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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

६६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् उपैतुकामा कलमान् विदूरान् मरालनिह्लादमथो निशम्य । शुकावलिः शङ्कितशालिगोपोमञ्जीरतारक्वणिता निवृत्ता ॥२३॥ दूर के कलमों के खेतों में जाने की इच्छा रखने वाली तोतों की पंक्ति ने, हंसों के स्वरों को सुन कर, उन्हें कलमों के खेतों की रखवाली करने वाली स्त्रियों के मंजीरों के उच्च स्वर समझ कर, वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया ॥२३॥ घनोदितानां तमसामपायात् सुनिर्मलं वीतजडानुषङ्गम् । ज्योतिःप्रसादाद् विलसत्प्रसादं बभौ नभः संयमिनामिवान्तः ॥२४॥ बादलों के कारण होने वाले घने अन्धकार के हट जाने से अत्यन्त निर्मल और कुहरे के संग से विमुक्त तथा प्रकाश के कारण प्रसन्न शरद् ऋतु का आकाश योगियों के, अज्ञानान्धकार और तमोगुण की निवृत्ति के कारण अत्यन्त निर्मल तथा जड़ पदार्थों की आसक्ति से रहित और आत्मा की ज्योति से प्रकाशित होने के कारण प्रसन्न, अन्तःकरण के समान सुशोभित हुआ ॥२४॥ नवप्रबुद्धाम्बुरुहप्रताना वितायमानारुणरम्यरोचिः । निरस्तनिःशेषघनान्धकारा शरत् प्रभातस्य बभार शोभाम् ॥२५॥ नये खिले हुये कमलों के वितान वाली, प्रवृद्ध अरुण और सुन्दर प्रकाश वाली और मेघों के कारण होने वाले अन्धकार से बिलकुल रहित शरद् ऋतु, प्रातःकाल की शोभा को धारण कर रही थी ॥२५॥ तुरङ्गचारोचितराजमार्गां व्यपेतजीमूतघनान्धकाराम् । शरच्छ्रियं सौम्यसरित्प्रवाहां समीक्ष्य वीतप्रतिपक्षशङ्कः ॥२६॥ पुरोधसा धौम्यसमौजसाऽथ धर्मवितारोऽधिपतिर्धरित्र्याः । प्रातिष्ठत प्रात्यहिकं समाप्य कृत्यं कृती कार्त्तिकमासि तीर्थम् ॥२७॥ सड़कें घोड़ों के चलने योग्य हो गई थीं। बादलों का घना अन्धकार मिट चुका था। नदियाँ धीरे धीरे बह रही थीं। ऐसी शरद् ऋतु की शोभा देखकर, शत्रुओं की आशंका से रहित, युधिष्ठिर के समान धर्मराज, कार्यकुशल राजा अनलदेव अपने धौम्य ऋषि (पांडवों के पुरोहित) के समान तेजस्वी पुरोहित के साथ, प्रातःकाल का (संध्यावन्दनादिक) कृत्य समाप्त करके, (शुभ मुहूर्त में) कार्तिक मास के तीर्थ पुष्कर को चले ॥२६-२७॥ स पुष्करं पुष्करपत्रनेत्रः स्वनेत्रयोराभरणीचकार । निर्वाणरत्नस्य खनिं जगत्याः श्रेयः समापन्नमिव द्रवत्वम् ॥२८॥ कमलपत्र के समान सुन्दर नेत्र वाले राजा ने पुष्कर तीर्थ को अपने नेत्रों का आभूषण बनाया (देखा)—उस पुष्कर को जो संसार में निर्वाण (मोक्ष) रूपी रत्न की खान है और जो मानों पिघला हुआ साक्षात् कल्याण है ॥२८॥ तपस्विना कुम्भसमुद्भवेन निपीतमालोक्य पतिं नदीनाम् । कल्पान्ततल्पं प्रथमेन पुंसा मन्ये परं तोयशयेन सृष्टम् ॥२९॥ क्षीर-सागर में सोने वाले विष्णु भगवान् ने, समुद्र को अगस्त्य मुनि द्वारा पिया हुआ जान कर, प्रलय काल में अपने सोने के लिये ही मानों इस पुष्कर को बनाया है ॥२९॥

सप्तमः सर्गः ६७ सप्तापि गाधान् सरितामधीशानल्पप्रमाणान् पुरतः परीक्ष्य । क्रोडाविमर्दक्षममादिमेन क्रोडेन किं निर्मितमष्टमं वा ॥३०॥ अथवा क्या वराहावतार ने, सातों समुद्रों को परिमित और अल्प देख कर, अपनी गोद (शरीर) की टक्कर को सहने में समर्थ यह आठवाँ समुद्र बनाया है ? ॥३०॥ तं तत्र विश्रान्तदृशं धरित्रीपुरन्दरं वीक्ष्य पुरः पुरोधाः । प्रस्ताववित् प्रस्तुतवस्तुतत्त्वविवेचनीं वाचमिमां बभाषे ॥३१॥ बुद्धिमान् पुरोहित ने पृथ्वी के इन्द्र अनलदेव को एकटक गड़ी हुई दृष्टि से पुष्कर को देखते हुये देख कर प्रस्तुत वस्तु (पुष्कर) का वर्णन करने वाली यह वाणी कही ॥३१॥ त्रिधा विभक्तात्मतनोरमुष्य धृतावतारस्य जगद्धिताय । नामापि कामं समुदीर्यमाणं नारायणस्येव पुनाति विश्वम् ॥३२॥ संसार के हित के लिये अवतार ग्रहण करने वाले और जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय के लिये स्वयं को ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूपी

