सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० की बेड़ियों में जकड़ रहा था, जब रस और भाव, शब्द और अर्थ के अलंकारों के आगे नतमस्तक हो रहे थे, जब ग्रन्थ-ग्रन्थिनिर्माण ही पाण्डित्य-प्रदर्शन समझा जाता था, जब कविता-कामिनी वाग्जाल के भयंकर पर्दे और समस्या-पूर्ति के संकुचित घर में, रस और भाव के स्वच्छ और उन्मुक्त वातावरण में साँस न ले सकने के कारण, क्षय-पीड़ित हो रही थी, उस समय महाकवि चन्द्रशेखर का महाकवि कालिदास से प्रेरणा लेना बड़ी भारी बात थी । और बड़े हर्ष का विषय है कि महा- कवि कालिदास के प्रसाद गुण और लालित्य का अनुकरण करने में हमारे कवि को उत्कृष्ट साफल्य मिला है । कल्पना-शक्ति और पदलालित्य में हमारे कवि ने महाकवि श्रीहर्ष का अनुकरण किया है और कहीं कहीं यमकादि अलंकारों के समावेश में भारवि और माघ का । हम कह चुके हैं कि इस महाकाव्य को ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं समझना चाहिये । हमारे कवि स्वयं यह नहीं चाहते क्योंकि उन्होंने, नवम सर्ग में, अपनी कल्पना की उड़ान से राजा अजयपाल को नागलोक में शेषनाग के पास तक भेज दिया है और एक नाग-कन्या से उनका विवाह भी करा दिया है। साहित्य का सौन्दर्य उसके चिरन्तन और शाश्वत सत्य में है । प्रकृति के विभिन्न रूपों का वर्णन—सूर्योदय, सूर्यास्त, रात्रि, चन्द्र, तारे, भूमि, जल, गगन, उपवन, कमल, कुमुद, पुष्प, हंस, सारस, वसन्त, ग्रीष्म, शरद्, शिशिर, हेमन्त, वर्षा आदि का वर्णन ; तथा मानसिक भावों और रसों का वर्णन—शृंगार, करुण, वीर आदि रसों का ; माधुर्य, ओज और प्रसाद रूपी गुणों का ; तथा अन्य चित्तवृत्तियों का वर्णन, किसी व्यक्ति विशेष से सम्बन्ध नहीं रखता । फिर भी यह कहना नितान्त अनुचित होगा कि प्रस्तुत महाकाव्य के वर्ण्य विषय काल्पनिक हैं । यद्यपि यह महाकाव्य इतिहास-ग्रन्थ नहीं है, तथापि इसकी पृष्ठभूमि ऐतिहासिक है । हो सकता है कि इस ग्रन्थ में दी गई राजवंशपरम्परा ठीक न हो, हो सकता है कि इस महा- काव्य में ऐतिहासिक भूलें हों, किन्तु जिन जिन मुख्य मुख्य राजाओं का इसमें विशद वर्णन किया गया है वे सब निःसन्देह ऐतिहासिक पुरुष हैं और उनके वर्णन की मुख्य मुख्य घटनाओं में भी अवश्य ऐतिहासिक सत्य का अंश है । इस महाकाव्य में 'चतुर्बाहुमान्' या 'चौहान' वंश में सबसे पहले प्रतापी राजा वासुदेव बताये गये हैं । जयानक ने भी अपने 'पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य' में (जो ऐतिहासिक दृष्टि से काफी विश्वस्त माना जाता है) वासुदेव को ही इस वंश का प्रथम प्रतापी राजा माना है । प्रस्तुत महा- काव्य में वासुदेव से लेकर राव भोज तक की लम्बी परम्परा का उल्लेख है जो मेरे विचार से, ऐतिहासिक दृष्टि से, बहुत विश्वसनीय नहीं है। फिर भी इस वंशपरम्परा में वासुदेव से लेकर पृथ्वीराज चौहान तक जितने नाम आये हैं उनमें से बहुत से नाम, हर्ष और बिजोलिया के शिला- लेखों से तथा अन्य ऐतिहासिक गवेषणाओं से, ऐतिहासिक सिद्ध हो चुके हैं । आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक के समय में शाकंभरी (सांभर) प्रदेश के, जिसमें लाखों गाँव थे और अहिच्छत्र (नागोर) और अजमेर तथा पुष्कर तीर्थ शामिल थे, कई प्रतापी चौहान राजा हुये हैं जिनमें सामन्तराज, चन्द्रराज, गुवक (गुर्वक या गोवाक), चन्दन, वाक्पति (विश्वपति), सिंहराज, अजयदेव (अजयपाल), अरुणदेव (अनलदेव, अरुणराज, अर्णोराज या आना), विग्रहराज (विशालदेव या बीसलदेव) और पृथ्वीराज अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । यद्यपि इस महाकाव्य में वासुदेव से लेकर राव भोज तक की लम्बी वंशपरम्परा दी गई है, तथापि अधिक वर्णन केवल महाँप्रतापी राजाओं का ही किया है । वासुदेव, विश्वपति, हरिराज,