सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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कवि के अनुसार गंगदेव माणिक्यराज की सातवीं पीढ़ी में हुये। इतिहास के विद्वान् इस बात को स्वीकार करते हैं कि पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज चन्दन के पुत्र और सिंहराज के पिता वाक्पति- राज के छोटे भाई लक्ष्मण ने सन् ९४३ के लगभग नाडोल में अलग राज्य स्थापित किया था और इसी वंश के माणिक्यराय ने बम्बावदा राजधानी बनाई। गंगदेव इन्हीं माणिक्यराय के वंशज थे। ये माणिक्यराय न तो गंगदेव के सातवें पूर्वज थे और न पृथ्वीराज के भाई ही। अतः हमारे कवि का पूर्वोक्त कथन इतिहास की दृष्टि से ठीक नहीं है। 'पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य' में पृथ्वीराज के छोटे भाई का नाम हरिराज बताया गया है, माणिक्यराज नहीं। कहा जा चुका है कि गंगदेव के पुत्र देवसिंह ने तेरहवीं शती में जेता मीणा को जीत कर बूँदी राजधानी बनाई। गंगदेव के बाद बम्बावदे का राज्य भी बूँदी में मिला लिया गया। देवसिंह ने अपने पुत्र समरसिंह का राज्याभिषेक करके सन्यास लिया। समरसिंह और उनके छोटे पुत्र जैतसिंह ने १२७४ में कोटचा भील को हरा कर कोटा जीता। हमारे कवि ने गंगदेव से वरसिंह तक तो राजाओं के नाम ठीक ठीक बताये हैं। राव सुर्जन के पिता का नाम अर्जुन बताया है जो भी ठीक है। किन्तु वरसिंह से अर्जुन के बीच की परम्परा ठीक नहीं है। हमारे कवि के अनुसार वरसिंह के पुत्र भारमल्ल हुये, भारमल्ल के नमंद और नमंद के अर्जुन। किन्तु इतिहास- कारों के अनुसार हमें भारमल्ल और नमंद के नाम नहीं मिलते और इनके बजाय वैरीसाल, भाँडा, नारायणदास, सूर्यमल्ल और सुलतानसिंह, ये नाम मिलते हैं। नारायणदास की उपेक्षा अत्यन्त आश्चर्यजनक है क्योंकि उनका नाम बूँदी के इतिहास में अमर है। नारायणदास ने अपने धर्मभ्रष्ट चाचाओं से बूँदी वापस ली और जब मालवा के सुलतान ने मेवाड़ पर आक्रम[ण] किया तब उन्होंने राणा साँगा को सुलतान के विरुद्ध सहायता दी। नारायणदास और रा[णा] साँगा में मित्रता थी और वे राणा साँगा के साथ बाबर के विरुद्ध भी लड़े थे। हमारे कवि भाँडा को भारमल्ल और नरबुध को नमंद कहा है। सुलतान सिंह निःसन्तान थे, अतः उनके बाद भाँडा (भारमल्ल) के दूसरे पुत्र नरबुध (नमंद) के बड़े लड़के अर्जुन गद्दी पर बैठे। नमंद राजा नहीं थे, राजा उनके बड़े भाई नारायणदास थे। हमारे कवि ने वैरी- साल, नारायणदास, सूर्यमल्ल और सुलतानसिंह के नाम छोड़ दिये हैं। हमारे कवि चन्द्रशेखर राव सुर्जन की पंडित-सभा के प्रसिद्ध कवि थे; अतः राव सुर्जन और उनके पुत्र राव भोज के समकालीन होने के कारण, उन्होंने जो वर्णन इन दोनों नरेशों का किया है वह ठीक ही होना चाहिये। इस वर्णन से उस समय की राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। राव सुर्जन का नाम बूँदी-कोटा के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। महाप्रतापी राव सुर्जन युद्धवीर, दानवीर और दयावीर नरेश थे। जिस प्रकार नारायणदास ने बूँदी वापस ली, उसी प्रकार राव सुर्जन ने केसर खाँ और डोकर खाँ नामक पठानों को पराजित करके कोटा पर फिर अधिकार किया। हाड़ा वंश का सबसे विस्तृत राज्य—रणथंभोर से कोटा तक और रामगढ़ से बूँदी तक—राव सुर्जन का ही था। १५६० में अकबर ने रणथंभौर को विजय करने के लिये सेना भेजी, किन्तु उस सेना को हार कर लौटना पड़ा। १५६८ में अकबर ने चित्तौड़ का प्रसिद्ध दुर्ग जीत लिया। उस युद्ध में फत्ता और जयमल की वीरता को आज भी चित्तौड़ दुर्ग की ईंट ईंट सूचित करती
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