत्र टूट गया और हारों के मोती नीचे बिखर गये) ॥ ३९ ॥ पारीन्द्रमेव मृगयन् मृगयां गतोऽसौ नान्यान् जघान घनया घृणया परीतः । नष्टं तदैव परिपन्थिनितम्बिनीनां वक्षोजपत्रमकरीभिरिदं विचित्रम् ॥४०॥ शिकार खेलते समय विश्वपति केवल सिंह को ही खोजते थे । अन्य प्राणियों को मारने में उन्हें बड़ी घृणा होती थी । फिर भी आश्चर्य है कि उनके शिकार के लिये प्रस्थान करते ही वैरि- वनिताओं के वक्षःस्थल के मकराकृति आभूषण निर्जीव से नीचे गिर पड़ते थे । (विश्वपति (३८) अयं राजा नितरां दुरतिक्रमेण दोर्विक्रमेण क्रमेण वसुधां कामं वशयाम्बभूव । इयं भूपालरीतिरिति कारणेन न तु लोभेन । (३९) अस्य राज्ञः सेनायाः गमनेन युद्धस्थले यत् रजः धूलिः रजोगुणजन्यशत्रुमारणप्रवृत्तिश्च उत्थितं तदेव प्रतिभटेषु तमः अन्धकारः तमोगुणजन्यकर्त्तव्यविमूढ़ता च संजातं तद्रूपेण रज एव परिणतमित्यर्थः, स्वसैनि- केषु च सत्वं बलं सत्वगुणजन्योत्साहश्च संजातं, शत्रुललनास्तनहारेषु च निर्गुणत्वं गुणराहित्यं भाविवैधव्यसूचिका 'हारसूत्रत्रुटिश्च संजातम् । रजः एव तमः सत्वं निर्गुणत्वं च संजातमिति महदाश्चर्यम् ।

१० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शिकार के लिये जाते थे किन्तु उनके शत्रु सोचते थे कि उनसे युद्ध करने जा रहे हैं और इस भय से शत्रु-ललनाओं के मकराकृति स्तनाभूषण गिर पड़ते थे मानों उनके भावी वैधव्य की सूचना दे रहे हों।) ॥४०॥ नाश्चर्यमेतदमुमेकमपि द्विषन्तो दोषाहता यदि रणेषु बहूनपश्यन् । एकोऽप्यनेक इव कैरवबान्धवोऽसावाभासते तिमिरताडितलोचनानाम् ॥४१॥ विश्वपति एक होते हुए भी युद्धक्षेत्र में शत्रुओं को अनेक से दिखाई देते थे। तैमिरिक पुरुषों को जिनकी आँखों की ज्योति मन्द पड़ गई है, अन्धकार में एक चन्द्रमा भी अनेक दिखाई देता है ॥४१॥ सम्पद्द्युतोऽपि तरुणोऽपि नराधिपोऽपि नाङ्गीचकार स कदाचन पानलीलाम् । बाणाः पुनः परपुरं सपदि प्रविश्य रक्तासवं निभृतमेव निपीतवन्तः ॥४२॥ विश्वपति यद्यपि सम्पन्न और समृद्ध थे, युवा थे, राजा थे, फिर भी उन्होंने कभी मदिरा नहीं पी। केवल उनके तीक्ष्ण बाण शत्रुओं के शरीरों में घुस कर चुपचाप पर्याप्त मात्रा में रक्त-मदिरा पीते थे ॥४२॥ स्तब्धत्वहेतुमपनीतविशेषदृष्टिं गुर्वङ्कुशानपि हठादवसादयन्तम् । यो वैरिणाञ्च करिणाञ्च तदाश्रितानामत्याजयन् मदमुदञ्चितमञ्चितौजाः ॥४३ ओजस्वी विश्वपति ने वैरि-राजाओं के प्रबल मद को, जिसके कारण वे अभिमान में चूर हो हो रहे थे, उनकी भले और बुरे का विचार करने की विवेक-दृष्टि लुप्त हो गई थी और गुरुजनों के उपदेशों का तिरस्कार करते थे, दूर कर दिया और साथ ही साथ वैरियों के हाथियों के प्रबल मद (दान जल) को भी छुड़ा दिया जिस मद के कारण हाथी उन्मत्त हो रहे थे, उनकी दृष्टि कलावृत हो रही थी और वे महावतों के अंकुशों के भारी आघातों की भी अवहेलना कर रहे थे ॥४३॥ समुल्लङ्घ्य क्षीराम्बुधिमधरितः शीतकिरणः समाक्रान्तं शश्वद् गिरिशगिरिगौरीगुरुपदम् । कृतश्चान्तेवासी भुजगपतिरित्थं विभुतया वितेने यः कीर्त्या भुवनजययात्राविलसितम् ॥४४॥ विश्वपति ने तीनों लोकों में अपनी शुभ्र कीर्ति के द्वारा मानों विजय यात्रा की। क्षीरसागर को पार करके (शुभ्रता में परास्त करके) उनकी कीर्ति आकाश में छा गई और शुभ्रता में चन्द्रमा को फीका कर दिया। मर्त्यलोक में कैलास और हिमालय के गौरीशंकर शिखर पर (धवलता में उनको पराजित करती हुई) फैल गई। पाताल में शेषनाग के पास तक फैल गई मानों शुक्लता में शेषनाग को भी अपना शिष्य बना लिया हो ॥४४॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये प्रथमः सर्गः। (४०) मृगयां गतोऽसौ राजा सिंहमेव हन्ति नान्यान् प्राणिनः। तथापि शत्रुललनास्तनपत्रमकरीभिः नष्ट- मिति विरोधाभासः। मृगयां गतमपि एनं शत्रुस्त्रियः युद्धार्थिनं मत्वा राज्ञः भयात् त्रस्यन्ति, तासां भयजन्यप्रबल- कम्पात् मकराकृतीनि स्तनाभूषणानि भाविवैधव्यभयादिव प्रपतन्ति इत्यर्थः। (४२) परपुरं शत्रुशरीरम्। रक्तासवं रुधिररूपरक्तमदिराम्।

