भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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१५ इससे यह विदित होता है कि हमारे कवि गौडीय अर्थात् बंगाली थे, जितामित्र के पुत्र थे और अम्बष्ठ कुल में उत्पन्न हुये थे। वे राव सुर्जन के समकालीन और उनकी सभा के कवि थे और उन्होंने इस काव्य का निर्माण भगवान् विश्वनाथ की नगरी काशी में रह कर किया। महाकवि चन्द्रशेखर जन्मजात कवि थे। उनकी यह कृति उन्हें निःसन्देह अमर कर देगी। इस महाकाव्य में स्थान स्थान पर महाकवि कालिदास के प्रसाद और माधुर्य की, महाकवि श्रीहर्ष क पदलालित्य और कल्पना की एवं कहीं कहीं यमकादि अलंकार सन्निवेश में भारवि और माघ की छाप है। इस महाकाव्य के कई श्लोक संस्कृतवाङ्मय की अमूल्य निधि हैं। महाकवि कालिदास ने लिखा है— 'कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम् । नक्षत्रताराग्रहसङ्कुलाऽपि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः ॥' अर्थात्, 'भले ही अन्य हजारों राजा हों, किन्तु पृथ्वी इसी राजा के कारण 'राजन्वती' बनी; भले ही हजारों नक्षत्र और तारागण जगमगाते रहें,