६८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् दिवोवतीर्णैर्हरिचन्दनानां निर्माय पर्णैरिह पर्णशालाः। वल्कं वसानैरमरद्रुमाणां तपोऽत्र चीर्णञ्चिरमादितैयैः ॥३६॥ स्वर्ग से लाये गये हरिचन्दन वृक्षों के पत्तों से यहाँ पर्णशालायें बना कर कल्पवृक्षों के चीवर पहनने वाले देवताओं ने यहाँ बहुत समय तक तप किया था ॥३६॥ मन्दाकिनी यत्र ममौ विधातुः कमण्डलौ मण्डलितप्रवाहा। तं कोटिशः पूरयतोप्यमुष्य न पूर्णता स्तोकमपि व्यपैति ॥३७॥ गंगा जी अपने प्राकट्य से पहले अपने उद्गम स्थान ब्रह्मा जी के कमण्डलु में समा कर उसी में चक्कर काटा करती थीं। ब्रह्मा जी के उस कमण्डलु को, जिसमें सारी गंगा जी एक बार में ही पूरी समा रही थीं, करोड़ों बार भर देने पर भी इस पुष्कर के जल में ज़रा भी कमी नहीं आई। (पुष्कर में ब्रह्मा जी का मन्दिर है और यह ब्रह्मा जी का ही तीर्थ माना जाता है। संध्यादि नियमों के लिये ब्रह्माजी अपने कमण्डलु को पुष्कर के जल से ही भरते हैं) ॥३७॥ उद्गायतामत्र समं चतुर्णां शृण्वन् मुखेभ्यश्चतुरोऽपि वेदान्। चतुर्मुखीकण्ठनिनादशङ्की चमत्कृतिं याति जरन्मरालः ॥३८॥ एक साथ चार ब्राह्मणों के चार मुखों से चारों वेदों की ध्वनि सुन कर वृद्ध हंस उसे अपने चार मुख वाले स्वामी ब्रह्माजी द्वारा कृत वेदपाठ समझ कर चौंक पड़ता है ॥३८॥ अन्तेवसन्तः कलशिञ्जितानां वाणीपदाम्भोरुहनूपुराणाम्। हिन्दोलनाकौतुकमन्वभूवन् हंसा विधेरस्य ततैस्तरङ्गैः ॥३९॥ अपने सुन्दर स्वरों के उच्चारण में सरस्वती के चरणकमलों के नूपुरों की ध्वनि से शिक्षा लेने वाले ब्रह्मा जी के हंस इस पुष्कर की विस्तृत तरंगों में झूला झूलने का आनन्द ले रहे हैं ॥३९॥ तीर्थान्तराणामपि कोटयोऽस्य सेवाविधिज्ञाः सविधे सदैव। अध्यासते साधयितुं स्वशक्तिं पुंसामसाधारणशुद्धिदात्रीम् ॥४०॥ अन्य करोड़ों तीर्थ, पुष्कर की सेवा में दत्तचित्त होकर लोगों को असाधारण शुद्धि देने वाली अपनी शक्ति को सिद्ध करने के लिये यहाँ सदा बैठे रहते हैं ॥४०॥ एकैकमस्मात् कमलं विचिन्वन् नवं नवं प्रत्यहमासनाय। सरोजिनीखण्डमखण्डरूपमपालयत् कौतुकतो विरिञ्चिः ॥४१॥ अपने आसन के लिये पुष्कर में से प्रति दिन एक नया कमल तोड़ने वाले ब्रह्मा जी ने कौतुक- वश इसमें कभी समाप्त न होने वाला कमलों का समूह लगा रक्खा है ॥४१॥ अत्रावदातं शतपत्रजातं भृङ्गैः क्वचित् मेचकितञ्चकास्ति। सव्योम शङ्के शरदभ्रखण्डं सूर्याशुतापात् पतितं पयःसु ॥४२॥ यहाँ पुण्डरीकों (सफेद कमलों) का समूह, काले भ्रमरों से युक्त होने के कारण, ऐसा (३७) गंगा विधेः कमण्डलोः प्रादुरासीत् ।

सप्तमः सर्गः ६९ शोभित हो रहा है मानों शरद् ऋतु के सफ़ेद बादल का टुकड़ा अपने साथ थोड़े से काले आकाश के टुकड़े को लेता हुआ, सूर्य की किरणों की गर्मी से घबराकर पुष्कर के जल में शान्ति पाने के लिये आ गिरा हो ॥४२॥ नवेन्दुवक्त्राऽविरतं बिभर्ति विशालशोभां बिसकन्दलीयम् । मग्नस्य मध्येसलिलं सलीलं दंष्ट्रेव भूदारतनोर्मुरारेः ॥४३॥ जलमग्न नीलकमलों की सदा द्वितीया के अर्धचन्द्र के समान शुभ्र और अर्धवृत्ताकार (सफेद) मृणालकन्दली, लीलावश जल के भीतर निमग्न (नीले) भगवान् विष्णु के वराहावतार की (सफ़ेद) दाढ़ के समान, सुशोभित हो रही है ॥४३॥ गाहन्त एते गहनं न पाथः पाथोजिनीपल्लवभङ्गभीताः । दिग्दन्तिनो दूरत एव गण्डं गण्डूषितैरम्बुभिरार्द्रयन्ति ॥४४॥ (ब्रह्मा द्वारा लगाई हुईं) कमलिनी के पत्तों के टूट जाने के भय से ये दिशाओं के हाथी पुष्कर के गहरे पानी में न उतर कर दूर से ही सूँड़ों में जल ले लेकर अपने मस्तकों को गीला कर रहे हैं ॥४४॥ अन्तर्विशत्षट्पदराजिराजत्सिताम्बुजस्तोममिषेण मन्ये । शरीरवान् सत्वगुणोऽत्र मूर्तं तमः समस्तं कवलीकरोति ॥४५॥ अपने अन्दर स्थित काले भ्रमरों की पंक्ति से शोभित श्वेत कमल ऐसे प्रतीत होते हैं मानो शरीरंधारी सत्त्वगुण यहाँ मूर्तिमान् तमोगुण को निगल रहा हो ॥४५॥ अद्याप्यमुष्मिन्नरुणद्युतीनि सद्यः प्रबुद्धानि सरोरुहाणि । विरिञ्चिवक्त्रप्रतिबिम्बबुद्ध्या वृद्धा न हंसाः परिमर्द्दयन्ति ॥४६॥ आज भी यहाँ पुष्कर में लगे हुये अरुण शोभा वाले और ताज़ा खिले हुये रक्तकमलों को ब्रह्मा जी के मुख के समान समझ कर वृद्ध हंस नहीं रौंदते ॥४६॥ अपारयन् प्राणिवधं विधातुं व्यपेतपङ्केऽत्र बको वराकः । कारण्डवाऽऽस्वादितकोमलाग्रैः शैवालकैर्वर्तयते कथञ्चित् ॥४७॥ यहाँ पुष्कर में प्राणिहिंसा न कर सकने के कारण और कीचड़ का भी अभाव होने के कारण (कुछ न मिलने पर बगुला कीचड़ भी खा लेता है) बिचारा बगुला काई में उगने वाले छोटे छोटे पौधों से ही, जिनके कोमल ऊपरी भागों को भी कारण्डव पक्षी खा गये हैं, किसी प्रकार निर्वाह कर रहा है ॥४७॥ महान्तमप्याश्रितवान् नितान्तं नीचो न नीचां प्रकृतिं जहाति । स्वच्छन्दपद्मोऽपि सरोवरेऽस्मिन् यच्छैवलं शील्यते बकोटः ॥४८॥ (अथवा) महान् व्यक्ति का आश्रय लेने पर भी नीच कभी अपनी नीचता नहीं छोड़ता। इस पुष्कर में सुन्दर खिले हुये कमलों के होते हुये भी यह क्षुद्र बगुला काई के पौधों का ही आश्रय ले रहा है ॥४८॥

