भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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५८ | सुर्जनचरितमहाकाव्यम्

सारमाकृष्य कैलासात् किंवा ब्रह्माण्डभाण्डतः । निर्मिता नु वृषाङ्केन निजावासाय या स्वयम् ॥६२॥ क्या इस अवन्ति नगरी को स्वयं भगवान् शिव ने अपने रहने के लिये कैलास या ब्रह्माण्ड के सार से निर्मित किया था ? ॥६२॥ शिप्रासरिति स स्नात्वा विप्राणां विहिताऽर्हणः । अथ प्रमथनाथस्य प्रासादं प्राविशद् वशी ॥६३॥ शिप्रा नदी में स्नान करके और ब्राह्मणों की पूजा करके जितेन्द्रिय नृपति बीसलदेव महाकाल के मन्दिर में गये ॥६३॥ अर्चयित्वाऽवनीपालः पुष्पधूपादिसाधनैः । प्रभुं प्रभूतया भक्त्या तुष्टावाऽष्टतनूभृतम् ॥६४॥ राजा ने पुष्प धूप आदि साधनों से भगवान् शिव की पूजा करके अष्टमूर्ति महेश्वर को अपनी प्रगाढ भक्ति से प्रसन्न किया ॥६४॥ जयकर्पूरगौराङ्ग गिरां साम्नामगोचर । गरीयःकरुणागार गौरीरूढार्धविग्रह ॥६५॥ हे कपूर के समान् शुभ्र शरीर वाले, सामवेद की ऋचाओं द्वारा भी अगोचर, महान् करुणा के आगार, अर्द्धनारीश्वर भगवान् शंकर ! आपकी जय हो ॥६५॥ बालचन्द्रलसद्भाल जय व्यालविभूषण । जय देव महाकाल जहि कालमहाभयम् ॥६६॥ हे बाल चन्द्र से शोभित मस्तक वाले, सर्प के आभूषण वाले, महाकाल ! आपकी जय हो । देव ! हमारे कालरूपी महाभय को नष्ट कीजिये ॥६६॥ कृपापालितदिक्पाल कपालप्रोल्लसत्कर । वेतालपूतनापाल कालकण्ठ नमोऽस्तु ते ॥६७॥ हे अपनी कृपा से दिक्पालों का पालन करने वाले, हाथ में कपाल धारण करने वाले, वेतालों की सेना का पालन करने वाले, नीलकण्ठ भगवन् ! आपको नमस्कार है ॥६७॥ त्रिलोकीशरण त्र्यक्ष त्र्यम्बक त्रिपुरापते । निस्त्रैगुण्य त्रयीसार तारयास्माद् भवार्णवात् ॥६८॥ हे तीनों लोकों के शरण, तीन अक्षमाला धारण करने वाले, त्रिनेत्र वाले, त्रिपुरा देवी के पति, निस्त्रैगुण्य, तीनों वेदों के सार ! इस भवसागर से हमें तार दीजिये ॥६८॥ स्मृतिमात्रेण जन्तूनां शमयन्तं तमः प्रभो । ये त्वां तमोमयं प्राहुस्त एव तमसा हताः ॥६९॥ प्रभो ! आप स्मरणमात्र से प्राणियों के तम को नष्ट कर देते हैं। जो आपको तमोमय कहते हैं वे ही तम रूपी अज्ञान से मारे गये हैं ॥६९॥