द्वितीयः सर्गः अथ विश्वपतिः क्रमागतं प्रतिपद्यापि स पैतृकं पदम् । अविशिष्टतयाऽन्यभूभृतां न मनस्वी भजते स्म निर्वृतिम् ॥ १ ॥ स्वाभिमानी राजा विश्वपति पैतृक राज्य को पाकर भी, अन्य राजाओं की अपेक्षा स्वयं में कोई असाधारण विशेषता न पाकर, शान्ति न पा सके ॥ १ ॥ सदसि स्पृहणीयसौहृदैः सवयोभिः समशीलचेष्टितैः । न बबन्ध धृतिं स बन्धुभिर्नवहर्म्येषु हिरण्मयेष्वपि ॥ २ ॥ सभा में प्रशंसनीय मैत्रीभाव वाले एवं अवस्था, शील और चेष्टा में समान, बन्धु-वर्ग को पाकर, सुवर्णमय नवीन प्रासादों में भी वे धैर्य धारण न कर सके ॥ २ ॥ करिणः परिणद्धकन्धरा नवशृङ्गारितचारुविग्रहाः । नवनिर्झरमेदुरानना न मुदे तस्य बभूवुरोशितुः ॥ ३ ॥ विशाल गण्डस्थल वाले, नवीन शृङ्गारों से सुसज्जित शरीरवाले, मदजल से गाढ़े चिकने मुखवाले मदोत्कट हाथी भी उन्हें आनन्दित न कर सके ॥ ३ ॥ दिवमुत्पतितुं कृतोद्यमा विनिरुद्धा विनियम्य सादिभिः । अभवञ्जवना वनायुजाः प्रमदायाऽस्य न मेदिनीभुजः ॥ ४ ॥ टापें फटकार कर मानों आकाश में उड़ने की इच्छा रखनेवाले, साईसों द्वारा कठिनाई से रोके जाने वाले, अत्यन्त वेगवाले उत्तम अरबी घोड़े भी उन्हें आनन्द न दे सके ॥ ४ ॥ दयिताधरचारुपल्लवाः कुसुमोद्भेदविजृम्भितस्मिताः । अलिगुञ्जितमञ्जुगीतयो रुरुधुस्तस्य मनो न वीरुधः ॥ ५ ॥ जिनके सुकुमार लाल पत्ते कामिनियों के अधरों के समान सुन्दर थे, जिनके विकसित पुष्प रमणियों की मुस्कान के समान शुभ्र थें, भ्रमरों की गूँज के बहाने जो मानों सुन्दर गीत गा रहीं थीं ऐसी लतायें भी उनके मन को न बाँध सकीं ॥ ५ ॥ सरसीरुहसौरभोज्ज्वला कलहंसीकलनादकोमला । सरसी विमलाशायाप्यलं सरसीकर्तुमभून् न भूभृतम् ॥ ६ ॥ कमलों की सुगन्ध से सुरभित, हंसियों के सुन्दर नाद से मुखरित, स्वच्छ हृदय के समान निर्मल जल से युक्त, मनोहर सरोवरा भी उनके हृदय को सरस न कर सकी ॥ ६ ॥ समये समुदीरितोच्चकैर्जयशब्दैरवदानशंसिभिः । स ननन्द न वन्दिचारणैर्विरुदालीपदबन्धकोविदैः ॥ ७ ॥ समय पर उच्च स्वर से जयशब्द का उच्चारण करने वाले, प्रशस्त कर्मों का वर्णन करनेवाले, प्रशंसा की पंक्तियों को सुन्दर रूप से पद्य-बद्ध करने में निपुण भाट और चारण उन्हें आनन्दित न कर सके ॥ ७ ॥ (४) वनायुजाः पारसीका अश्वाः ।

१२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शिथिलेतरबन्धबन्धुरा सुकुमाराऽपि विदग्धभूपतेः । रसभावनिरन्तराप्यहो ! कविवाणी न विनोदभूरभूत् ॥ ८ ॥ दृढ़ बन्धों से सुन्दर, सुकुमार, रसों और भावों में सनी हुई, कवियों की 'कोमल कान्त पदावली' भी, आश्चर्य है कि, उन सहृदय और विदग्ध नरेश को आनन्दित न कर सकी ॥ ८ ॥ मधुमत्तविदग्धकामिनीभणितादप्यधिकं मनोरमान् । अभिनन्दति न स्म भूपतिः स विपञ्चीकलनिक्कणानपि ॥ ९ ॥ मदिरा से मत्त और कामकला में चतुर कामिनी के सरसं शब्दों से भी अधिक मनोहर, वीणा के सुन्दर स्वर भी उन्हें प्रमुदित न कर सके ॥ ९ ॥ मदनेप्युपदेष्टुमिच्छवः कुटिलभ्रूदलवल्गुचालनैः । नयनान्तनिरस्तरङ्गितैस्तृणयन्त्यस्तरुणीर्नभःसदाम् ॥ १० ॥ सविलासपदाम्बुजार्पणैरनुगृह्णन्त्य इवावनीतलं । प्रमदा न मदालसा मनागपि निन्युर्वशतां विशां पतिम् ॥ ११ ॥ टेढ़ी भौंहों को नचाकर कटाक्षों द्वारा मानों पुष्पधन्वा कामदेव को तीर चलाने की विद्या में उपदेश देने की इच्छा रखनेवाली, अपाङ्गों के विलासों से स्वर्ग की तरुणियों को भी तृणवत् तुच्छ बना देनेवाली, मन्द सविलास चाल के बहाने मानों अपने पदारविन्दों से धरातल को अनुगृहीत करनेवाली, मद में अलस प्रमदायें भी उन राजा को जरा भी वश में न कर सकीं ॥ १०-११ ॥ इति दुर्मनसं मनीषिणं विषये सत्यपि वीतवासनम् । अधिराजतया दुरासदं तमलं बोधयितुं न कश्चन ॥ १२ ॥ विषयों की उपस्थिति में भी वासना-रहित, कठिनता से मिलने योग्य, उन बुद्धिमान् विश्व- पति को खिन्न देखकर भी, उनके राजा होने के कारण, उन्हें कोई समझा न सका ॥ १२ ॥ तनयोऽस्य गुरोरथैकदा सुनयो नामतयोपबृंहितः । समशीलवयो विचेष्टितैरधिरूढः किल बालमित्रताम् ॥ १३ ॥ विश्वपति के गुरु के पुत्र, जिनका नाम सुनय था, अवस्था और शील में इनके समान थे और बचपन के मित्र थे ॥ १३ ॥ वपुषा ललितेन चेष्टितैरभिरामैर्भणितैश्च सूनृतैः । विशदं परितो विकाशयन्ननिशं विश्वजनीनमाशयम् ॥ १४ ॥ सुन्दर शरीर से, कुलीन चेष्टाओं से, सत्य और मधुर वचनों से सुनय सदा सब लोगों के हृदयों को अच्छी तरह प्रफुल्लित करते थे ॥ १४ ॥ द्विगुणं खलु बिम्बमात्मनः सहसाऽऽदर्शसमोपगं दधत् । कलयन्नधिकोज्वलाः कला रुचिमासाद्य च कृत्स्नपक्षगाम् ॥ १५ ॥ (१५) दर्शं अमायां चन्द्रबिम्बस्याभावः, आदर्शो पुरोधसः बिम्बस्य प्रतिबिम्बात् द्विगुणत्वम् । कृत्स्नपक्षगां रुचिं सम्पूर्णपक्षगां जनानां रुचि, कृष्णपक्षे शुक्लपक्षे सर्वत्र समानकान्ति च । कलाः वेदिनिर्माणलेखाद्याः विद्याः चन्द्रकलाश्च ।

द्वितीयः सर्गः १३ न च वक्रतया विकारितो न कलङ्केन कदाचिदङ्कितः । श्रितवान् नहि जातु वारुणीं न च दोषाकरतामुपागतः ॥१६॥ तमसा न तिरस्कृतः क्वचित् प्रतिपक्षो वपुषा मनोभुवः । अपरो ननु कोऽपि निर्मितो द्विजराजः कुतुकेन वेधसा ॥१७॥ ब्रह्मा ने कौतुकवश सुनय का एक अद्वितीय 'द्विजराज' (श्रेष्ठ ब्राह्मण; चन्द्रमा) के रूप में निर्माण किया था। जब कभी वे दर्पण (आदर्श) के समीप जाते थे तो उनके शरीर-बिम्ब की शोभा (प्रतिबिम्ब के कारण) द्विगुणित हो उठती थी (चन्द्र-बिम्ब तो 'दर्श' अर्थात् अमावस्या के समीप जाने पर लुप्त हो जाता है)। सुनय सब वर्गों के (कृत्स्न पक्ष के) लोगों की प्रीति (रुचि) प्राप्त करके अपनी सारी कलाओं से सदा ही अत्यधिक उज्ज्वल और उन्नत बने रहते थे (चन्द्रमा शुक्लपक्ष की रुचि अर्थात् कान्ति पाकर क्रमशः एक एक कला से बढ़ता है)। सुनय सरल स्वभाव के होने के कारण कभी कुटिलता से दूषित नहीं हुए (चन्द्रमा

