भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

६० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् निरुपाधिकृपापूरपरतन्त्रीकृतात्मनः । दीनोद्धरणमात्रं ते व्यसनं वृषभध्वज ॥७८॥ वृषभध्वज ! आप अपनी सहज और असीम करुणा के वश में हैं और दीनों का उद्धार करना ही आपका एक मात्र व्यसन है ॥७८॥ ममाप्यन्धधियश्छिन्धि बन्धमन्धकमर्दन । कृपायास्तव नायासलेशोऽप्यत्र भवेद् विभो ॥७९॥ अन्धक दैत्य के नाशक ! मैं अन्ध बुद्धि वाला हूँ । मेरा बन्धन भी काट दीजिये । प्रभो ! इसमें आपकी कृपा को जरा सा भी परिश्रम नहीं होगा ॥७९॥ इति स्तुतिभिरीशानं संभाव्य स भुवः प्रभुः ॥ प्रादक्षिण्यात् परिक्रम्य प्रणिपत्य विनिर्ययौ ॥८०॥ पृथ्वीपति बीसलदेव इस प्रकार की स्तुति से भगवान् महाकाल की पूजा कर तथा प्रदक्षिणा परिक्रमा कर और भगवान् को प्रणाम कर चले आये ॥८०॥ कृत्वा करप्रदांस्तत्र बलवानथ मालवान् । जितैरनुगतो भूपैः प्राविशत् पुरमात्मनः ॥८१॥ बलवान् राजा, मालवों को कर देने वाले बना कर और विजित राजाओं को अपने पीछे लेकर, अपनी राजधानी लौट आये ॥८१॥ तस्मात् पृथुगुणात् पुत्रो जातः पृथुसमप्रभः । पूरयन् यशसा पृथ्वीं पृथ्वीराज इति स्मृतः ॥८२॥ उन महान् गुणों वाले बीसलदेव के पृथु राजा के समान पराक्रमी एवं अपने यश से पृथ्वी को पूर देने वाले पृथ्वीराज नामक पुत्र हुये ॥८२॥ उत्पन्नस्तनुजस्तस्य प्रपन्नो दनुजद्विषम् । बिभ्राणो गुणबाहुल्यं बल्हणो वल्लभः सताम् ॥८३॥ उन पृथ्वीराज के भगवान् विष्णु के भक्त, अनेक गुणों को धारण करने वाले और सज्जनों के प्रिय बल्हण नामक पुत्र हुये ॥८३॥ लब्धलक्षा अपि स्वैरं नातृप्यन् पक्षसंश्रिताः । शतकोटितुलादानगृध्नवो यस्य मार्गणाः ॥८४॥ जिनके बाण (और याचक), पंख से युक्त होकर (सत्पक्षाश्रित होकर) और इच्छित लक्ष (लक्ष्य; लाख) को भी प्राप्त करके शतकोटि (वज्र; सौ करोड़) की तुलना की प्राप्ति (तुलाऽऽदान; तुलादान) के लोभ से तृप्त नहीं हुये ॥८४॥ (८४) लब्धलक्षाः प्राप्तशरव्याः प्राप्तलक्षद्रव्याश्च । शतकोटेर्वज्रस्य तुलायास्तुलनाया आदानस्य ग्रहणस्य गृध्नवो लोभिनः शतकोटीनां द्रव्याणां तुलादानस्य लोभिनश्च । पक्षयुक्ताः सत्पक्षे स्थिताश्च । मार्गणा बाणा याचकाश्च ।