सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकूजन् मुहुः शोणमुखः समन्ताद् व्यापारयन् पक्षमपेतधैर्यः । तारुण्यमत्तालिविलासलोलां सरोजिनीं हंसयुवा न सेहे ॥१२॥ लाल चोंच वाला (क्रोध से लाल मुँह वाला), बार बार कूजता हुआ (क्रोध में दुर्वचन बोलता हुआ), चारों ओर पंख फड़फड़ाता हुआ (चारों ओर हाथ हिलाता हुआ) और अधीर हुआ हंस-युवक, यौवनमद से उन्मत्त भ्रमर के साथ भोगविलास में चञ्चल सरोजिनी को सहन नहीं कर सका ॥१२॥ प्रसारयन् शीतकरः सुदूरात् करं परं खेदमिवाप्नुवानः । पतन् सरस्यां प्रतिमामिषेण कुमुद्वतीक्रोड़मुपाससाद ॥१३॥ (यह अस्त होने वाला) चन्द्रमा, अत्यन्त खिन्न हुआ, दूर से अपने कर (किरणों; हाथ) फैलाता हुआ, प्रतिबिम्ब के बहाने मानों सरोवर में गिर कर अपनी प्रेयसी कुमुदिनी की गोद में छिप रहा है ॥ १३॥ संयम्य नूनं जलदागमेन घनान्धकारं हरितो नि