२. सर्ग ६-१०: राव सुर्जन हाड़ा पराक्रम, रणथम्भौर दुर्ग रक्षा एवं दिग्विजय

७० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अस्मिन् निशायामपि पुष्पितानां सरोरुहां रेणुभरैः पिशङ्गम् । स्वकान्तबुद्धया किल चक्रवाकी चक्राङ्गमाक्रन्दपरानुयाति ॥४९॥ यहाँ पुष्कर में रात में भी खिले हुये कमलों के पराग से ढके हुये और इसलिये पीले दिखाई देने वाले हंस के पीछे-पीछे चकवी (कमलों के खिलने से प्रभात का अनुमान लगा कर) उसे अपना पति समझ कर, कूजती हुई चल रही है ॥४९॥ स्वयं विधाता स विधिर्विधीनां सङ्कल्पमात्रोपचितैः पदार्थैः । त्रेतामिहाधाय जुहाव कुर्वन् त्रयीगिरो निस्त्रैगुणाः कृतार्थाः ॥५०॥ संकल्प-मात्र से समस्त पदार्थों को उपस्थित करके सम्पूर्ण विधियों को पूर्ण करने वाले, सब विधियों के स्वामी स्वयं ब्रह्मा जी ने यहाँ पुष्करतीर्थ में यज्ञ की तीनों अग्नियों को (गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिण) एकत्रित करके, वेद-मंत्रों को सचमुच निस्त्रैगुण्य सिद्ध करने के लिये निष्काम भाव से यज्ञ प्रारंभ किया (वेद प्रतिपादित यज्ञ कामनाओं के कारण किये जाते हैं जैसे- 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि, अतः वेद भी कामना पूर्ण करने के कारण त्रैगुण्यविषय हुये; किन्तु स्वयं ब्रह्मा जी को किसी कामना की आवश्यकता नहीं थी, अतः उन्होंने निष्काम भाव से यज्ञ करके मानों वेदों का निस्त्रैगुण्य होना सिद्ध किया) ॥५०॥ स्वयं स ईशः सकलस्य कर्ता समं समस्तैरपि देवतैस्तैः । मखैरखण्डैः कतमं नु देवं संप्रीणयामास न तं विदामः ॥५१॥ पूर्ण समर्थ और सम्पूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करने वाले स्वयं ब्रह्मा जी ने, सब देवताओं को साथ लेकर, किस देवता को प्रसन्न करने के लिये वह अखण्ड यज्ञ किया, इस बात को हम नहीं जानते ॥५१॥ हुताशने यद् विधिवद् वितीर्णं सुधाभुजां नाम सुधा तदेव । वषट्कृतं यद् विधिनात्मनैव तत्रापि कः कल्पयितुं क्षमेत ॥५२॥ यज्ञ की अग्नि में विधिपूर्वक जो कुछ हवन किया जाता है वह अमृत बन जाता है और देवता उसे ग्रहण करते हैं; किन्तु (समस्त देवताओं से सेवित) स्वयं ब्रह्मा जी ने उस यज्ञ में जो आहुति दी, वह आहुति क्या बनी और किसने उसे ग्रहण किया इसकी कल्पना कौन कर सकता है ? ॥५२॥ सत्यामपि प्रार्थितवस्तुसिद्धेः समग्रतायामिह सप्ततन्तौ । वनान्तराद् व्योमसदां समूहः समित्कुशादीन् स्वयमाजहार ॥५३॥ समस्त वाञ्छित वस्तुओं की सम्पूर्ण सिद्धि विद्यमान होने पर भी ब्रह्मा जी द्वारा कृत उस यज्ञ के लिये स्वयं देवता गण वन में से समिधा और कुश इत्यादि लाये ॥५२॥ (४९) चक्राङ्गं हंसम् । (५०) त्रेतामग्नित्रयीं गार्हपत्याहवनीयदक्षिणरूपाम्। वेदप्रतिपादितयज्ञादिकर्मणां. 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि वचनात् काम्यकर्मरूपत्वात् 'त्रैगुण्यविषया वेदाः' इत्युक्तं, किन्तु विधिः स्वयं निष्कामभावेन यज्ञं कृतवा- निति वेदगिरो निस्त्रैगुण्यमेव तेन सम्पादितम् । (५२) यज्ञाग्नौ यद् विधिवत् हुतं तदेव सुधा भवति देवाश्च तद् गृह्णन्ति । उक्तं च माघैरपि- 'अमृतं नाम यत् सन्तो मन्त्रजिह्वेषु जुह्वति' इति । किन्तु यत् स्वयं ब्रह्मणा हुतं तत् किमभवत् केन च तद् गृहीतमिति विज्ञातुं कः समर्थो भवेत् ?

सप्तमः सर्गः ७१ हविर्भुजस्तत्र पवित्रिताशे वितायमाने दिवि भव्यगन्धे । अमन्दमन्दारमरन्दधारासौरभ्यमभ्यस्तमपि प्रलीनम् ॥५४॥ उस यज्ञ की अग्नि की दिशाओं को पवित्र करने वाली अलौकिक सुगन्ध के आकाश में व्याप्त होने पर उसके आगे देवताओं द्वारा अभ्यस्त, कल्पवृक्षों के मकरन्द की तीव्र और दिव्य सगन्ध भी फीकी पड़ गई ॥५४॥ तस्मिन् मखे ब्रह्मविदामृषीणां यः सामघोषस्त्रिदिवं जगाम । तिरोदधे दैवतदुन्दुभीनामनातं तेन गभीरनादः ॥५५॥ उस यज्ञ में ब्रह्म को जानने वाले ऋषियों की स्वर्ग तक जाने वाली सामवेद की गंभीर ध्वनि के आगे देवताओं की दुन्दुभियों की ध्वनि छिप गई ॥५५॥ शुद्धिं वितन्वन् मलिनोऽपि सत्वं प्रकाशयन्नत्र तमोमयोऽपि । स्वयंभुवा संभृतसाधुहव्याद् धूमः कृशानोरुदभूदुदग्रः ॥५६॥ ब्रह्मा जी द्वारा हवन किये गये उत्तम हव्य से जो यज्ञाग्नि में तीव्र धुयाँ उठा वह मलिन (मटमैला ; अपवित्र) होने पर भी चारों ओर पवित्रता बरसा रहा था और तमोमय (काला ; तमोगुणी) होने पर भी सत्वगुण का प्रकाश कर रहा था ॥५६॥ इत्थं वितन्वन् विधिवद् वितानमुत्प्रेक्ष्य विघ्नस्य पुरोऽवतारम् । विधिर्विधित्सुः प्रतिकारमस्य दिदेश दृष्टिं दिवसाधिनाथे ॥५७॥ इस प्रकार विधिवत् यज्ञ करते समय ब्रह्मा जी ने, भावी विघ्न की संभावना देखकर, उस विघ्न का प्रतिकार करने की इच्छा से, सूर्य पर दृष्टि डाली ॥५७॥ बिम्बादथाम्भोजवनस्य बन्धोः स्वधामसन्दोहनिरूढदेहः । अवातरद् वातरयेण कश्चित् पुमान् पुरस्तात् परमेष्ठिनोऽस्य ॥५८॥ उसी समय सूर्य के बिम्ब से, अपने तेजःपुञ्ज से ढके हुये शरीर वाले एक पुरुष वायु के समान वेग से उतर कर ब्रह्मा जी के आगे आ खड़े हुये ॥५८॥ बाणासनं सज्यमसिं सशक्तिं महेषुधी मार्गणपूगपूर्णौ । बिभ्रच्चतुर्बाहुरवार्यवीर्यो वधं विधास्यन् मखबाधकानाम् ॥५९॥ वे तेजस्वी पुरुष मौर्वी सहित धनुष को, मंत्रशक्ति से युक्त तलवार को और बाणों के समूह से भरे हुये दो भारी तरकसों को लिये हुये थे । उनके चार भुजायें थीं । उनका बल अजेय था । वे यज्ञ में बाधा पहुँचाने वाले पापियों का वध करने वाले थे ॥५९॥ ध्रुवं चतुर्बाहुरिति प्रसिद्धः स चाहुवाणः किल लौकिकोक्त्या । वंशस्य कर्ता भवतां बभूव संरक्षितोऽधिक्षिति विश्वधात्रा ॥६०॥ वे तेजस्वी पुरुष निश्चय ही 'चतुर्बाहुमान्' इस नाम से प्रसिद्ध हुये । लोगों में यह 'चतुर्बाहु- मान्' नाम अपभ्रंश के कारण 'चाहुवाण' (चौहाण) बन गया । ब्रह्मा जी द्वारा इस पृथ्वी पर संरक्षित वे चतुर्बाहुमान् आपके वंश के कर्ता थे ॥६०॥