१४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् रहसि स्थितमाहितस्थितिः समयज्ञः समये समेत्य तम् । इदमानतकन्धरः शनैरधिगम्यानुमतिं न्यवेदयत् ॥२१॥ विशाल कंधों वाले, परिस्थिति को समझने वाले, समय को जानने वाले वे सुनय एक दिन अनुकूल समय देख कर एकान्त में स्थित राजा विश्वपति के पास गये और उनसे आज्ञा लेकर इस प्रकार निवेदन किया ॥ २१ ॥ उपदिष्टमुपायदर्शिभि र्न विना प्रश्नमुदीरयेत् क्वचित् । इति सर्वत एव सज्जते किमुताऽधृष्यतमेषु राजसु ॥२२॥ नीति-कुशल विद्वानों का उपदेश है कि बिना प्रश्न किये गये उत्तर नहीं देना चाहिये। यह सामान्य नियम सब जगह लागू है, फिर स्वतन्त्र नरेशों की तो बात ही क्या ॥ २२ ॥ अतिविस्मयिनों तथापि ते नृप निर्वेदनिवेदिनीं स्थितिम् । अवलोक्य वितर्कविकलं हृदयं मे दिशति प्रगल्भताम् ॥२३॥ फिर भी खिन्नमनस्कता और निर्वेद को प्रकट करने वाली तथा अत्यन्त आश्चर्य में डाल देने वाली आपकी इस दशा को देखकर तर्क-वितर्क से पीड़ित मेरा हृदय आपकी सेवा में कुछ निवेदन करने के लिये, हे राजन् ! मुझे प्रेरित कर रहा है ॥ २३ ॥ इयमायतिमञ्जुला मही महनीयोज्वलविक्रमेण ते । चिरमुद्धतवैरिकण्टका सुतरां पाणितलावलम्बिनी ॥२४॥ यह विशाल और सुन्दर पृथ्वी, जिसके शत्रुरूपी काँटों को आप, अपने श्लाघ्य और उज्ज्वल पराक्रम से, पहले ही उखाड़ कर फेंक चुके हैं, आपके अधिकार में हैं ॥ २४ ॥ प्रणयैः सुहृदः सभाजिता महसा विद्विषतां सभा जिता । चरितैर्जगदुत्तरैस्त्वया जगदेतन् नृपतेऽनुरञ्जितम् ॥२५॥ आपने मित्रों का सस्नेह सत्कार किया है और अपने तेज से शत्रुओं की सभा को जीत लिया राजन् ! आपने अपने अलौकिक कृत्यों से इस जगत् को प्रसन्न और अनुरक्त बना रक्खा है। ॥ २५ ॥ नितरां निरुपप्लवाः प्रजा वसुपूर्णा वशगा वसुन्धरा । परितः परितर्पितो मखैः समये वर्षति वारि वासवः ॥२६॥ प्रजा को किसी प्रकार के संकट का भय नहीं है। वसुन्धरा (पृथ्वी) अपने नाम को सार्थक करती हुई वसु (धन धान्य) से पूर्ण है और आपके वश में है। चारों ओर यज्ञ होते रहते हैं जिनसे तृप्त होकर इन्द्र समय पर वर्षा करता रहता है ॥ २६ ॥ तव जाग्रति दोर्युगे भुवो धुरि धुर्ये प्रतिलब्धविभ्रमाः । करियूथपकैतवादमी धृतसेवाः सविधे कुलाद्रयः ॥२७॥ आपके पृथ्वी का भार उठाने में समर्थ भुजयुगल के इस कार्य में प्रवृत्त होने पर कुलाचल पर्वत ही मानों अवकाश पाकर बड़े बड़े हाथियों के बहाने आपकी सेवा में संलग्न हैं ॥ २७ ॥

द्वितीयः सर्गः १५ अमितैः परितो विस्तृतरैर्वसुविश्राणननीरनिर्झरैः । अपि जाङ्गलभूमयस्त्वया विहितास्तावददेवमातृकाः ॥२८॥ आपके दानसंकल्प के अपार जल की जो नदियाँ चारों ओर वह निकली हैं उनके कारण जंगली देश भी 'अदेवमातृक' अर्थात् 'नदीमातृक' (वह भूमि जहाँ नदी या नहरों से सिंचाई होती है) बन गये हैं ॥ २८ ॥ अभिरामतरं निरामयं भवतो वीक्ष्य वपुर्वधूजनः । नरदेव निरादरोऽभवद् भिषजोर्नाकनिवासिनोरपि ॥२९॥ हे नरदेव ! आपके अत्यन्त सुन्दर और स्वस्थ शरीर को देखकर रानियों के मन में स्वर्ग के वैद्य अश्विनीकुमारों के सौन्दर्य और वैद्य विद्या के प्रति कोई आदर नहीं रहा है ॥ २९ ॥ इति ते कृतकृत्यता मया कृतिनां नायक निश्चिता धिया । सुविचारयताऽपि दृश्यते न च निर्वेदनिदानमण्वपि ॥३०॥ कर्मठ पुरुषों में श्रेष्ठ ! मेरी मति के अनुसार तो आपको जो कार्य करने चाहिये थे वे सब आप कर चुके हैं। खूब विचार करने पर भी मुझे आपके खेद का ज़रा भी कारण नहीं दिखाई देता ॥३०॥ रिपवो वनगोचरा अपि स्फुटमुत्साहविपर्ययं तव । निशमय्य विधातुमिच्छवः पुनराशाङ्कुरमात्मनो हृदि ॥३१॥ आपके शत्रु जो इस समय आपके भय से वन में छिप रहे हैं आपकी उदासीनता और निर्वेद की खबर सुनकर फिर अपने मन में आशा का अंकुर उपजाना चाहते हैं ॥ ३१ ॥ विधुरं ध्रुवमप्रसादतः सदसि प्रेक्ष्य सदोशितुर्मुखम् । न च नोद्विजतेऽनुजीविनां हृदयं भूरिवितर्कसङ्कुलम् ॥३२॥ सभा में आपका अप्रसन्न और उदासीन मुख देखकर आपके शुभचिन्तकों के हृदय नाना प्रकार के संकल्प-विकल्पों से पीड़ित होकर व्याकुल हो जाते हैं ॥ ३२ ॥ सरितां पतिरप्यधीरतां भजते कारणगौरवात् क्वचित् । न कदापि मनो महीयसां प्रलयेऽपि प्रतियाति वैकृतम् ॥३३॥ समुद्र भी ज्वार के समय (चन्द्रमा के प्रेम के) गुरुकारणवश अधीर हो उठता है, किन्तु महान् पुरुषों का मन प्रलय में भी विकृत नहीं होता ॥ ३३ ॥ विषयेष्वधिका विरागिता विजनेषु स्पृहयालुता तथा । शमिनां समवैति शर्मणे महसाक्रान्तभुवां न भूभुजाम् ॥३४॥ विषयों में अधिकाधिक वैराग्य और अधिकाधिक एकान्तप्रेम निवृत्तिमार्ग के लोगों के लिये कल्याणकारक होते हैं, अपने तेज से पृथ्वी को वश में रखने वाले राजाओं के लिये नहीं ॥ ३४ ॥ (२८) अदेवमातृकाः नदीमातृकाः नद्यः मातरः धान्यादिसंवर्धनेन पालिकाः येषां ते । (२९) राज्ञः वपुषा स्वर्वैद्यौ अश्विनौ सौन्दर्ये अधःकृतौ, निरामयत्वात् च उपेक्षितौ तद् दृष्ट्वा वधूजनस्तयोः निरादरोऽभूत् ।

