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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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१२ गोरी को मार डाला, कल्पित मानते हैं। हमारे कवि ने, कुछ हेर फेर के साथ, इसी कथा का वर्णन किया है और चन्द का नाम भी लिया है। इससे केवल यही सिद्ध होता है कि 'रासो' के ये स्थल भी सोलहवीं शताब्दी में काफी प्रसिद्धि पा चुके थे। हम्मीरदेव का वर्णन हमारे कवि ने बड़ा सुन्दर किया है। उनके पिता का नाम जैत्रसिंह और पितामह का वाग्भट बतलाया है, जो ठीक है। अलाउद्दीन, जलालुद्दीन, उलूगखाँ, रणमल, मीर मोहम्मद शाह और मीर खेब्रू के जो वर्णन आये हैं वे भी ठीक हैं। पट्टन (पाटन), षट्पुर (खटकड़), पारियात्र (अरावली), चर्मण्वती (चम्बल) आदि के वर्णन और हम्मीर के तुला- दान और यज्ञ के वर्णन बड़े सुन्दर हैं। हम्मीरदेव ने सन् १२८३ में राज्यभार सँभाला। १२९१ में जलालुद्दीन खिलजी रेवाड़ी होता हुआ रणथंभौर के काफी पास चला आया था, किन्तु उस दुर्ग को अभेद्य समझ कर वापस लौट गया। १२९९ में अलाउद्दीन ने अपने भाई उलूग खाँ को रण- थंभौर पर आक्रमण करने के लिये भेजा। युद्ध में उलूग खाँ हार कर भाग गया। तब खुद अलाउद्दीन ने आकर रणथंभौर पर घेरा डाला। हम्मीरदेव ने मीर मुहम्मद शाह और उनके भाई मीर खेब्रू को, जो जालोर-विद्रोह के नेता थे और अलाउद्दीन के भय से भागकर आये थे, अपने यहाँ शरण दी और बड़े सम्मान से रखा। काफी समय तक घेरा डालने पर भी जब अला- उद्दीन को विजय की आशा नहीं दिखाई दी तब उसने हम्मीरदेव के पास सन्देश भेजा कि यदि मीर मुहम्मद शाह और मीर खेब्रू आदि विद्रोही लौटा दिये जावें तो घेरा उठा लिया जावेगा। किन्तु वीर हम्मीर ने शरणार्थियों के साथ विश्वासघात करने से साफ मना कर दिया। हम्मीर का मंत्री रणमल बहुत सी सेना के साथ, अपने स्वामी से विश्वासघात करके, अलाउद्दीन से जा मिला। इसके कारण दुर्ग में रसद की भयंकर कमी आ गई थी और वीर क्षत्रिय भूखों मरने लगे थे। जब कोई चारा न देखकर वीर हम्मीर की पतिप्राणा रानियों ने जौहर किया और हम्मीरदेव अपने साथियों के साथ दुर्ग से उतर कर युद्धक्षेत्र में कूद पड़े। वीर मुहम्मदशाह और खेब्रू बड़ी वीरता से हम्मीर के साथ लड़े। प्रणवीर हम्मीर शत्रु के शस्त्र से घायल होकर युद्धभूमि में काम आये और ता० ११ जुलाई सन् १३०१, मंगलवार को चौहान-सूर्य अस्त हो गया। 'हम्मीरमहाकाव्य' में लिखा है कि हम्मीर ने स्वयं अपना मस्तक काट लिया, किन्तु प्रस्तुत महाकाव्य में हम्मीर, शत्रु के भिन्दिपाल नामक शस्त्र से घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुये, जो अधिक उचित प्रतीत होता है। 'भिन्दिपाल' शब्द आजकल 'गुलेल' के अर्थ में प्रयुक्त होता है, किन्तु इसका प्रयोग 'नालिकास्त्र' (बन्दूक) के अर्थ में भी किया गया है और यहाँ यही उचित प्रतीत होता है। हमारे कवि ने लिखा है कि अलाउद्दीन ने 'आग्नेयास्त्र' (तोप) का प्रयोग रणथंभौर के घेरे के समय किया। इतिहास के विद्वान् प्रायः यह मानते हैं कि बारूद का प्रयोग भारत में सर्व- प्रथम बाबर ने १५२७ में किया। हमारे कवि अकबर के समकालीन थे, अतः इनके समय में तो तोपें थीं ही। अलाउद्दीन द्वारा तोपों और बन्दूकों का प्रयोग किया जाना हमारे कवि की कल्पना मात्र है अथवा इसमें कुछ तथ्य है, इसका निर्णय इतिहास के विद्वान् करें। हमारे कवि के अनुसार राव सुरर्जन की साक्षात् वंशपरम्परा हम्मीरदेव के सातवें पूर्वज प्रसिद्ध पृथ्वीराज चौहान के छोटे भाई माणिक्यराज से प्रारंभ होती है। इतिहास के विद्वानों के अनुसार गंगदेव के पुत्र देवसिंह ने तेरहवीं शती में जेता मीणा को जीत कर बूँदी राजधानी बनाई। हमारे