भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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षष्ठः सर्गः ६१ निर्वाप्य प्रतिभटपार्थिवप्रतापं सिञ्चन्त्यः किसलयिनीं स्वकीर्तिवल्लीम् । सञ्चेरुः सुचरितशालिनोऽस्य विष्वग् विस्तीर्णा वितरणनीरनिर्झरिण्यः ॥८५॥ शत्रुराजाओं की प्रतापाग्नि को बुझा देने वालीं और अपने राजा की कोमल पत्तों वाली कीर्तिलता को सींचने वालीं चरित्रवान् राजा वल्हण की दानजल की विशाल नदियाँ चारों ओर बहने लगीं ॥८५॥ अथ गतवति नाकं वल्हणे बाहुलेय- प्रतिनिधिरधिरूढस्तत्पदं तस्य पुत्रः। अभवदनलदेवः शत्रुवंशाटवीना- मनल इव समिद्धः सोमवद् बान्धवानाम् ॥८६॥ राजा वल्हण के स्वर्गवासी होने पर, स्वामी कार्तिकेय के समान बलवान् उनके पुत्र अनलदेव राजसिंहासन पर बैठे, जो शत्रुओं के वंश रूपी बाँस के जंगलों के लिये प्रचण्ड अग्नि के समान भीषण और बन्धु-वर्ग के लिये चन्द्रमा के समान शीतल थे ॥८६॥ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये षष्ठः सर्गः ॥ (८६) बाहुलेयः कार्तिकेयः ।