७२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् लोकालोकेनेव भूलोकमेतत् तीर्थश्रेष्ठं तीर्थबन्धैः समन्तात् । सम्भाव्यैतत् सम्भृतैः कीर्तिपूरैः पृथ्वीमेतां पूरय क्षोणिपाल ॥६१॥ राजन् ! (आपके वंश के कर्ता यहाँ पुष्कर में ही उत्पन्न हुये थे अतः यह पुष्कर तीर्थ आपके लिये अत्यन्त पवित्र है।) जिस प्रकार लोकालोक पर्वत से यह पृथ्वीलोक घिरा हुआ है, उसी प्रकार इस पुष्कर को जो तीर्थों में श्रेष्ठ है, आप चारों ओर दृढ़ घाटों से घेर कर अपनी विशाल-कीर्ति से इस पृथ्वी को भर दीजिये ॥६१॥ वर्षाण्येवं द्वादशास्मिन्नुषित्वा स्वेच्छाभोज्यैस्तर्पयन् भूमिदेवान् । लब्धासि त्वं ब्रह्मसायुज्यमग्रे यद् दुष्प्रापं यज्वभिर्भूरियज्ञैः ॥६२॥ बारह वर्ष यहाँ रह कर ब्राह्मणों को स्वेच्छा भोजन से तृप्त करके आप विपुल यज्ञ करने वाले याजकों द्वारा भी दुष्प्राप्य ब्रह्मसायुज्य मोक्ष को प्राप्त कीजिये । (मोक्ष चार प्रकार का माना गया है—सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य । इनमें सायुज्य सर्वश्रेष्ठ है) ॥६२॥ इति सुर्जनचरिते महाकाव्ये सप्तम सर्गः । (६१) लोकालोकः भूलोकपरिधिरूपो विशालः पर्वतविशेषः ।

१० अष्टमः सर्गः इति निशम्य गिरोऽथ पुरोधसः श्रितमनोरमपुष्कररोधसः । समनुमोदितवान् मुदितः प्रभुर्हितवचो हि सताममृतायते ॥ १ ॥ पुष्कर के मनोहर तट पर खड़े हुये पुरोहित के पूर्वोक्त वचन सुन कर राजा अनलदेव ने प्रसन्न होकर उनका अनुमोदन किया । हित के लिये कहे गये वचन सज्जनों को अमृत तुल्य लगते हैं ॥ १ ॥ अदिशदाशु च दाशरथिप्रभश्चतुरदासजनान् स जनाधिपः । सपदि पुष्करतीर्थपरिष्कृतौ व्रजत सम्प्रति सोद्यमतामिति ॥ २ ॥ भगवान् राम के समान तेजस्वी राजा ने अपने अनुचरों को शीघ्र पुष्कर में घाट बनाने के लिये आज्ञा दी ॥ २ ॥ उपलदारणदारुणवर्तनाः परशुपट्टिशटङ्कपरिच्छदाः । प्रचलिताश्चपलं चपलेरितैः कलकलैरथ जानपदा जनाः ॥ ३ ॥ इसके बाद मज़दूर लोग जो पत्थर फोड़ने के भीषण कार्य में कुशल थे, फरसे, फावड़े, टाँके आदि औज़ार लेकर वेग से, चापल्य से कलकल शब्द करते हुये, रवाना हुये ॥ ३ ॥ गुरुवरण्डकरज्जुभिरूर्जिता जितयमानुचरव्रजडम्बराः । मृगयुवन् मृगयूथमुपाद्रवन् द्रुतपदध्वनिनाऽध्वनि केचन ॥ ४ ॥ कुछ लोग बड़ी-बड़ी पट्टियाँ उठाने योग्य दृढ़ रस्सियाँ लेकर, यमराज के दूतों के समूह की तीव्र गति को जीतने वाले वेग से, जिस प्रकार शिकारी शिकार पर टूट पड़ता है उसी प्रकार, पग-ध्वनि से मार्ग गुंजाते हुये, टूट पड़े ॥ ४ ॥ अगणितोन्मदवारणयूथपाः प्रसभरुद्धबिलेशयकन्दराः । शिखरिणां शिखराणि समापतन् प्लवगतैरपरे प्लवगा इव ॥ ५ ॥ कुछ लोग मदमत्त हाथियों के झुण्ड की परवाह न करके, वेग से पर्वत की गुफाओं को रोक कर, बन्दरों की तरह कूदते फाँदते, पर्वतों के शिखरों पर चढ़ गये ॥ ५ ॥ उपरिगप्रतिबिम्बविभावनात् प्रतिमुहूर्तमुपस्थितसंभ्रमाः । अघटयन् घटकाः कटकान्तरे प्रणिहिताः स्फटिकोपलपट्टकान् ॥ ६ ॥ ऊपर दिखाई देने वाली अपनी परछाईं के कारण कुछ देर चकित हुये कुशल मज़दूरों ने संगमरमर की बड़ी-बड़ी पट्टियाँ पानी के किनारे पर खड़ी कर दीं ॥ ६ ॥ गिरिदरीशयिताः शरदम्बुदाः स्फटिकपट्टधिया घनपट्टिशैः । अभिहता जनताः समतापयन् सपदि सस्तनितैस्तडिदग्निभिः ॥ ७ ॥ पर्वत की गुफाओं में सोने वाले शरद् ऋतु के सफ़ेद बादलों को संगमरमर की पट्टियाँ समझ कर कुछ मज़दूरों ने बड़े-बड़े औजारों से उन्हें तोड़ दिया और शीघ्र ही उनमें से भयंकर गर्जना और बिजलियों की आग निकली जिससे बड़ी दूर तक लोग भयभीत हो गये ॥ ७ ॥

