सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठः सर्गः ५९ ज्वलनं जलवेणिञ्च विधुं विषधरं तथा। अस्थिमालाञ्च बालाञ्च बिभर्षि सममीश्वर ॥७०॥ महेश्वर ! आप तृतीय नेत्र की अग्नि को और गंगा को, विषधर सर्प को और अमृतमय चन्द्रमा को, अस्थिमाला को और भगवती पार्वती को समान रूप से धारण करते हैं ॥७०॥ त्वमेव विश्वनिर्माणस्थितिसंहारहेतुकम् । वितनोषि त्रिधात्मानं त्रिलोचन गुणैस्त्रिभिः ॥७१॥ त्रिलोचन ! आप सत्वरजस्तमोरूप तीनों गुणों से, विश्व की उत्पत्ति-स्थिति-संहार के लिये स्वयं को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में अभिव्यक्त करते हैं ॥७१॥ अष्टमूर्तिं त्रिमूर्तिं वा त्वां वदन्तु पुराविदः । आनन्त्यात् तव मूर्तीनां वयमत्र निरुत्तराः ॥७२॥ विद्वान् लोग चाहे आपको अष्टमूर्ति कहें चाहे त्रिमूर्ति, वास्तव में आप अनन्तमूर्ति हैं अतः हम इस विषय में कुछ नहीं कह सकते ॥७२॥ कोटिशो रसनाः कस्य कस्यानान्ता सरस्वती । वक्तुं यः प्रतिजानीते महिमानं महेश ते ॥७३॥ किसके करोड़ों जीभें हैं ? किसकी वाणी अनन्त है ? महेश ! आपकी महिमा का वर्णन कौन कर सकता है ? ॥७३॥ अध्वराखिलसंभारसंभृतस्यापि धूर्जटे । पराचि त्वयि दक्षस्य दारुणाय तपःक्रियाः ॥७४॥ धूर्जटे ! प्रजापति दक्ष की, यज्ञ के समस्त साधनों से सम्पन्न होने पर भी, तप की क्रियायें, आपके विमुख होने के कारण, विनाश के लिये हुईं ॥७४॥ नाराधितौ पुराराते पुरा ते चरणावतः । जननैऽस्मिन्नहं षण्णां वैरिणां पतितो मुखे ॥७५॥ पुरारि.! मैंने पूर्वजन्म में आपके चरणों की आराधना नहीं की । इसीलिये इस जन्म में मैं कामक्रोधादिक छह शत्रुओं के मुख में पड़ रहा हूँ ॥७५॥ दुर्वासना पिशाचीयं मोहयित्वा मर्तिं मम । बलात् कवलयामास भवत्स्मृतिकथामपि ॥७६॥ यह दुर्वासना रूपी पिशाची, मेरी बुद्धि को मोह कर, आपकी स्मृतिकथा को भी बलपूर्वक खा गई (दुर्वासना में फँस कर मैं आपका स्मरण तक न कर सका) ॥७६॥ एतेनागामि जन्मापि तादृगेव निरूपयन् । किं वदाम्यपराद्धोऽहं त्वयि त्रिष्वपि जन्मसु ॥७७॥ अतः अगले जन्म में भी मेरा वही हाल होगा (क्योंकि इस जन्म में भी मैं आपकी आराधना नहीं कर रहा हूँ) । इस प्रकार तीनों जन्मों में मैं आपका अपराधी हूँ ॥७७॥