१६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् तनया महतां महीभृतां परिणीता हरिणीदृशस्त्वया। नयनान्तनिदेशपात्रतामपि यासामभिनन्दति स्मरः ॥३५॥ बड़े बड़े राजाओं की मृगनयनी कुमारियों का आपने पाणिग्रहण किया है जिनकी आँखों के इशारे पर नाचने में कामदेव अपना गौरव समझता है ॥ ३५ ॥ जनिता न धुरन्धराः सुताः प्रमदाः प्रेमभरेण नादृताः। नहि सौम्य शमः समञ्जसस्तरुणस्त्रीप्रथमातिथौ तव ॥ ३६ ॥ न तो आपने अभी राज्य-भार सँभालने योग्य राजकुमार ही उत्पन्न किये हैं और न आपने अभी रानियों का प्रेम-सत्कार किया है। स्त्रियों के तारुण्य की प्रथम तिथि में ही आपको इस प्रकार का वैराग्य शोभा नहीं देता ॥ ३६ ॥ क्व तनुर्नवयौवनाश्रया क्व विरागस्तव देव दारुणः। न निदाघकठोरमातपं सुकुमारा सहते हि माधवी ॥३७॥ देव ! कहाँ तो आपका

३ द्वितीयः सर्गः १७ इतिवादिनमादिवर्णजं सुनयं सूनृतभाषितेन सः। अवदद् वदतां वरो नृपः स्वरशिष्यायितनूतनाम्बुदः ॥४२॥ ब्राह्मण-श्रेष्ठ सुनय के ये वचन सुन कर गंभीर घोष से नवीन मेघ को अपना शिष्य बनाने वाले, बोलने में कुशल, राजा विश्वपति ने इस प्रकार सत्य बात कही ॥ ४२ ॥ अनुकूलतरेण यत् त्वया वचनं सम्प्रति सोपपत्तिकम् । प्रणयात् प्रणिधाय भाषितं हृदयं प्रह्वयतीव तन् मम ॥४३॥ आपने जो स्नेहवश सावधान मन से युक्तियुक्त और अत्यन्त अनुकूल बातें कहीं उनको सुन कर मेरा मन बहुत विनीत हुआ है ॥ ४३ ॥ तदपि स्वमहं विभावयन् बत साधारणमन्यपार्थिवैः। न मनो विनियन्तुमुत्सहे वशगायामपि सर्वसम्पदि ॥४४॥ तथापि मैं अपने आपको अन्य राजाओं के समान साधारण समझ रहा हूँ और इसीलिये सब प्रकार की सम्पत्ति होते हुये भी, मैं अपने मन को शान्ति देने में समर्थ नहीं हो पा रहा हूँ॥४४॥ हरभूधरतोऽपि शाश्वती यदि जागर्ति न कीर्तिरुज्ज्वला । तरुणीनयनान्तचञ्चलैः किमु साम्राज्यसमुद्भवैः सुखैः ॥४५॥ यदि कैलास पर्वत से भी अधिक शुभ्र और अधिक चिरस्थायी कीर्ति इस विश्व में व्याप्त न रहे, तो तरुणी स्त्रियों के कटाक्ष के समान चञ्चल और क्षणिक साम्राज्य से उत्पन्न होने वाले सुखों से क्या लाभ ? ॥४५॥ अधिगम्य निरुढमाशयं किल रत्नाकरमेखलापतेः । द्रुतमस्य विगाहनक्षमां प्रतिपेदे सुनयः सरस्वतीम् ॥४६॥ समुद्र-रशना पृथ्वी के पति विश्वपति के हृदय में रूढ़ इस आशय को समझ कर सुनय ने शीघ्र इस आशय की प्राप्ति के उपाय बताने में समर्थ ये वचन कहे ॥ ४६ ॥ प्रतिपालनमंत्र वस्तुनः सुधियस्तद्वदलब्धसाधनम् । द्वयमाहुरिहेष्टसाधनं तदुपायाः परमुद्यमाः परे ॥४७॥ विद्वान् लोग इष्ट साधन के लिये दो बातें (योग और क्षेम) बताते हैं—प्राप्त वस्तु की रक्षा (क्षेम) और अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति (योग) । अन्य सब उद्योग इन्हीं के उपाय हैं ॥ ४७ ॥ अनयोः प्रथमे प्रवर्तते नियतं सर्वजनः प्रयत्नतः । विरमत्यपि नाऽऽफलोदयं तदसिद्धौ महदेव दुर्यशः ॥४८॥ इनमें से पहली बात के लिये—प्राप्त वस्तु की रक्षा के लिये—सभी लोग सदा प्रयत्नशील रहते हैं और सफलता मिलने तक प्रयत्न नहीं छोड़ते क्योंकि प्राप्त वस्तु की रक्षा न करने में तो बड़ी भारी अपकीर्ति है ॥ ४८ ॥

१८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अपरं तु निरन्तरं गुणैर्नयविक्रान्तिमुखैः प्रसाधयन् । लभतेऽद्भुतकीर्तिसत्कृतिं यदि न स्यान् मदतो विकत्थनम् ॥४९॥ किन्तु नीति के अनुरूप गुणों से निरन्तर प्रयत्नशील धीमान् पुरुष अप्राप्त को प्राप्त करके अद्भुत यश से सत्कृत होते हैं, यदि वे प्रमादवश डींग मारकर गुप्त उपायों को प्रकट न कर दें॥४९॥ कति न क्षितिरक्षिणः क्षिताविह जाताः परिभोगलालसाः । गणयन्ति जनास्तमेव तु त्रिजगद् यस्य यशोभिरुज्वलम् ॥५०॥ इस पृथिवी पर अनेक राजा हो गये हैं जो केवल भोग-विलास ही में लिप्त रहे। उन्हें आज कोई जानता भी नहीं। लोग उन्हीं को याद रखते हैं जो अपने सुयश से तीनों लोकों को उज्वल बना जाते हैं ॥५०॥ अवनीमवनीशवंशजा वशयन्तः कुलजेन तेजसा । सुकृतैरुपभुञ्जते परं न हि तत्राधिकविक्रमः क्रमः ॥५१॥ प्रायः राजाओं के वंशज अपने कुल परम्परागत ऐश्वर्य के कारण पृथिवी को अपने वश में रख कर अपने पुण्यों से राज्य-सुख का उपभोग कर लेते हैं। इसमें उनका अपना कोई अधिक पराक्रम नहीं ॥५१॥ यदि कश्चन जायते पुमानिह विश्वोद्यमबुद्धिपौरुषः । स समुज्ज्वलयन् निजान्वयं ध्वनयत्युद्भटकीर्तिडिण्डिमम् ॥५२॥ किन्तु जो राजा अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा और अप्रतिहत पौरुष से विश्व को अपने वश में करता है वही अपने कुल को उज्वल बनाता है और उत्कृष्ट कीर्ति का ढिंढोरा पीट जाता है ॥५२॥ महसां निधयो महोदधेर्मणिवर्गाः कति वा न जज्ञिरे । हरिकण्ठतटाधिरोहणात् परमेकः प्रथितोऽस्ति कौस्तुभः ॥५३॥ समुद्र में से (मन्थन के समय) नाना प्रकार के अत्यन्त उज्वल और प्रकाशमान मणियों के समूह निकले, किन्तु भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल पर स्थान प्राप्त कर लेने के कारण एक कौस्तुभ मणि ही आज तक विख्यात है ॥५३॥ मनुवंशभवो भगीरथस्त्रिजगद्गीतयशा विशालधीः । रघुपङ्क्तिरथादयः परे प्रथितास्ते पृथगद्भूतैर्गुणैः ॥५४॥ मनुवंश में जन्म लेने वाले महात्मा भगीरथ का यश आज भी तीनों लोकों में गाया जाता है। रघु और दशरथ आदि भी अपने अद्भुत गुणों के कारण विख्यात हैं ॥५४॥ अपरस्तव पूर्वजेषु कः प्रथितो दीक्षितवासुदेवतः । स्वयमर्जितमूर्जितौजसा नवराज्यं नृवरः शशास यः ॥५५॥ आपके पूर्वजों में भी दीक्षित वासुदेव के समान और कौन प्रतापी हुआ ? वासुदेव ही थे जिन नर-रत्न ने अपने भुजबल के तेज से नवीन राज्य स्थापित कर शासन किया ॥५५॥