७४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् निहतमूर्ध्वमुपस्कृतमञ्जसाञ्जनशिलाफलकं तलशालिभिः । नवघनाभमुदीक्ष्य जनावृतं न विजहुर्विपिनं वनबर्हिणः ॥८॥ काले पत्थर की बड़ी पट्टियों को, जिनको मजदूरों ने बराबर करके ऊपर रक्खा था, नये काले बादल समझ कर बन के मोर, जन-समूह के होने पर भी, वन को छोड़ कर नहीं भागे ॥८॥ विकटटङ्कविदारणसंभवैररुणितं घनगैरिकरेणुभिः । क्षितिभृतः क्षतजद्रववद् बभौ बहलनिर्झरनीरमनारतम् ॥९॥ भीषण औजारों से पर्वत की चट्टानों को तोड़ देने के कारण उनमें से गहरे जल की धारा फूट पड़ी जो गेरु के कणों से मिल कर लाल हो गई और ऐसी लगी मानों चट्टानों के टूटने से पर्वत पर जो घाव पड़ गये थे उनसे निरन्तर रुधिर की धारा बह रही हो ॥९॥ परशुपातपरासुमहातरुप्रपतनोत्पतदायतनिःस्वनैः । क्षितिभृदार्तरवं व्यतनोदिव प्रतिरवैर्मुखरीकृतदिङ्मुखैः ॥१०॥ कुल्हाड़ों और फरसों की चोटों से बड़े-बड़े वृक्षों के गिरने के जो विकट शब्द हुये वे दिशाओं की प्रतिध्वनि के कारण प्रगुणित होकर ऐसे लगे मानों पर्वत, अपने ऊपर चोटें पड़ने से, कराह रहा हो ॥१०॥ उपलताडननिष्ठुरनिस्वनव्रणितकर्णयुगं गिरिगह्वरे । उपलताभवनं वनदेवतामिथुनमुज्झितधैर्यमवर्तत ॥११॥ पर्वत की गुफाओं में लता भवन के समीप स्थित वन देवताओं का मिथुन, चट्टानों को तोड़ने के भयंकर शब्दों के कारण मानों अपने कानों में प्रहार का अनुभव करता हुआ, अधीर हो उठा ॥११॥ विदलितद्रुममुद्धृतकण्टकं चिरनिराकृतवन्यमृगद्विजम् । विपणिनां विनिवेशमनोरमं गिरिवनं नगरं समजायत ॥१२॥ वृक्षों को तोड़ देने से, कांटों को उखाड़ फेंकने से, जंगली जानवरों की भगा देने से और व्यापारियों के सुन्दर मकान बन जाने से वह पर्वतप्रदेश सुन्दर नगर के समान बन गया ॥१२॥ अतिबलोद्धृतदीर्घशिलावटाः सपदि निर्मलनिर्झरपूरिताः । तनुभृतां महतामवगाहनक्षमत्तमाः सरितः शतशोऽभवन् ॥१३॥ अत्यन्त बलपूर्वक बड़ी-बड़ी चट्टानों के तोड़ देने से वहाँ गहरे गर्त बन गये जिनमें से निर्मल झरने बहने लगे और उन झरनों के आपस में मिल जाने से वहाँ बड़े-बड़े प्राणियों के स्नान करने योग्य सैकड़ों नदियाँ बन गईं ॥१३॥ अथ रथप्रतिमर्जववत्तया जितमनोभिरनोभिरनायतैः । .परिजनाः परितो गिरितस्ततो मणिशिलाशकलान् समुपाहरन् ॥१४॥ लोग, रथ के समान लगने वालीं, अपने वेग से मन की गति को भी जीतने वालीं, छोटी-छोटी गाड़ियों (बहेलियों) में पर्वत के चारों ओर से मणिशिलाओं के टुकड़े रख कर घर ले गये ॥१४॥

अष्टमः सर्गः ७५ शुभमुहूर्तमिवास्य महीपतेः समधिगम्यनियोगमयोपमम् । स्थपतयः खलु पुष्कररोधसः सुनिपुणाः परिकर्म विनिर्ममुः ॥१५॥ राजा के शुभ मुहूर्त के समान सुन्दर आदेश को पाकर कुशल कारीगरों ने पुष्कर के तट पर लोहे के समान दृढ़ घाट बना दिये ॥१५॥ कनकपुष्पमिव क्रमशोभितामुपरि बिभ्रदथाधिकविस्तृतिम् । व्यरचि कारुगणेन सुमेरुवत् समवतारचयो मणिभिः शुभैः ॥१६॥ कारीगरों ने सोने के फूल के समान सुन्दर, नीचे से ऊपर जाने पर क्रमशः चौड़ी होने वाली, सुन्दर मणियों से जड़ी हुईं, घाटों पर सीढ़ियां भी बनाईं ॥१६॥ तदुपरि प्रथितोज्वलतेजसा प्रतिदिशं पृथिवीपतिना ततः । मणिहिरण्मयहर्म्यनिवेशनं दिविषदामुपदीकृतमायतम् ॥१७॥ सीढ़ियों के ऊपर प्रत्येक दिशा में, तेजस्वी और विख्यात राजा ने देवताओं के योग्य, सोने और मणियों से जड़े हुये विशाल महल बनवाये ॥१७॥ प्रथममेव बभूव निवासभूः सुमनसां किल पुष्करतीर्थभूः । अनलदेवनिवेदितमन्दिरैरजनि सा सुतराममरावती ॥१८॥ पुष्कर तीर्थ की भूमि पहले से ही देवताओं के रहने योग्य थी और राजा अनलदेव के बनवाये हुये घाटों, महलों और मन्दिरों के कारण तो वह इन्द्रपुरी ही बन गई ॥१८॥ कलियुगेऽत्र निगूहितमूर्तयोऽप्यतिमनोरमधामजिघृक्षवः । उपहितायतनप्रतिमामिषाद् ववृतिरे प्रकटास्त्रिदिवौकसः ॥१९॥ कलियुग में स्वर्ग के देवता पृथ्वी पर अपना स्वरूप प्रकट नहीं करते, फिर भी अत्यन्त मनो- हर स्थान में रहने की इच्छा करते ही हैं। अतः पुष्कर के मन्दिरों में बड़ी-बड़ी प्रतिमाओं के बहाने वे प्रकट हुये ॥१९॥ अवततार हरिर्दशधा क्रमात् समयदेशविशेषवशात् पुरा । युगपदेव तदेकनिकेतने दशभिराविर्बभूत् तनुभिर्विभुः ॥२०॥ पहले भगवान् समय और देश विशेष का ध्यान करके क्रमशः दश अवतारों के रूप में प्रकट हुए थे, किन्तु वे पुष्कर के एक ही मन्दिर में एक साथ दसों अवतारों के रूप में प्रकट हुये ॥२०॥ स्फटिकदेवकुले क्वचन स्थितं जलदखण्डमखण्डरुचिं दधौ । हिममयावरणोज्झितमण्डले हिमकरे हरिणस्य यथा वपुः ॥२१॥ संगमरमर के मन्दिर में एक मेघ का टुकड़ा अखण्ड शोभा धारण करता हुआ ऐसा लग रहा था मानों कुहरे के आवरण से मुक्त चन्द्रबिम्ब में हरिण का शरीर हो ॥२१॥ दिविषदायतनान्यभितस्तदा तरुणचारुतरारुणपल्लवैः । व्यरचयत् फलपुष्पपुरस्कृतान्युपवनानि घनान्यवनीपतिः ॥२२॥ राजा ने देव-मन्दिरों के चारों ओर नवीन और अत्यन्त सुन्दर लाल पत्तों वाले एवं पुष्पों और फलों से लदे हुये घने उपवन लगवाये ॥२२॥

