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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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११ भीमदेव, अनलदेव, बीसलदेव, पृथ्वीराज, हम्मीरदेव, राव सुर्जन और राव भोज—इन दस राजाओं का अधिक वर्णन किया गया है। वासुदेव, विश्वपति (वाक्पति?), हरिराज और भीमदेव के विषय में तो अधिक ज्ञान उपलब्ध नहीं है। इस काव्य में विश्वपति को साँभर (शाकंभरी) में शाकंभरी देवी के प्रसाद से लवणाकर बनाने का श्रेय दिया गया है, किन्तु 'पृथ्वी- राजविजय महाकाव्य' में इस कथा का सम्बन्ध, कुछ हेर फेर के साथ, वासुदेव से जोड़ा गया है। हमारे कवि ने भीमदेव से दिग्विजय यात्रा करवाई है, किन्तु इस वर्णन में 'रघुवंश' के 'रघुदिग्वि- जय' की छाप स्पष्ट है। अनलदेव (अरुणदेव या अर्णोराज या आना) द्वारा पुष्कर में पक्के घाट और मन्दिर बनवाने का वर्णन है। यह ऐतिहासिक सत्य प्रतीत होता है। बीसलदेव या विग्रहराज अत्यन्त प्रतापी और विद्याप्रेमी नरेश थे। इस काव्य में उन्हें "इन्द्र के समान तेजस्वी, तीनों शक्ति और छहों गुणों से सम्पन्न, जगद्विजयी, जितेन्द्रिय और परम शिवभक्त" बतलाया है और कहा है कि उन्होंने अवन्तिनगरी को जीत कर मालवों को करप्रद बना दिया था। कवि ने उनसे महाकालेश्वर की बड़ी सुन्दर स्तुति भी करवाई है। यह भी ऐतिहासिक सत्य प्रतीत होता है। बीसलदेव ने स्वयं 'हरकेलि' नाटक लिखा था और उनके राजकवि सोमदेव ने 'ललित विग्रहराज' नाटक लिखा। इन दोनों नाटकों को बीसलदेव ने श्वेत पत्थरों पर उत्कीर्ण करवा कर संस्कृत महाविद्यालय की दीवारों में लगवाया था जिसे मुहम्मद गोरी ने तुड़वा कर मसजिद बना दिया था और जो आजकल अजमेर में ढाई दिन के झोंपड़े के नाम से प्रसिद्ध है। बीसल- देव का एक लोहस्तम्भ दिल्ली में मिला है जिसमें एक श्लोक यह भी उत्कीर्ण है— "ब्रूते सम्प्रति चाहमानतिलकः शाकम्भरीभूपतिः श्रीमद्विग्रहराज एष विजयी सन्तानजानात्मजान्। अस्माभिः करदं व्यधायि हिमवद्विन्ध्यान्तरालं भुवः शेषस्वीकरणाय मास्तु भवतामुद्योगशून्यं मनः॥" अर्थात् "चौहान कुलभूषण शाकंभरीनरेश विजयी श्रीमान् विग्रहराज अपने पुत्र पौत्रों से यह निवेदन करते हैं कि—'हमने हिमालय और विन्ध्याचल के बीच के भूभाग को जीत कर करप्रद बना दिया है, और शेष भूभाग को विजय करने के लिये आप लोगों के मन में आलस और प्रमाद नहीं होना चाहिये।' पृथ्वीराज को सोमेश्वर और कर्पूरदेवी का पुत्र बतलाया है, जो ठीक है। किन्तु पृथ्वीराज का वर्णन चन्द बरदाई के 'रासो' के आधार पर किया गया है। यह सत्य है कि सोमेश्वर के पुत्र पृथ्वीराज चौहान महाप्रतापी राजा थे। उनका कन्नौज-नरेश जयचन्द्र से मनोमालिन्य भी था। संयुक्ता (जिसे इस काव्य में कान्तिमती कहा है) के अपहरण की कथा कहाँ तक सत्य है, इसका विवेचन इतिहास के विद्वान् करें। इस काव्य के अनुसार जयचन्द्र दिल्ली में पृथ्वीराज से परास्त होकर यमुना में डूब गये। यह बिलकुल गलत है। यह सत्य है कि पृथ्वीराज ने सन् ११९१ में शहाबुद्दीन गोरी को बुरी तरह हराया। किन्तु दो वर्ष बाद ही दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज, गोरी से पराजित हुये। या तो वे युद्ध में लड़ते हुये काम आये और या कुछ समय बाद मार डाले गये। इतिहास के विद्वान् चन्द बरदाई की इस कथा को कि मुहम्मद गोरी उन्हें कैद करके अपने देश ले गया और उनकी आँखें निकलवा लीं तथा चन्द की सहायता से उन्होंने शब्दवेधी बाण से