द्वितीयः सर्गः १९ इतरोऽपि तदन्वयोद्भवोऽजयपालः स कथं न गण्यताम् ! उपपुष्करमन्यदुष्करं निरमाद् योऽजयमेरुदुर्गकम् ॥५६॥ हाँ, उनके वंश में जो अजयपाल हुए उनकी गिनती भी क्यों न की जाय ? क्योंकि उन्होंने पुष्कर तीर्थ के समीप अन्य लोगों के लिये दुष्कर अजयमेरु (अजमेर) दुर्ग का निर्माण किया ॥५६॥ श्रमविक्रमनीतिरीतिभिस्त्वमसाधारणमर्जयन् यशः । भवितासि भुवि प्रतिष्ठितो ध्रुवमाकल्पमनल्पपौरुषः ॥५७॥ महापौरुषवान् आप पराक्रम और राजनीति की रीतियों से असाधारण यश प्राप्त करके प्रलय-काल तक इस संसार में निश्चित ही प्रतिष्ठित हो जायेंगे ॥ ५७ ॥ मतिमानतिमानुषं यशः पदवीं वा प्रतिपित्सुरुच्छ्रिताम् । तपसा जपसाधनेन वा वरिवस्येद् विधिनेष्टदेवताम् ॥५८॥ जो बुद्धिमान् अतिमानुष यश अथवा अलौकिक पद प्राप्त करना चाहता है उसे चाहिए कि विधिपूर्वक तप और जप के साधन से इष्ट देवता को प्रसन्न करे ॥ ५८ ॥ अखण्डब्रह्माण्डं सहचरितगाण्डीववलयः स्वदोर्दण्डेनैव प्रसभमपहर्तुं प्रभुरपि । समाराध्य श्रद्धासमुचिततपोभिः पशुपतिं प्रपेदे रौद्रास्त्रं स किल नरनामा नरहरिः ॥५९॥ मनुष्यों में श्रेष्ठ अर्जुन, जिनका दूसरा नाम 'नर' भी था, सदा साथ रहनेवाला गाण्डीव धनुष ही जिनका वलय था, और जो अपने भुज-दण्ड के पराक्रम से सारे ब्रह्माण्ड को हठात् वश में करने में समर्थ थे, उन्होंने भी पूर्ण श्रद्धा के साथ उचित तपस्या करके भगवान् शंकर को प्रसन्न किया और उनसे रौद्रास्त्र प्राप्त किया। ॥ ५९ ॥ त्वमप्येवं देवं कमपि सुखसेवं परतरं भजञ्छ्रद्धा श्रद्धाधिकतरविशुद्धाशयतया । अरण्ये पुण्ये वा क्वचन पशुशून्येऽपि विषये ध्रुवां सिद्धिं विद्धि प्रगुणितसमृद्धिं करगताम् ॥६०॥ आप भी अब किसी पवित्र वन में या किसी प्राणि-शून्य निर्जन स्थान में पूर्ण श्रद्धा से अपने हृदय को विशुद्ध करके किसी परात्पर, सुख से सेवा किये जाने योग्य, आशुतोष देवता का भजन करें और निश्चय ही प्रगुणित समृद्धि से युक्त सिद्धि को अपनी मुट्ठी में आई हुई समझें ॥ ६० ॥ शुम्भाऽसुरप्रशमनी सकलार्थदात्री शाकम्भरी जनपदे भवति प्रतीता । आराधयन्नभिमतां परदेवतां तां वीतान्तरायमवधारय सिद्धमर्थम् ॥६१॥ शुम्भ दैत्य को मारने वाली, सम्पूर्ण सिद्धियों को देनेवाली, भगवती इस देश में (साँभर में) शाकंभरी के नाम से प्रसिद्ध है। इन परमपूज्य परदेवता भगवती की आराधना करके आप विघ्नों को नष्ट और अर्थ को सिद्ध समझें ॥ ६१ ॥

२० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इति गिरमनुरूपां नीतिसौहार्दरीत्योः सुनयमुखसमुत्थां सोपि सम्यग्विचार्य । नरपतिरतिभूमिं प्राप्तया मोदलक्ष्म्या विकसितवदनश्रीरादरादभ्यनन्दत् ॥६२॥ चरम सीमा को प्राप्त हुई प्रसन्नता के कारण विकसित हुईं मुख की शोभा से युक्त राजा विश्वपति ने सुनय के मुख से निकले हुए नीति और मित्रता की रीति के अनुकूल वचनों को अच्छी तरह सोच समझ कर बड़े आदर के साथ उनका अभिनन्दन किया ॥ ६२ ॥ अथ सुनयसहायः सम्यगह्नि प्रसन्नः परिणतसचिवेषु स्वां धुरं सन्निवेश्य । गिरिविपिनविहारव्याजतो राजवर्यः परिमितपरिवारः प्रौढसारः प्रतस्थे ॥६३॥ इसके बाद विनम्र मन्त्रियों पर अपने राज्य का भार छोड़कर, सुनय के साथ एक दिन शुभ मुहूर्त में बलवान् और प्रसन्न राजा विश्वपति ने इने-गिने लोगों को साथ लेकर वनों और पर्वतों में विहार करने के बहाने (शाकंभरी देवी के मन्दिर की ओर) प्रस्थान किया ॥ ६३ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये द्वितीयः सर्गः

तृतीयः सर्गः पुरस्कृतः पार्श्वचरैरथाल्पैः प्रजेश्वरः पुष्परथाधिरूढः । प्रसन्नचेता दिवसे प्रशस्ते द्विजैः कृतस्वस्त्ययनः प्रतस्थे ॥ १ ॥ उस शुभ दिन प्रसन्नचित्त राजा विश्वपति ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवा कर, इनेगिने अनुचरों को अपने आगे करके, पुष्पों से सज्जित रथ पर आरूढ़ होकर चले ॥ १ ॥ तमन्वगान् मानवदेवमुच्चैः प्रेमानुबन्धेन वशो वयस्यः । यशो जगत्सु प्रथयिष्यमाणं राजा ऋतूनामिव कामदेवम् ॥ २ ॥ निकट भविष्य में ही विश्व में अद्वितीय यश को पर्याप्त मात्रा में फैला देने वाले उन नरपति विश्वपति के पीछे, कामदेव के पीछे ऋतुराज वसन्त के समान, दृढ़ प्रेम-पाश में बँधे हुए मित्र सुनय चल रहे थे ॥ २ ॥ तमुत्तराशां तरसा प्रयान्तं तेजःप्रकर्षं प्रतिलप्स्यमानम् । गुरोस्तनूजोऽनुजगाम धाम्नामधीशमह्नाय यथा निदाघः ॥ ३ ॥ उत्तर दिशा की ओर वेग से प्रयाण करने वाले और शीघ्र ही और भी उत्कृष्ट तेज को प्राप्त करने वाले उन तेजःपुञ्ज विश्वपति के पीछे, उत्तरायण और प्रचण्ड सूर्य के पीछे ग्रीष्म ऋतु के समान, गुरु-पुत्र सुनय चल रहे थे ॥ ३ ॥ अनुप्रयाणाय कृतानुबन्धान् निवर्त्य बन्धून् वसुधाधिनाथः । संभाव्य पौरानपि पौरकान्तः कान्तैर्वचोभिर्निरियाय पुर्याः ॥ ४ ॥ साथ चलने का प्रयत्न करनेवाले बन्धु-वर्ग को राजा ने वापस लौटा दिया। मधुर वचनों से प्रजा का सत्कार कर वै प्रजाप्रिय नरेश नगरी के बाहर चले गये ॥ ४ ॥ समश्नुवानान् स्वपरोपतापाद्वह्निप्रवेशोग्रतपःफलानि । कुम्भस्तनीभिः परिरब्धकण्ठान् संभावयामास स पूर्णकुम्भान् ॥ ५ ॥ अपने उत्कृष्ट परिपाक के लिये जो अग्नि-प्रवेश रूपी कठिन तप किया था मानों उसी का पुण्य फल भोगने वाले, घट के समान पीवर स्तन वाली कामिनियों द्वारा आलिंगित कण्ठ वाले, जल से भरे हुए, घड़ों का (शुभ शकुन होने के कारण) राजा ने स्वागत किया (अथवा कलश बँधाने की प्रथा पूर्ण की) ॥ ५ ॥ (२) प्रथयिष्यमाणं विस्तृतं करिष्यमाणम् । (४) पौरेषु पौराणां वा कान्तः मनोहरः प्रजाप्रियश्चेत्यर्थः । (५) स्वस्य यः पर उत्कृष्ट उपतापरूपः सन्तापरूपो वह्नौ प्रवेशस्तदेवोग्रं तपस्तस्य फलानि समश्नु- वानान् उपभुञ्जानान् । संभावयामास इति पदेन शुभशकुनरूपत्वादपि राज्ञस्तत्राऽऽदरातिशयो व्यञ्जितः।