७६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् न च नवस्तबके सुरभूरुहां रतिपते र्न तथा च शरासने । अतितरां रतिमानशिरे यथा तदधिगत्य वनं मधुपाङ्गनाः ॥२३॥ भ्रमरियों ने जैसी रति उन उपवनों में दिखाई वैसी न तो कल्पवृक्षों के नये पुष्पों के गुच्छों में दिखाई और न कामदेव के पुष्प धनुष में ॥२३॥ सपदि तत्र वनेऽवनिमण्डने फलमनेकविधं यदजायत । तदुपयुज्य तपस्विगणः स्फुटं निजतपःफलितं सममन्यत ॥२४॥ पृथ्वी के भूषण उस उपवन में जो नाना प्रकार के फल उत्पन्न हुये उनको खाकर तपस्वी पूरुषों ने अपना तप सफल समझा ॥२४॥ अथ विधाय विधेयमखण्डयन् गुरुगिरां गरिमाणमकैतवम् । नरपतिः प्रयतश्चिरमुत्सुकप्रियपुरन्ध्रिपुरं धृतिमान् ययौ ॥२५॥ सावधान और धीर राजा अनलदेव ने अपने पुरोहित गुरु के वचनों के गौरव की रक्षा करते हुये निष्कपट रीति से उनकी आज्ञानुसार कार्य सम्पूर्ण किया और फिर चिरकाल से अपने प्रिय की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने वाली स्त्रियों से शोभित अपनी राजधानी गये ॥२५॥ अजनि तस्य सुतः सुकृतालयः क्षितितले जगदेव इति श्रुतः ! विपुलसत्वगुणो जगतोऽप्यलं वितरणाय वनीयकवत्सलः ॥२६॥ उन अनलदेव के पुण्यात्मा, विपुल सत्वगुण से युक्त, महान् बलशाली, सम्पूर्ण जगत् को दान देन में समर्थ, याचकों के प्रिय, जगदेव नाम से विख्यात पुत्र उत्पन्न हुये ॥२६॥ उपचितो जगति प्रथितैर्गुणैर्गुणिसमाजसमादरमण्डितः । प्रतिहतप्रतिपक्षगणोन्नतिर्वसुमतीमशिषद् वशिनां पतिः ॥२७॥ संसार में प्रसिद्ध गुणों से युक्त, गुणी पुरुषों के समुदाय का समुचित आदर करने वाले और शत्रु-समुदाय की उन्नति को रोकने वाले तथा वशी पुरुषों में अग्रगण्य जगदेव ने पृथ्वी पर शासन किया ॥२७॥ विशदकीर्तिमतीव विशालयन् बिसलतामिव तामरसाकरः । स किल बीसलदेवमजीजनद् वसुसमानगुणं वसुधाधिपः ॥२८॥ जैसे सूर्य कमलों की मृणाल-लता को विकसित बनाते हैं वैसे ही अपनी शुभ्र-कीर्ति को अत्यन्त विकसित बनाने वाले उन राजा जगदेव ने देवता के समान गुणवान् (अथवा अग्नि के समान प्रतापी) बीसलदेव को जन्म दिया ॥२८॥ सुचरितैः सततं जनरञ्जनव्यसनिनः खलु बीसलदेवतः । अजयपाल इति प्रथितः सुतो रिपुसमाजजयी समजायत ॥२९॥ अपने सुन्दर चरितों से सदा प्रजा को आनन्दित करने में संलग्न बीसलदेव के शत्रुसमाज को जीतन वाले अजयपाल नाम से विख्यात पुत्र उत्पन्न हुये ॥२९॥

अष्टमः सर्गः ७७ अपि नरेन्द्रपरम्परागतं पदमवाप्य नवाधिपतिर्भुवः । स्वमहसा सहसा बहुसम्पदा बहलयन्नन्यदिवाकरोत् ॥३०॥ पृथ्वी का नया अधिकार पाने वाले अजयपाल ने राजपरंपरा से प्राप्त पद को अपने तेज से और सर्वतोमुखी सम्पत्ति से बढ़ा कर और ही बना दिया ॥३०॥ यदलभन्त पुरा पृथिवीभुजो विजयमानचमूचरसङ्गरैः । स्वनगरे निवसन् नयकोविदः स तदवाप यशः प्रहसन्मुखः ॥३१॥ पहले राजाओं ने जो यश अपने विजयशील सैनिकों द्वारा युद्धों से प्राप्त किया था उस यश को नीतिकुशल और हँसमुख राजा अजयपाल ने राजधानी में रह कर ही प्राप्त कर लिया ॥३१॥ तरुणयन् मिथुनेषु परस्परप्रणयबन्धमपाकृतकैटवम् । सुरभयन्नथ मन्दसमीरणं सुरभिराविर्बभूवदभितो वनम् ॥३२॥ स्त्री-पुरुषों के परस्पर निष्कपट प्रेम-बन्धन को दृढ़ बनाने वाला और मन्द पवन को सुगन्धित [L13

७८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सहजमेव समेत्य मधुश्रिया विकलयेत् पथिकान् बकुलद्रुमः । किमुत मेदुरितो मदिरेक्षणावदनवासितसीधुसुधारसैः ॥३७॥ वसन्त की लक्ष्मी को प्राप्त कर बकुल वृक्ष सहज ही पथिकों को व्याकुल कर देता है; फिर मादक नयनों वाली कामिनियों के मुख से उगली हुई मदिरा के अमृत-रस को पीकर विकसित होने पर तो कहना ही क्या ! (कवि समय के अनुसार बकुलवृक्ष स्त्रियों के मुख से कुल्ले की हुई मदिरा को पीकर अत्यन्त विकसित होता है) ॥३७॥ अदशदाम्रलतांनवपल्लवं सुललितस्वरहेतुकूहूमुखः । अभवदाशु वियोगमृगीदृशां हृदयमर्मणि दारुणवेदना ॥३८॥ अत्यन्त ललित-स्वर में कूकने वाली कोयल ने आम्रलता के नये पल्लव पर चोंच मारी, किन्तु इससे शीघ्र ही वियोगिनी स्त्रियों के हृदयमर्मों पर भीषण आघात हुआ ॥३८॥ स्मृतिभुवः श्वसितैरिव शीतलैैरपि नितान्तमरुन्तुदकर्मभिः । अजनि चेतसि मन्दसमीरर्णैश्चरममन्दरुजाध्वगयोषिताम् ॥३९॥ कामदेव की साँसों के समान शीतल, किन्तु फिर भी मर्मस्पर्शी पीड़ा देने वाले, मन्द पवन से प्रोषितपतिका स्त्रियों के मन में तीव्र वेदना हुई ॥३९॥ अधिवनान्तमशोकमहीरुहः स्फुटमशोभत कोमलपल्लवः । निहितदोहदमन्दुमुखीपदं किमु सभाजयितुं प्रसृतः करः ॥४०॥ उपवन में अशोक वृक्ष की कोमल शाखा ऐसी शोभित हुई मानों (अशोक को) पुष्पित करने वाले, चन्द्रमुखी कामिनी के पैर को पूजने के लिए बढ़ाया हुआ अशोक का हाथ हो । (कवि- समय के अनुसार अशोक वृक्ष स्त्रियों के पादाघात से पुष्पित होता है ) ॥४०॥ ज्वलयताथ पलाशमयेन्धनैर्मनसिजज्वलनं मधुयज्वना । विरहिणामभिचारमखे द्विजः प्रथम ऋत्विगकारि वनप्रियः ॥४१॥ वसन्त रूपी यजमान ने विरही पुरुषों को मारने के निमित्त कराये गये यज्ञ में पलाश-रूपी ईंधन (समिधा) से कामदेव रूपी अग्नि को प्रज्वलित करके वन में रहने वाले द्विज (पक्षी अर्थात् कोयल; ब्राह्मण) को प्रथम ऋत्विक् (यज्ञ करने वाला प्रमुख ब्राह्मण) बनाया ॥४१॥ दिनकृतोज्झितदक्षिणवर्त्मना प्रथयतातिकठोरकरव्रजम् । अहरहः परितापमुपेयिवान् नृपतिनेव कुनीतिमता जनः ॥४२॥ दक्षिणायन से उत्तरायण होने वाले और किरण-समूह को अत्यन्त उग्र करने वाले सूर्य के कारण जनता को दिन-दिन अधिक गर्मी प्राप्त होती गई; जिस प्रकार दक्षिण (उचित और न्याय- शील) मार्ग छोड़ देने वाले अन्यायी और अत्यन्त कठोर कर लगाने वाले निर्दय, कुनीति वाले राजा के कारण जनता का सन्ताप दिन-दिन बढ़ता जाता है ॥४२॥ (४१) मधुयज्वना वसन्तरूपयजमानेन। वनप्रियो द्विजः कोकिलः। प्रथम ऋत्विक् प्रधानयाज्ञिकः।

