सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें·सप्तमः सर्गः ६३ अन्तःसरागापि रुचामधीशनालम्ब्यमाना सहसा करेण । नितान्तमौग्ध्यान्मुखपद्ममुद्रामुपालि नालं नलिनी विमोक्तुम् ॥७॥ कमलिनी, अन्दर से लाल होने पर भी (हृदय से अनुरक्त होने पर भी), सूर्य की किरणों का (हाथ का) सहसा स्पर्श पाकर, अत्यन्त मुग्ध होने के कारण, अपने मुकुलित मुख-कमल को, भ्रमर के सामने (उपाऽलि; पर-पुरुष के सामने) विकसित नहीं कर सकी; जिस प्रकार कोई नवोढ़ा नायिका, हृदय से अनुरक्त होने पर भी, अपने स्वामी के हाथ का (अधीशेन) सहसा स्पर्श पाकर, अत्यन्त मुग्धा होने के कारण, सखियों के सामने (उपाऽऽलि) लज्जावश अपने मुख-कमल के घूंघट को नहीं हटाती ॥७॥ करेण रागाद् घनविप्रकीर्णं शनैः शनैरावरणं नियम्य । मुखं नलिन्या इव पद्मकोषं प्रकाशतां चण्डरुचिर्निनाय ॥८॥ बादलों के कारण छाये हुये अन्धकार को अपनी रक्त किरणों से धीरे धीरे हटाकर सूर्य ने कमलिनी के मुख-कमल को विकसित कर दिया, जिस प्रकार तीव्र अनुराग वाला (चण्डरुचिः) नायक लज्जावश गहरे खींचे गये घूंघट को अपने अनुरक्त हाथ से धीरे धीरे हटा कर घूंघट के अन्दर छिपे हुये नवोढा नायिका के मुख-कमल को प्रकाशित कर देता है ॥८॥ विदूरभिन्नाधरपत्रमीषद्विकासि किञ्जल्करदं दधाना । ससौरभोद्गारमुखारविन्दं विमुक्तनिद्रा नलिनी जजृम्भे ॥९॥ (सोई हुई) कमलिनी (सूर्य के कर-स्पर्श से) जाग कर अपने पत्र रूपी होठों को दूर फैला कर तथा अपने शुभ्र केसर रूपी दाँतों को कुछ कुछ प्रकट कर, अपने कमल रूपी मुख से सुगन्ध रूपी साँस निकालती हुई जम्हाई ले रही है ॥९॥ विजृम्भमाणोत्कलिका नलिन्द्यो दरन्नमत्कण्टकिकण्ठनालाः । विस्फारितैः पङ्कजकोषनेत्रैर्निभालयामासुरिवात्मबन्धुम् ॥१०॥ खुली हुई पंखुड़ियों वालीं (बढ़ी हुई उत्कण्ठा वालीं) और कुछ झुकते हुये रोयों से शोभित नालों वालीं (कुछ कुछ खड़े हुये रोंगटों से शोभित कण्ठों वालीं) कमलिनियाँ (नायिकाओं के समान) अपने पूर्ण खुले हुये कमल-नेत्र से सूर्य को (अपने प्रियतम को) देख रहीं हैं ॥१०॥ चिरप्रवासान्मिलितं मरालं पक्षानिलोद्धूततरङ्गलोला । प्रत्युज्जगामेव समालपन्ती सरोजिनी षट्पदहुङ्कृतेन ॥११॥ चिरप्रवास के बाद मिले हुये (वर्षा ऋतु भर बाहर रह कर अब शरद् में वापस आये हुये) हंस के स्वागत में कमलिनी मानों भ्रमरों की गूंज के बहाने स्वागत-वचन बोलती हुई और (हंस के) पंखों की वायु के कारण उठने वाली लहरों से हिलती हुई मानों उठ कर गई ॥११॥ (७) उपाऽलि, उपाऽऽलि च ।