२२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मालाः सिताम्भोजदलाभिरामा नृपः पताका इव कार्यसिद्धेः । प्रसारितास्ता अपि चारुदृष्टीः प्रत्यग्रहीन् मालिकनागरीणाम् ॥ ६ ॥ कार्यसिद्धि की पताका के समान शोभित होने वाली एवं मालिन स्त्रियों द्वारा पहनाई गईं श्वेत कमल दल की सुन्दर मालाओं को, उन स्त्रियों के मनोहर कटाक्षों के साथ साथ, राजा ने ग्रहण किया ॥ ६ ॥ तस्योपरिष्टात् परितः पतन्तं निवारयन्तो रविरश्मिजालम् । विनैव दण्डेन शरत्पयोदाः सितातपत्रत्वमयुस्तदानीम् ॥ ७ ॥ राजा के ऊपर चारों ओर से गिरनेवाले सूर्य की किरणों के समूह को रोक कर शरद् ऋतु के शुभ्र बादल उस समय बिना दण्ड के श्वेत छत्र के समान सुशोभित हुए ॥ ७ ॥ गन्धानुमेयानपनोतनिद्रसरोजराजीमकरन्दबिन्दून् । उपाहरन्तो मिहिरांशुतप्तं सिषेविरे तं सरसीसमीराः ॥ ८ ॥ सरोवरों के शीतल पवन, जो प्रफुल्ल कमलों की पंक्तियों के मकरन्द-बिन्दुओं से सुगन्धित थे, सूर्य की किरणों से तप्त राजा की सेवा कर रहे थे ॥ ८ ॥ पर्यन्तमासाद्य ततः पदव्या दिनैः कियद्भिः सुकृती सुखेन । पूर्वोपदिष्टं सुनयेन दूराच्छाकम्भरीदेशमपश्यदग्रे ॥ ९ ॥ पुण्यात्मा राजा कुछ दिनों में सुखपूर्वक मार्ग के अन्त तक जा पहुँचे और सुनय द्वारा पहले बताया गया सांभर देश उन्होंने दूर से अब अपने आगे देखा ॥ ९ ॥ ज्ञातस्तदाऽभ्रङ्कषया विदूराद् देव्याः पुरो हर्म्यपताकयैव । नृपाय तस्मै पुनरुक्तवाग्भिरावेदितो जानपदैः स देशः ॥१०॥ विश्वपति बहुत दूर पहले से ही शाकंभरी देवी के मन्दिर की आकाश को छूने वाली पताका को देख कर उस देश को पहचान गये थे । वहाँ पहुँचने पर जब लोगों ने उस देश का नाम बताया तो उसकी पुनरुक्ति मात्र हुई ॥ १० ॥ दृष्ट्वा जयन्तीमथ वैजयन्तीमानन्दतः स्यन्दनतोऽवरुह्य । साष्टाङ्गपातः मुहुरष्टमूर्तेः कुटुम्बिनीं विश्वपतिर्ववन्दे ॥११॥ विजय से फहराती हुई मन्दिर की पताका को पास देखकर राजा विश्वपति बड़े आनन्द से रथ से उतर गये और भगवान् शिव की अर्द्धांगिनी भगवती शाकंभरी की बार बार साष्टाङ्ग प्रणामों द्वारा वन्दना की ॥ ११ ॥ पुरोपकण्ठं प्रतिपत्स्यमानं पुरोधसा तेन समं निशम्य । प्रत्युद्ययुः पौरजनाः प्रमोदान् नृपोचितोपायनपाण्यस्तम् ॥१२॥ यह सुन कर कि पुरोहित सुनय के साथ राजा अब शीघ्र नगर के समीप पहुँच जायेंगे, वहाँ के प्रजा जन बड़ी प्रसन्नता से राजा को भेंट देने योग्य वस्तुयें हाथों में ले लेकर पहुँचे ॥ १२ ॥

तृतीयः सर्गः २३ आतिथ्यसम्भारभरां सपर्यां प्रगृह्य तेषां सुमनाः स राजा । प्रश्नैरुदारैः कुशलप्रदानैरनुग्रहो विग्रहवान् बभूव ॥१३॥ नृपोचित आतिथ्य की वस्तुओं से युक्त उन भेटों को ग्रहण कर विशाल हृदय वाले राजा ने बड़े प्रेम से उन प्रजाजनों से कुशल-प्रश्न पूछे और राजा उनके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह बन गये ॥ १३ ॥ तत्रैव बाह्योपवनेऽतिवाह्य निशीथिनीं तां शिथिलाध्वखेदः । प्राप्तः परेद्युः प्रयतान्तरात्मा पतिः प्रजानामविशत् पुरं तत् ॥१४॥ संयमी राजा विश्वपति ने नगर के बाह्य उपवन में ही वह रात बिता कर मार्ग का श्रम दूर किया और दूसरे दिन नगर में प्रवेश किया ॥ १४ ॥ स ग्रामसीम्नामवस्थितान् तान् विनायकादीन् विनयात् प्रणम्य । अपश्यदाश्चर्यतरङ्गितात्मा तरङ्गिणीरोधसि पुष्पवाटीम् ॥१५॥ गाँव की सीमा पर स्थित गणेश आदि देवताओं को सविनय प्रणाम कर, आश्चर्य से उद्वेलित [