अष्टमः सर्गः ७९ परिमलैः परितैः पवनेरितैर्विविधपुष्पसमृद्धिसमुद्भवैः । तत इतो ह्रियमाणमनाः क्वचित् स्थितिमधान् न मधुव्रतसन्ततिः ॥४३॥ नाना प्रकार के पुष्पों के मकरन्द से उत्पन्न होनेवाली और वायु द्वारा चारों ओर फैलाई गई सुगन्ध के कारण इधर-उधर खींचे गये चित्त वाली भ्रमरों की पंक्ति कहीं स्थिर होकर नहीं बैठ सकी ॥४३॥ कुसुमपल्लवदुर्ललिता लताः परभृताऽऽविरुतानि वनानिलाः । परममीभिरकारि वशे जगद् विभुतयैव यशोऽलभत स्मरः ॥४४॥ पुष्पों और पल्लवों के दुलार से लाड़ली लतायें, कोयलों की कूकें, उपवंन के पवन—इन सबने जगत् को वश में कर लिया, किन्तु प्रभु होने के कारण यश मिला कामदेव को ॥४४॥ विधिवशः प्रसवोऽस्तु यथा तथा कुरबकान् न परो रसिकस्तरुः । सकृदुपात्तवधूपरिरम्भजाः शिथिलिता यदमुष्य न कण्टकाः ॥४५॥ फूलना-फलना तो विधाता के हाथ है इसलिये भले ही कुरवक वृक्ष के काँटे उत्पन्न होते हैं, [

८० सुर्र्जनचरितमहाकाव्यम् धृतनिजासनसक्तगुणं वधुकुलमदीव्यत दोलनविभ्रमैः । प्रियगुणग्रथितान् पथिकप्रिया मुहुरसूनधिकण्ठमदोलयन् ।।५०।। लकड़ी की पट्टी को झूले के गुणों (रस्सियों) पर रख कर ललनायें झूला झूलने की क्रीड़ा कर रही थीं, किन्तु विरहिणी स्त्रियाँ अपने प्रियतमों के गुणों में अपने प्राणों को गूँथ कर उन प्राणों को बार-बार अपने कंठों में झुला रहीं थीं ।।५०।। हतहिमावरणः परिशीलयन् कमलिनीं मिलितां बहुकालतः । स्फुटमतृप्तमना दिननायकः शिथिलरथ्यरयः शनकैरगात् ।।५१।। (अपनी प्रिया कमलिनी के शत्रु) कुहरे और पाले के पर्दे को नष्ट करके, बहुत समय बाद मिली हुई प्रिया कमलिनी से प्रेमालाप करने वाले सूर्य भगवान्, अतृप्त मन से, अपने रथ के घोड़ों का वेग कम करके, बड़ी कठिनता से धीरे-धीरे गए। (वसन्त में दिन काफ़ी बड़े हो जाते हैं) ।।५१।। नियतमम्बुजिनोमवलोकयन्नजनि मन्दरुचिः शिशिरे रविः । इतरथा कथमेतदुदीक्षणात् प्रकृतिमाप पुनर्भंगवान् निजाम् ।।५२।। शिशिर-ऋतु में निश्चय ही अपनी प्रेयसी कमलिनी को न देखने के कारण सूर्य की प्रभा फीकी (मन्दरुचि) पड़ गई थी, अन्यथा अब वसन्त में कमलिनी को देखकर सूर्य भगवान् फिर स्वभाव से चण्डरुचि (उग्र तेज वाले; सूर्य का नाम) कैसे बन गये ? ।।५२।। दिनमुखोपचितं हरितां मुखान् मलिनिमानमुदस्य मरीचिमान् । कलहखेदितवल्लभचेतसामधिमुखं निदधे हरिणीदृशाम् ।।५३।। प्रातःकाल में दिशाओं के मुखों पर लगी हुई (अन्धकार की) कालिमा को हटा कर सूर्य न उस प्रणय-कलह से रात भर प्रियतमों के मन को दुःख देनेवाली कलहान्तरिता नायिकाओं के मुखों पर पोत दिया। (अपने हठ से वसन्त की रात प्रणय-कलह के कारण बेकार खो देने से प्रातः काल कलहान्तरिताओं के मुख शोक से मलिन हो गये) ।।५३।। सुवदनारदनच्छदकोमला नवविमुक्तपुटा मृदुपल्लवाः । असितदृक्श्वसितप्रतिरूपका मलयशैलसखा वनवायवः ।।५४।। नववधूनिभृतालपितोपमाः परभृतापरिषत्कलनिस्वनाः । पृथगपि प्रभवेयुरयोगिनां विशसने किमुताधिकसंहताः ।।५५।। सुन्दर मुख वाली रमणियों के अधर के समान कोमल नये खिले हुए ये मृदु पल्लव, काली आँखों वाली सुन्दरियों की साँस के समान सुगन्धित मलयगिरि के मित्र ये उपवन के वायु, नवोढा नायिकाओं के एकान्त में बोले गये वचनों के समान मधुर ये कोयलों की सुन्दर कूकें—इनमें से प्रत्येक अलग-अलग भी, विरही जनों को सन्ताप देने में पूर्ण समर्थ है, फिर सबके इकट्ठे मिल जाने पर तो कहना ही क्या ! ।।५४–५५।। विततबहुविधप्रसूनमालां भृततिलकां किल काञ्चनाढ्यभूषाम् । नरपतिरथ निर्ययौ तदानीं दयिततमामिव वोक्षितुं वनालीम् ।।५६।। तब विविध पुष्पों की विस्तृत मालायें धारण करने वाली, तिलक (सौभाग्य चिह्न; एक वृक्ष) से युक्त, सुवर्ण की समृद्धि से भूषित, प्रियतमा के समान लगने वाली, उपवन-वाटिका को देखने के लिये राजा अजयपाल चले ।।५६।। इति सुर्जनचरितमहाकाव्येऽष्टमः सर्गः । (५०) अदीव्यत इत्यत्र दिविरन्तर्भावितण्यर्थः कर्मणि लङ् क्रीडां कारितमित्यर्थः ।

