भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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६६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् उपैतुकामा कलमान् विदूरान् मरालनिह्लादमथो निशम्य । शुकावलिः शङ्कितशालिगोपोमञ्जीरतारक्वणिता निवृत्ता ॥२३॥ दूर के कलमों के खेतों में जाने की इच्छा रखने वाली तोतों की पंक्ति ने, हंसों के स्वरों को सुन कर, उन्हें कलमों के खेतों की रखवाली करने वाली स्त्रियों के मंजीरों के उच्च स्वर समझ कर, वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया ॥२३॥ घनोदितानां तमसामपायात् सुनिर्मलं वीतजडानुषङ्गम् । ज्योतिःप्रसादाद् विलसत्प्रसादं बभौ नभः संयमिनामिवान्तः ॥२४॥ बादलों के कारण होने वाले घने अन्धकार के हट जाने से अत्यन्त निर्मल और कुहरे के संग से विमुक्त तथा प्रकाश के कारण प्रसन्न शरद् ऋतु का आकाश योगियों के, अज्ञानान्धकार और तमोगुण की निवृत्ति के कारण अत्यन्त निर्मल तथा जड़ पदार्थों की आसक्ति से रहित और आत्मा की ज्योति से प्रकाशित होने के कारण प्रसन्न, अन्तःकरण के समान सुशोभित हुआ ॥२४॥ नवप्रबुद्धाम्बुरुहप्रताना वितायमानारुणरम्यरोचिः । निरस्तनिःशेषघनान्धकारा शरत् प्रभातस्य बभार शोभाम् ॥२५॥ नये खिले हुये कमलों के वितान वाली, प्रवृद्ध अरुण और सुन्दर प्रकाश वाली और मेघों के कारण होने वाले अन्धकार से बिलकुल रहित शरद् ऋतु, प्रातःकाल की शोभा को धारण कर रही थी ॥२५॥ तुरङ्गचारोचितराजमार्गां व्यपेतजीमूतघनान्धकाराम् । शरच्छ्रियं सौम्यसरित्प्रवाहां समीक्ष्य वीतप्रतिपक्षशङ्कः ॥२६॥ पुरोधसा धौम्यसमौजसाऽथ धर्मवितारोऽधिपतिर्धरित्र्याः । प्रातिष्ठत प्रात्यहिकं समाप्य कृत्यं कृती कार्त्तिकमासि तीर्थम् ॥२७॥ सड़कें घोड़ों के चलने योग्य हो गई थीं। बादलों का घना अन्धकार मिट चुका था। नदियाँ धीरे धीरे बह रही थीं। ऐसी शरद् ऋतु की शोभा देखकर, शत्रुओं की आशंका से रहित, युधिष्ठिर के समान धर्मराज, कार्यकुशल राजा अनलदेव अपने धौम्य ऋषि (पांडवों के पुरोहित) के समान तेजस्वी पुरोहित के साथ, प्रातःकाल का (संध्यावन्दनादिक) कृत्य समाप्त करके, (शुभ मुहूर्त में) कार्तिक मास के तीर्थ पुष्कर को चले ॥२६-२७॥ स पुष्करं पुष्करपत्रनेत्रः स्वनेत्रयोराभरणीचकार । निर्वाणरत्नस्य खनिं जगत्याः श्रेयः समापन्नमिव द्रवत्वम् ॥२८॥ कमलपत्र के समान सुन्दर नेत्र वाले राजा ने पुष्कर तीर्थ को अपने नेत्रों का आभूषण बनाया (देखा)—उस पुष्कर को जो संसार में निर्वाण (मोक्ष) रूपी रत्न की खान है और जो मानों पिघला हुआ साक्षात् कल्याण है ॥२८॥ तपस्विना कुम्भसमुद्भवेन निपीतमालोक्य पतिं नदीनाम् । कल्पान्ततल्पं प्रथमेन पुंसा मन्ये परं तोयशयेन सृष्टम् ॥२९॥ क्षीर-सागर में सोने वाले विष्णु भगवान् ने, समुद्र को अगस्त्य मुनि द्वारा पिया हुआ जान कर, प्रलय काल में अपने सोने के लिये ही मानों इस पुष्कर को बनाया है ॥२९॥