२४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् यस्यां निनादैर्विशदच्छदानां पुंस्कोकिलानां कलकण्ठनादैः । स्पर्धाऽनुबन्धीनि विरामशून्यं विरेजिरे बर्हिणकूजितानि ॥१९॥ जहाँ हंसों और सारसों के मधुर निनाद को तथा कोकिलों के मनोहर कण्ठस्वर को सुन सुन कर मोर मानों स्पर्धा से निरन्तर कूज रहे थे ॥१९॥ यस्यां लवङ्गीमपि मल्लिकां च जातीं च रोलम्बयुवाऽवलम्ब्य । पिबन् मुहुः स्तोकतरं मरन्दं चकार तासामिव तारतम्यम् ॥२०॥ जहाँ युवा भ्रमर लवङ्गी, मल्लिका और जाति के फूलों का थोड़ा थोड़ा मकरन्द रस बार बार पीकर मानों उनके उत्कर्षापकर्ष की परीक्षा ले रहा था ॥२०॥ स्वर्नायिकाकल्पितकर्णपूरमन्दारगुत्सेन सहावतीर्णाः । यत्पुष्पवल्लीषु विलासलोलाः पुनर्न दध्युस्त्रिदिवं द्विरेफाः ॥२१॥ (भगवती के दर्शनार्थ आने वाली) स्वर्ग की देवियों के कानों में पहने गये मन्दार पुष्पों के गुच्छों के साथ-साथ उस उद्यान में उतरने वाले भ्रमर वहाँ की पुष्पवल्लियों के साथ विलास में अनुरक्त होकर फिर वापस स्वर्ग जाने का नाम नहीं लेते थे ॥२१॥ दृशोरिदम्पूर्वतया विशेषादाकर्षणों तामवलोकमानः । विशां पतिर्विस्मयविस्मृतेन नासीन् निमेषेण कृतान्तरायः ॥२२॥ उस पुष्पवाटिका की प्रत्येक वस्तु अनुपम सुन्दर होने के कारण नेत्रों को मानों 'पहले मुझे देखिये' कह कर विशेष रूप से आकर्षित कर रही थी । राजा विश्वपति अत्यन्त आश्चर्य से चकित होकर उसे निर्निमेष देखने लगे ॥२२॥ ततो भृतोत्साहभरे नरेन्द्रे निधाय दृष्टिं स निधिर्गुणानाम् । जगाद योग्यं जगदम्बिकाया विगाहमानः सुनयो वनान्तम् ॥२३॥ तब गुणनिधि सुनय ने जगदम्बा के उस उद्यान में प्रवेश किया और उत्साह से भरे हुये राजा पर दृष्टि डाल कर उस समय के योग्य इस प्रकार निवेदन किया ॥२३॥ उद्यानमेतन् मदनारिपत्न्याः सदृतुभिः षड्भिरुपास्यमानम् । निषेवमाणो विजितारिष्टकः समश्नुते षण्मुखगां समृद्धिम् ॥२४॥ कामदेव को भस्म करने वाले भगवान् शिव की अर्द्धाङ्गिनी भगवती पार्वती का यह उद्यान सदा छहों ऋतुओं (वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त और शिशिर) से सुशोभित रहता है । यहाँ रह कर छहों शत्रुओं को (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य को) जीतने वाला भगवती का भक्त देव-सेनापति स्वामी कार्तिकेय की सी दिव्य समृद्धि प्राप्त कर लेता है ॥२४॥ भृङ्गावलीझङ्कृतिसङ्कुलेन वनप्रियाणां कलकूजितेन । तिरोहितं पञ्चमगीतमस्मिन्नाकर्ण्यते किन्नरकामिनीनाम् ॥२५॥ भ्रमरों की पंक्तियों की गूंज के साथ मिश्रित कोकिलों के मधुर पञ्चम स्वर के कारण यहाँ किन्नरों की कामिनियों द्वारा पञ्चम स्वर में गाये गये गीत सुनाई नहीं देते ॥२५॥ (१९) विशदच्छदानां हंसानाम् ।

४ तृतीयः सर्गः २५ कदम्बवीथीमनुवेदिमध्यमध्यासिता व्योमसदां सुमध्याः । अस्मिन् भवानीमुपवीणयन्ति वाणीमुखादुल्लसितैः प्रबन्धैः ॥२६॥ यहाँ कदम्बों के कुञ्ज के पास बनी हुई वेदी के बीच में बैठ कर स्वर्ग की पतली कमर वाली देवियाँ स्वयं सरस्वती के मुखारविन्द से निकले हुये स्तुतिगीतों को वीणा पर बजाते हुये गाकर भगवती की आराधना किया करती हैं ॥२६॥ अस्यान्तरे सन्ततरत्नजालैर्हिरण्मयोऽसौ खचितः समन्तात् । प्रासादराजो गिरिराजपुत्र्याः पुरोऽपरो राजति रत्नसानुः ॥२७॥ इस उद्यान के बीच में वह सामने दिखाई देने वाला देवी पार्वती का भव्य मन्दिर जो सोने का बना है और जिसमें चारों ओर देदीप्यमान रत्न जड़े हैं एक दूसरे रत्नशिखर के समान शोभित हो रहा है ॥२७॥ विनिर्मितं हीरदलैरुदारैः प्रालम्बिमुक्तालतिकं समन्तात् । दण्डं महानीलमयं दधानं पश्यातपत्रं सितमद्रिपुत्र्याः ॥२८॥ चारों ओर बड़े-बड़े मोतियों से जड़ा हुआ और अमूल्य हीरों के समूहों से बना हुआ तथा महानील मणियों (नीलम) से बने हुये लम्बे दण्ड वाला भगवती पार्वती का यह श्वेत छत्र देखिये ॥२८॥ श्रियं सितच्छत्रतले दधाति दण्डो महानीलविनिर्मितोऽयम् । स्वर्भानुदन्तव्रणवर्त्मनाऽधःपतन्निवेन्दोस्तनुरेखयाङ्कः ॥२९॥ श्वेत छत्र के नीचे यह महानील मणियों (नीलम) का बना हुआ दण्ड इस प्रकार शोभित , हो रहा ह मानों राहु के दाँतों के प्रहार से चन्द्रमा के शरीर पर पड़े हुये छेद के मार्ग से चन्द्रमा के नीले धब्बे का एक बारीक लम्बा टुकड़ा आ गिरा हो ॥२९॥ अधो दधानं नवनीलदण्डं छत्रं पुरः पश्य सितांशुगौरम् । उपेन्द्रपादोपरि वर्त्तमानं स्थिरं महावर्त्तमिव द्युनद्याः ॥३०॥ देखिये सामने (हीरोंकी) शुभ्र-किरणों से जगमगाता हुआ यह श्वेत छत्र, जिसके नी' नीलम का दण्ड सुशोभित है, ऐसा लग रहा है मानों भगवान् विष्णु के (नीले) पाँव पर स्थित गंगाजी के जल की स्थिर भँवर हो (गंगा जी विष्णु भगवान के पैर के अँगूठे से निकलीं हैं। विष्णु का रंग नीला है। गंगाजल का रंग श्वेत है।) ॥३०॥ तरङ्गिता मन्दतरैर्मरुद्भिर्निशाकरांशुप्रतिमाः पताकाः । अनेकधा भिन्नतयाऽतिसूक्ष्मा विभान्ति धारा इव नाकनद्याः ॥३१॥ मन्द मन्द पवन से हिलोरें लेती हुईं ये चन्द्रकिरणों के समान धवल पताकायें, आकाश-गंगा की कई मार्गों में बँट जाने के कारण अत्यन्त सूक्ष्म दिखाई देने वाली धाराओं के समान, सुशोभित हो रही हैं ॥३१॥ (३०) उपेन्द्रो विष्णुः ।

