सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ मासाद्य स चाहमानः । चक्रेऽर्कवद् भूभृत आशुपादाक्रान्तान् गुरून्प्ययमस्य वप्ता ।।' (१,१८) अर्थात् 'जिस प्रकार चाहमान का जनक सूर्य अपनी किरणों से बड़े बड़े पर्वतों को आक्रान्त कर देता है, उसी प्रकार ब्रह्माजी की कृपा से चाहमान ने साम्राज्य की स्थापना करके बड़े बड़े राजाओं को भी अपने पैरों से आक्रान्त कर दिया ।' इसी मत की पुष्टि हमारे कवि ने प्रस्तुत महाकाव्य में की है । उनके मतानुसार ब्रह्मा जी ने पुष्कर में यज्ञ किया और भावी विघ्न की आशंका के कारण उन्होंने सूर्य पर दृष्टि डाली ; उसी समय सूर्य बिम्ब से एक महान् तेजस्वी पुरुष वेग से नीचे उतरे जो लोक में चौहान नाम से प्रसिद्ध हुये— 'इत्थं वितन्वन् विधिवद् वितानमुत्प्रेक्ष्य विघ्नस्य पुरोऽवतारम् । विधिर्विधित्सुः प्रतिकारमस्य दिदेश दृष्टिं दिवसाधिनाथे ।। बिम्बादथाम्भोजवनस्य बन्धोः स्वधामसन्दोहनिगूढदेहः । अवातरद् वातरयेण कश्चित् पुमान् पुरस्तात् परमेष्ठिनोऽस्य ।। बाणासनं सज्यमंसि सशक्तिं महेषुधी मार्गणपूगपूर्णौ । बिभ्रच्चतुर्बाहुरवार्यवीर्यो वधं विधास्यन् मखबाधकानाम् ।। ध्रुवं चतुर्बाहुरिति प्रसिद्धः स चाहुवाणः किल लौकिकोत्या । वंशस्य कर्ता भवतां बभूव संरक्षितोऽधिक्षिति विश्वधात्रा ।।' (७, ५७-६०) वे तेजस्वी पुरुष धनुष, दो भारी तरकस और मंत्रशक्ति से युक्त तलवार लिये हुये थे। उनके चार भुजायें थीं। अतः 'चतुर्बाहुमान्' शब्द लोक में अपभ्रंश के कारण 'चाहुवाण' या चौहान बन गया। उपर्युक्त कारणों से यह मानना अधिक युक्तियुक्त है कि जो सूर्यवंश इक्ष्वाकु के कारण इक्ष्वाकुवंश और रघु के कारण रघुवंश कहलाया वही 'चतुर्बाहुमान्' के कारण चौहानवंश कह- लाया और उसी वंश की एक शाखा हरराज, हरिराज या हाडोराज के कारण हाडावंश के नाम से प्रसिद्ध हुई । इस प्रसिद्ध हाडावंश में सोलहवीं शती में महान् प्रतापी राव सुर्जन हुये । हाडों का सबसे विस्तृत राज्य उन्हीं के समय में रहा । राव सुर्जन रणथंभौर से कोटा तक और रामगढ़ से बूँदी तक निष्कंटक राज्य करते थे । युद्धवीर, दानवीर और दयावीर राव सुर्जन पर यह महाकाव्य लिखा गया है। सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना उचित है कि प्रस्तुत ग्रन्थ एक महाकाव्य.है, ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं। महाकवि चन्द्रशेखर ने इस ग्रन्थ को वीणापाणि देववाणी वाणी की आराधना के लिये तथा संस्कृत-साहित्य की श्रीवृद्धि के लिये लिखा है । इसका लक्ष्य न तो ऐतिहासिक वर्णन है और न मध्यकालीन राजाओं की प्रशस्ति ही । यह महाकाव्य संस्कृत-साहित्य के सूर्य वाग्देवता- वतार महाकवि कालिदास के रघुवंश को आदर्श बना कर लिखा गया है। महाकवि कालिदास की छाप हमारे कवि पर स्पष्ट है। इस महाकाव्य में, महाकवि कालिदास की कृतियों की तरह, भारतीय दर्शन और संस्कृति की धारा, गंगा-यमुना के संगम में सरस्वती के समान अथवा मणि- गणों में सूत्र के समान, अन्तर्निहित है। सोलहवीं-शती में जब संस्कृत-साहित्य प्रायः शब्दाडम्बर