भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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६ सप्तमः सर्गः ६५ स. हंसलक्ष्मम्बरसङ्गिगौरपयोधरामुत्पलचारुनेत्राम्। प्रसन्नशीतांशुमुखीं सुतारनक्षत्रमालाभरणोपकण्ठाम् ॥१९॥ विनिद्रबन्धूकदलाधरोष्ठीं शरच्छ्रियं चारुशरं दधानाम्। प्रकाशपङ्केरुहताम्रपाणौ पतिर्ग्रहाणां जगृहे करेण ॥२०॥ सूर्य ने, उड़ते हुये हंसों की शोभा से युक्त शुभ्र आकाश में स्थित श्वेत मेघों से शोभित, कमल रूपी सुन्दर नेत्रों वाली, प्रसन्न चन्द्रमा रूपी मुख वाली, सुन्दर तारे और नक्षत्र-माला रूपी आभूषणों से सुशोभित, विकसित बन्धूक पुष्प रूपी अधर वाली, सुन्दर शर नामक पुष्प को धारण करने वाली शरद् ऋतु के प्रफुल्लित रक्तकमल रूपी पाणि (हाथ) का अपने कर (किरण; हाथ) से ग्रहण किया मानों किसी ब्राह्मण ने, हंसों के चित्रों से शोभित साड़ी का स्पर्श करने वाले गोरे स्तनों वाली, कमल के समान सुन्दर नेत्र वाली, प्रसन्न और पूर्ण चन्द्रमा के समान मुख वाली, सुन्दर तार में पिरोये गये नक्षत्र-माला (मोहन-माला) नामक आभूषण से सुशोभित कण्ठ वाली, विकसित लाल बन्धूक पुष्प जैसे अधर वाली और एक हाथ में सुन्दर बाण धारण करने वाली क्षत्रिया के प्रफुल्लित रक्तकमल के समान सुन्दर हाथ को अपने हाथ में लेकर पाणिग्रहण किया हो। (विवाह में वधू के लिये हंसों के चित्रों से शोभित साड़ी पहनना मांगलिक समझा जाता है। कालिदास ने भी कुमारसंभव में लिखा है—‘वधूदुकूलं कलहंसलक्षणम्।' धर्मशास्त्र के अनुसार जब ब्राह्मण क्षत्रिया का पाणिग्रहण करता है तो क्षत्रिया के हाथ में बाण दिया जाता है—‘शरः क्षत्रियया ग्राह्यः प्रतोदो वैश्यकन्यया।' यहाँ ग्रहराज सूर्य को ब्राह्मण और शरद् को क्षत्रिया माना गया है) ॥१९-२०॥ पुष्पामवं पत्रपुटैः पिबन्त्यः प्रवृद्धनेत्राननकण्ठरागाः। विशृङ्खलं शृङ्खलिताध्वनीनं जगुः सुगीतं कलमस्य गोप्यः ॥२१॥ पत्तों के दोनों में फूलों का आसव पीने से बढ़ी हुई नेत्र, मुख और कण्ठ की लाली वाली, कलम नामक धान्य के खेतों की रखवाली करने वाली स्त्रियाँ मनमाने सुन्दर गीत गा रही थीं, जिनको सुनकर राहगीर भी हठात् कुछ देर रुक जाते थे ॥२१॥ शुष्यन्मुखः संमुखमापतन्तं विच्छेदखेदं गणयन्निवान्तः। आलम्बमानो नलिनीं नतेन मूर्ध्ना श्लथोऽभूत् कलमः क्रमेण ॥२२॥ सूखे मुंह वाला कलम का वृक्ष मानों शीघ्र सामने आने वाले विरह के दुःख का मन में विचार करता हुआ, अपने झुके हुये सिर को कमलिनी के ऊपर रख कर धीरे धीरे शिथिल हो गया ॥२२॥ (१९) हंसानां लक्ष्म्या शोभया युतं यदम्बरमाकाशं तत्संगिनो गौराः शुभ्राः पयोधरा मेघा यस्यास्ताम् । अन्यत्र हंसमिथुनस्य या लक्ष्मी शोभा तया चित्रितं यदम्बरं दुकूलं तत्संगिनी गौरी पयोधरौ स्तनौ यस्या- स्ताम् । तदुक्तं कालिदासेरपि—‘वधूदुकूलं कलहंसलक्षणम्' इति। वक्ष्यति चाग्रे ‘परिधाप्य धौतममलं दुकूलयोर्युगलं मरालमिथुनोपलक्षितम्' इति (१४, १४) । (२०) चारु शरं शरनामकं शरत्कालीनं सुन्दरं पुष्पम् । शरं बाणञ्च। यदा ब्राह्मणः क्षत्रियामुद्वहति तदा क्षत्रियवध्वा करे शरो गृह्यते । तदुक्तं धर्मशास्त्रे—‘शरः क्षत्रियया ग्राह्यः प्रतोदो वैश्यकन्यया ।' इति ।