२६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अमूनि चालोकय पाण्डुरत्नैश्चत्वारि चामीकरतोरणानि । येषां बहिस्था हरितामधीशाः सेवां वहन्ति प्रतिहारहार्याम् ॥३२॥ श्वेत रत्नों से जड़े हुये सुवर्णनिर्मित इन चार बाहर के दरवाजों को देखिये जिनके बाहर खड़े हुये दिक्पाल द्वारपाल का कार्य कर रहे हैं ॥३२॥ विनिह्नुतं दीप्तिवितानकेन सितांशुरत्नस्य वितानजालम् । अन्तर्हितस्वर्गत रुपसूनमालोपगूढालिरुतैः प्रतीतम् ॥३३॥ उज्ज्वल श्वेत किरणों वाले रत्नों से निर्मित यह गोल छत्र (देवी के) तेजःपुञ्ज के घेरे से छिपा हुआ भी, अपने भीतर स्थित स्वर्ग के मन्दार पुष्पों की मालाओं के अन्दर छिपे हुये भ्रमरों की गूंज से प्रतीत हो रहा है ॥३३॥ अत्रागतानां सहसैव सिद्धिर्मा भैष्ट विघ्नादिति हस्तचिह्नम् । दिदेश देवी निजशासनं तु पञ्चाङ्गुलीकैतवतो गृहेषु ॥३४॥ मन्दिर की भित्ति पर देवी का हस्तचिह्न बना हुआ है। उसकी पाँचों खुली हुई अँगुलियों के बहाने मानों देवी यह निर्देश दे रही है—"यहाँ भक्तिपूर्वक आनेवालों को सहज ही में सिद्धि प्राप्त हो जाती है, उन्हें विघ्नों से कोई भय नहीं।" ॥३४॥ शुभ्रत्रिपुण्ड्रच्छलतो दधानास्त्रिस्रोतसं मूर्धनि साधकेन्द्राः । रुद्राक्षदामोज्वलनीलकण्ठाः सर्वज्ञतां साधु भजन्ति एते ॥३५॥ यहाँ उपासना करने वाले साधक-श्रेष्ठ धवल त्रिपुण्ड्र तिलक के बहाने मानों तीन स्रोत वाली गंगाजी को मस्तक पर धारण किये हुये हैं और नीली रुद्राक्ष-मालाओं को गले में पहन कर 'नीलकण्ठ' बने हुये हैं तथा उत्कृष्ट साधना द्वारा शिव-ज्ञान का साक्षात्कार करके वास्तव मे 'सर्वज्ञ' बन गये हैं अर्थात् ये श्रेष्ठ साधक शिव के समान केवल 'गंगाधर' और 'नीलकंठ' ही नहीं बने हुये हैं किन्तु 'सर्वज्ञ' बनकर वास्तव में शिव-स्वरूप हो गये हैं ॥३५॥ पद्मासनस्था अपि हंसलीनाः श्रुत्या निरुक्तं विधिमन्वयुर्ये । ध्यायन्ति धन्या नगराजकन्यापदाम्बुजं तेऽत्र समाधिभाजः ॥३६॥ पद्मासन लगाकर बैठे हुये भी हंस में स्थित (आत्मा में लीन), बिना कही बातों को भी सुनने वाले अर्थात् हृदय के भावों को भी जानने वाले और वेदों द्वारा प्रतिपादित विधियों का पालन करने वाले (अपने वाहन हंस पर पद्मासन लगाकर बैठे हुये वेदपाठी ब्रह्मा जी के समान सुशो- भित होने वाले) ये धन्य साधक-श्रेष्ठ समाधि लगाकर भगवती पार्वती के चरण-कमलों का ध्यान कर रहे हैं ॥३६॥ (३४) 'अत्र मन्दिरे आगतानां सहसैव सिद्धिर्भवति, यूयं विघ्नान्मा भैष्ट' इति हस्ताक्षरितं निजशासनं मन्दिरभित्तिषु पञ्चाङ्गुल्ल्यात्मकहस्तचिह्नव्याजेन देवी दत्तवती । (३६) हंसलीनाः हंसस्थाः हंसे आत्मनि लीनाश्च । श्रुत्या निरुक्तं श्रुतिप्रतिपादितम् । निरुक्तमनुक्तं श्रुत्या कर्णेनानुजग्मुरिति विरोधः, निरुक्तं प्रतिपादितमिति परिहारः । पद्मासनेन हंसासीनं विधिं विधातार- मनुचक्रुरित्यपि गम्यते ।

तृतीयः सर्गः २७ क्रोडीकृतायामपि नाम लक्ष्म्यां सत्वैकमूर्तिः पुरुषोत्तमोऽयम् । आस्ते जगतपालनयोग्यमत्र लोकोत्तरं पौरुषमीहमानः ॥३७॥ सत्व की (सत्व गुण की और पराक्रम की) साक्षात् मूर्ति, प्राणियों में श्रेष्ठ ये भगवान् विष्णु भी जिन्होंने समूची लक्ष्मी को अपनी गोद में बैठा रखा है, यहाँ जगत् के पालन करने की क्षमता प्रदान करने वाले अलौकिक पराक्रम को प्राप्त करने की इच्छा से भगवती की उपासना कर रहे हैं ॥३७॥ कस्तूरिकाकर्दमितप्रतीराः ससैकताश्चन्द्रपरागपूरैः । कालागुरुश्यामलितेः क्वचिच्च सशैवलाः केसरगुच्छपुञ्जैः ॥३८॥ विलेपनैर्ग्रन्थितगन्धसारद्रवप्रधानैर्घनगन्धसारैः । विनिर्मिताः पार्थिव पश्य कुल्याः कुलान्यलीनां भृशमन्धयन्तीः ॥३९॥ राजन् ! देखिये (देवी पर चढ़ाये गये) उत्कृष्ट सुगन्ध वाले चन्दन आदि के विलेपनों की ये छोटी-छोटी नदियाँ बह निकली हैं जिनके तटों पर कस्तूरी का कीचड़ है, कपूर की रेत है, काले अगुरु (धूप) से श्यामल केसर के गुच्छों के समूह काई या कुमुदिनी के समान लग रहे हैं, और जो अपनी तीव्र सुगन्ध से भ्रमरों के समूहों को अत्यन्त मदान्ध बना रही हैं ॥३८-३९॥ आवृत्य वक्त्रं वसनाञ्चलेन पुरो भ्रमद्भृङ्गभयेन भीरुः । निर्मातुकामा कमलस्य मालां गुणे निजं गुम्फति पाणिपद्मम् ॥४०॥ अपने ऊपर मँडराते हुये भौंरे के भय से (स्वभाव से ही) भीरु इस कामिनी ने अपने मुख को साड़ी के अञ्चल से ढक लिया है। यह कमलों की माला गूंथ रही है, किन्तु (मुँह ढका होने के कारण) कमल के बजाय अपने कर-कमल को ही सूत्र में पिरो रही है ॥४०॥ उच्चेतुकामागुरुसारधूमं गता गवाक्षावधि भृङ्गपङ्क्तिः । तस्मिन् गते सूक्ष्मतयाऽनुजालैर्नतानतेयं शनकैर्निवृत्ता ॥४१॥ (सुगन्ध से आकृष्ट होकर) अगुरु धूप के सुगन्धित धूम को पकड़ने के लिये भ्रमरों की ऊपर जाली के झरोखे तक गई। धुआँ तो झरोखे की सूक्ष्म जालियों में से बाहर निकल फिर भी भ्रमर-पंक्ति ऊपर नीचे कई बार मँडरा कर धीरे धीरे वहाँ से हटी ॥४१॥ अशेषतः सञ्चरितेऽपि धूमे न धूपपात्रं तरुणी जहाति । प्रतार्यमाणा श्वसितानुसारं भ्रमद्भिरभ्यर्थनया द्विरेफैः ॥४२॥ अपनी (सुगन्धित) साँसों पर मँडराने वाले भ्रमरों के अपने पास पास ही उड़ते रहने के कारण उनके द्वारा ठगी गई तरुणी ने धूप के पूरा जल जाने पर भी और धूम के चारों ओर फैल जाने पर भी, धूप के पात्र को हाथ से नहीं हटाया ॥४२॥ (३८) चन्द्रपरागः कर्पूररजः । (३९) गन्धसारश्चन्दनः । कुल्याः क्षुद्रनद्यः ।