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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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१४ है। उस समय हजारों राजपूतों ने वीरगति पाई थी और अनेक पतिप्राणा रानियों ने जौहर किया था। चित्तौड़ विजय से उत्साहित होकर १५६९ में अकबर ने फिर रणथंभौर पर आक्रमण किया। उस युद्ध में राव सुर्जन बड़ी वीरता से लड़े। आमेर के मानसिंह पहले ही अकबर से मिल चुके थे और चित्तौड़ भी अकबर के अधिकार में आ चुका था। महान् शक्तिशाली और राजनीतिज्ञ अकबर का सामना करना उस समय कठिन ही नहीं, असंभव सा था। राव सुर्जन की वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने मानसिंह को सन्धि के लिये राव सुर्जन के पास भेजा। उस समय वंश- भास्कर के अनुसार सात और टॉड के अनुसार दस शर्तें स्वीकार हुईं। इन शर्तों में कोई शत ऐसी नहीं थी जिसे स्वीकार करने में नीतिज्ञ अकबर को कुछ दुविधा होती। शर्तें इस प्रकार थीं—जैसे बूँदी राजधानी मानी जावे, जजिया न लगाया जावे, रानियां दिल्ली नहीं जावेंगी, बादशाह को लड़की नहीं दी जावेगी आदि। हमारे कवि ने इन शर्तों का कोई उल्लेख नहीं किया है। उन्होंने केवल इतना ही लिखा है कि रणथंभौर के बजाय नर्मदा, मथुरा और काशी का राज्य सुर्जन को दिया गया। इतिहास के विद्वान् इस बात को स्वीकार करते हैं कि अकबर ने राव सुर्जन को कुछ परगने बूँदी के आस पास के दिये और कुछ परगने बनारस के पास के दिये। राव सुर्जन अकबर के सामन्त बन गये और उन्हें बनारस और चुनार और आसपास के परगनों का हाकिम बनाया गया। राव सुर्जन ने गोंडवाना विजय में प्रमुख भाग लिया था। वार्धक्य में राव सुर्जन विरक्त होकर काशी में ही रहने लगे। काशी में इन्होंने अनेक सुन्दर महल और घाट बनवाये। उदार और दानवीर होने से इनका यश खूब फैला। राव सुर्जन ने काशी में ही देह- त्याग किया। काशी में बूँदी के राजमन्दिर में उनका स्मारक बना हुआ है। राव सुर्जन के पुत्र राव भोज ने अहमदनगर के घेरे में बड़ी वीरता दिखाई थी। अकबर ने प्रसन्न होकर उनके स्मारक के रूप में वहाँ भोजबुर्ज बनवाई। राव भोज के पुत्र राव रतन ने,जो बड़े वीर और न्याय- परायण थे, जहाँगीर से बड़ी बड़ी उपाधियाँ पाईं। हमारे कवि ने इस महाकाव्य के आदि और अन्त में कहा है कि यह महाकाव्य उन्होंने राव सुर्जन के आदेश और अनुरोध से लिखा—'आज्ञाबलात् तदपि शूरजनस्य राज्ञः' ( १, ७ ) और 'निर्वन्धान् नृपसुर्जनस्य नितरां' ( २०,६४ )। किन्तु काव्य समाप्त होने से पूर्व ही राव सुर्जन का देहान्त हो गया। अतः हमारे कवि ने अन्तिम सर्ग में राव भोज के राज्याभिषेक और पराक्रम का वर्णन किया है। राव रतन उस समय विद्यमान थे क्योंकि कवि ने काव्य समाप्त करते समय लिखा है कि 'महाप्रतापी, युद्धवीर, दानवीर, प्रजापालक, यशस्वी, विद्वानों का आदर करने वाले और सम्राट् अकबर द्वारा सम्मानित राव भोज अपने रत्न (राव रतन) आदि पुत्रों सहित, राज्यलक्ष्मी और कुल-कीर्ति को बढ़ाते हुये बूँदी में सुशासन कर रहे हैं।' अतः यह महाकाव्य सोलहवीं शताब्दी के चतुर्थ पाद में पूर्ण हुआ। महाकवि चन्द्रशेखर के विषय में हमारा ज्ञान उनके इस महाकाव्य के अन्तिम श्लोक पर ही निर्भर है। उन्होंने अपने विषय में यह लिखा है :— 'गौडीयः किल चन्द्रशेखरकविर्यः प्रेमपात्रं सता- मम्बष्ठान्वयमण्डनात् कृतधियो जातो जितामित्रतः। निर्बन्धान् नृपसुर्जनस्य नितरां धर्मैकतानात्मनो ग्रन्थोऽयं निरमायि तेन वसता विश्वेशितुः पत्तने॥'

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