सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ पाश्चात्य इतिहास-विद्वानों ने तथा डा० देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर आदि भारतीय इतिहास- विद्वानों ने तो यहाँ तक कह दिया है कि अग्निवंशी क्षत्रिय हूण गुर्जर आदि शुद्ध किये हुये विदेशी हैं क्योंकि यज्ञ के अग्निकुंड से असुरों का विध्वंस करने के लिये उत्पन्न होने की आलंकारिक कथा का केवल यही युक्तियुक्त अर्थ हो सकता है कि ब्राह्मणों ने, अपने युद्धों में लड़ने के लिये इन विदे- शियों को शुद्ध करके क्षत्रिय बना लिया और यज्ञाग्नि द्वारा शुद्ध होने के कारण इन्हें अग्निवंशी कहा जाने लगा। हूण-कुमारियों के विवाह उच्च क्षत्रियवंशों में हुये एवं कुछ हूण, जैसा राजा मिहिरकुल आदि, प्रसिद्ध शैव थे । किन्तु यह मत ठीक नहीं है क्योंकि इसके लिये कोई पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हूणों का शैव होना या हूण कुमारियों का कुलीन क्षत्रियों के साथ विवाह होना अग्निवंशियों को हूण सिद्ध नहीं कर सकता । और फिर जिन आलंकारिक कथाओं के आधार पर यह तथाकथित 'युक्तियुक्त' मत पुष्ट किया जा रहा है, स्वयं वे कथायें ही ऐतिहासिक सिद्ध नहीं हो सकी हैं। चन्द बरदाई के 'पृथ्वीराजरासो' के अधिकांश भाग को, ऐतिहासिक भूलों व आलंकारिक कथाओं के कारण, इतिहास के विद्वान् न तो पृथ्वीराज के समय का मानने को तैयार हैं और न ऐतिहासिक दृष्टि से प्रामाणिक ही। उपर्युक्त विषय में 'वंशभास्कर' में भी 'रासो' की ही छाया है, अतः इस विषय में उस ग्रन्थ की प्रामाणिकता भी सिद्ध नहीं हो पाती। 'रासो' और 'वंशभास्कर' से प्राचीन साहित्य में चौहानों को सूर्यवंशी क्षत्रिय माना गया है। इस बात का ज्ञान चन्द बरदाई और सूर्यमल्ल को भी था और इसीलिये इन दोनों को ही यह भी स्वीकार करना पड़ा है कि अग्निवंशी क्षत्रियों को सूर्यवंशी मानने में कोई विरोध नहीं क्योंकि अग्नि और सूर्य दोनों एक ही तेजस्तत्व के प्रतीक हैं। अन्य उपलब्ध साहित्य में चौहानों को सूर्यवंशी माना गया है और चौहान की उत्पत्ति-कथा भी दूसरे प्रकार से दी गई है। विग्रहराज (बीसलदेव) चतुर्थ के शिलालेख में, जो अजमेर के ढाई दिन के झोंपड़े के पास मिला है, उत्कीर्ण है कि—चाहमान या चौहान वीर सूर्यवंश में उत्पन्न हुआं। जिस सूर्यवंश में इक्ष्वाकु और राम हुये ।१ जयानक कवि (जो पृथ्वीराज के समसामयिक थे) के 'पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य' में लिखा है—'काकुत्स्थमिक्ष्वाकुरघू च यद् दधत् पुराऽभवत् त्रिप्रवरं रघोः कुलम्। कलावपि प्राप्य स चाहमानतां प्ररूढतुर्यप्रवरं बभूव तत् ॥' (२, ७१)। अर्थात् 'जिस रघुवंश ने काकुत्स्थ, इक्ष्वाकु और रघु—इन तीन महापुरुषों को त्रिप्रवर के समान धारण किया, वही रघुवंश, कलियुग में, चाहमान को पाकर प्रवरचतुष्टययुक्त हुआ।' इस ग्रन्थ के अनुसार ब्रह्माजी ने पुष्कर तीर्थ में म्लेच्छविनाश के लिये भगवान् विष्णु की स्तुति की। विष्णु भगवान् ने सूर्य पर दृष्टि डाली और तब सूर्यबिम्ब से एक महान् तेजस्वी पुरुष पृथ्वी पर अवतीर्ण हुये जिनकी प्रसिद्धि चाहमान नाम से हुई—'अथांशुभिः सूर्यमयस्य चक्षुषः स सूर्य- कान्तादिव सूर्यमण्डलात् । जवादारोहदखण्डचण्डिमा वसुन्धरासंमुखमर्चिषां चयः ॥' (२, १) नयचन्द्र सूरी ने भी अपने 'हम्मीर महाकाव्य' में चाहमान को सूर्यवंशी माना है और पुष्कर तीर्थ में ब्रह्माजी के कारण उनकी उत्पत्ति का वर्णन किया है—'ततश्चतुर्वक्त्रभवत्प्रसादात् साम्राज्य- १. गौ. ही. ओझा—राजपूताने का इतिहास, पहला खंड, पृ० ६४ 8