११ नवमः सर्गः अवनीरमणो मनोरमाभिः कियतीभिः कुतुकेन कामिनीभिः । कुसुमाकरकौशलं दिदृक्षुर्निजमाराममथोज्वलं जगाम ॥ १ ॥ राजा अजयपाल कुछ सुन्दर कामिनियों के साथ कौतुकवश वसन्त की शोभा देखने के लिये अपने सुन्दर उपवन में गये ॥ १ ॥ जितपल्लवविभ्रमाः कराग्रैर्विहसन्त्यो नखरोचिषा प्रसूनम् । मुखरैः कलनूपुरैरलीनां दुरहङ्कारमनारतं हरन्त्यः ॥ २ ॥ भणितैरनृतीकृतामृतौघैः कलकण्ठीविरुतानि कुण्ठयन्त्यः । शिथिलां सुरभिश्रियं वितेनुः प्रविशन्त्यः पृषतीदृशो वनान्तम् ॥ ३ ॥ अपने कोमल हाथों से पल्लवों की शोभा हरने वाली, नखों की कान्ति से पुष्पों को मात करने वाली, नूपुरों की मनोहर ध्वनि से भ्रमरों के दुर्मद को सदैव हरने वाली, अमृत के प्रवाह को तुच्छ करने वाले मधुर वचनों से कोयलों की कूक को कुण्ठित करने वाली मृगनयनी कामिनियों ने उपवन में प्रवेश करके वसन्त की शोभा को अपनी शोभा के आगे फीका बना दिया ॥ २-३ ॥ करमर्पयितुं कृतानुबन्धां नवसूनस्तबकेषु वामनेत्राम् । प्रतिषेद्धुमसूयया किमुच्चैः कृतनादं मधुपालिरुच्चचाल ॥ ४ ॥ नये पुष्पों के गुच्छों में (तोड़ने के लिये) हाथ डालने के यत्न में बद्धपरिकर मृगनयनी को ईर्ष्या के कारण मानों मना करती हुई भ्रमरों की पंक्ति उच्च-स्वर से हुंकारती हुई उड़ गई ॥ ४ ॥ अविषह्यमनङ्गकिङ्करीभिः सहकाराङ्कुरभङ्गमङ्गनाभिः । अवलोक्य विदूरमुत्पतन्ती विकला किं पिककामिनी चुकूज ॥ ५ ॥ कामदेव के आधीन स्त्रियाँ आम की नई कोंपल का (कामदेव का धनुष होने के कारण) तोड़ना नहीं सह सकतीं। मानों इसीलिये यह देख कर कोयल दूर उड़ गई और व्याकुल होकर कूकने लगी ॥ ५ ॥ घनकुञ्जतिरोहितं धुवत्यास्तरुमुच्चैः कुसुमाशया युवत्याः । कलकङ्कणझङ्कृतं निशम्य क्षणसंभावितवैशसा सपत्नी ॥ ६ ॥ स्फुरिताधरपल्लवा सकम्पा पवमानोल्लसितेन कापि वल्ली । अरुणं मुखमातपेन भूयोऽप्यरुणिम्नैव तिरोहितं वहन्ती ॥ ७ ॥ द्रुतमुच्चलितुं कृतप्रयत्ना विनिरुद्धा घनवीरुधां वितानैः । सहसावचितैः सह प्रसूनै र्न दुकूलं गलितं विदाञ्चकार ॥ ८ ॥ घने कुंज में छिपे हुये किसी वृक्ष को, फूलों की आशा से, जोर से हिलाती हुई युवती के कंकणों (६) वैशसं ईर्ष्याजन्यक्रोधः ।

८२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् की सुन्दर झनकार सुन कर समीपस्थ लता को, युवती को सपत्नी समझकर, तुरन्त ईर्ष्या हो गई और वह अपने पल्लव-रूपी अधर को फड़काती हुई, वायु से हिलने के कारण मानों क्रोध से काँपती हुई, धूप से लाल मुख को क्रोध की लाली से छिपाती हुई, वेग से चलने के लिये तैयार हुई, किन्तु अन्य घनी लताओं के विस्तार से रोक ली गई; ईर्ष्या से वह इतनी आकुल हो गई थी कि उसे हिलने के कारण सहसा नीचे गिरे हुए अपने फूलों-रूपी वस्त्र तक का ध्यान नहीं रहा ॥ ६-८ ॥ जननावधि सेवितां नितान्तं बत सत्स्वामिवधूमिवान्तराद्राम् । स्वपदव्यसनेऽपि षट्पदाली सुमनःसन्ततिमन्वियाय दूरम् ॥ ९ ॥ विद्वान् पिता की पुत्री, जन्म से ही अच्छी तरह सेवित, दयार्द्रहृदया और सुशीला स्वामिनी के समान जन्म से ही भलीभाँति सेवित, मकरन्द से आर्द्र, और शुभ्र होने के कारण सुन्दर, पुष्पों की पंक्ति के पीछे, अपने स्थान से हटाकर दूर ले जाये जाने पर भी, भ्रमरों

नवमः सर्गः ८३ निपुणं निजदेवमर्चयेति प्रथिताकूतमुदाहृताऽथ सख्या। कुटिलीकृतपाटलान्तनेत्रा वदनेऽस्याः क्षिपति स्म तानि तूर्णम् ॥१५॥ सामने लगे हुए फूलों में से झट पाँच छःफूल तोड़कर मुग्धा वधू ने, प्रियतम के पास होने के कारण, उन्हें हथेली में छिपा लिया। किन्तु किसी सखी ने उसे देख लिया और व्यंग्यपूर्वक कहा— 'इन फूलों से अपने देवता की अच्छी तरह पूजा करो।' इस पर मुग्धा वधू ने, अपनी तिरछी और लाल आँखों से उसकी ओर देखकर, शीघ्र उन फूलों को सखी के मुख पर ही फेंक दिया ॥१४-१५॥ नवखण्डितपल्लवावलीनां क्षरितक्षीरकषायितः क्रमेण। श्रमशीकरजालकेऽबलानां क्षणमस्पन्द इवास गन्धवाहः ॥१६॥ नये कोमल पत्तों के समूहों को तोड़ने के कारण उनमें से निकले हुए रस से सुगन्धित पवन, क्रमशः ललनाओं के श्रमजन्य पसीने की बूंदों के जाल पर, क्षण भर गतिशून्य सा होकर, रुका रहा ॥१६॥ समुदान्समुदायमङ्गनानां श्रमखेदादलसालसञ्चलन्तम्। न विवेद विदूरतां भजन्तं वनलक्ष्मीविनिभालनान् नरेन्द्रः ॥१७॥ उपवन की शोभा देखने में संलग्न होने के कारण, राजा को, परिश्रम के खेद से धीरे धीरे चलने वाले और बहुत दूर तक चले जाने वाले स्त्रियों के समूह का ध्यान नहीं रहा ॥१७॥ अवगाह्य च काननं महीयः सुमुहूर्तादथ देवतासहायः। अवलोकयति स्म लोकपालप्रतिमल्लः कमलाकरं प्रफुल्लम् ॥१८॥ ईन्द्रादि दिक्पालों के समान प्रतापी राजा अजयपाल ने अकेले ही उस बड़े उद्यान के भीतर जाकर सुमुहूर्त में एक कमलों से खिले हुए सरोवर को देखा ॥१८॥ तटसीमनि तस्य वेदिकायां स्फुटकङ्केल्लिनिकुञ्जरञ्जितायाम्। अमृत्ताञ्जनतामयं निनाय स्वदृशोः कामपि भामिनीमपूर्वाम् ॥१९॥ राजा ने उस सरोवर के किनारे पर, खिले हुए अशोक के कुंज से शोभित एक छोटे से चबूतरे पर स्थित, नेत्रों को अमृत के अञ्जन के समान आनन्द देने वाली एक अलौकिक सुन्दरी को देखा ॥१९॥ चिकुरार्पितदिव्यदामगन्धादुपरिष्टात् परितो विवर्तमानैः। शिखिपत्रकृतातपत्रकान्ति कलयद्भिर्भ्रमरैर्निषेव्यमाणाम् ॥२०॥ पतनोत्पतनाकुलद्विरेफं मुहुरुन्मुद्रणमुद्रणाभियोगात्। स्फुरदङ्गुलिमुह्यमानपत्रं कलमयन्तीं कमलं करस्थनालम् ॥२१॥ मदनज्वरमुल्वणानुबन्धं मदनेऽपि प्रसभं निवेशयन्तीम्। नवविभ्रमसंभृतैरपाङ्गै रतिवल्लीदल ताण्डवप्रसङ्गैः ॥२२॥ वह सुन्दरी अपने बालों में लगाई गई अलौकिक पुष्पमाला की सुगन्ध के कारण चारों ओर (१९) कंकेल्लिरशोकः। (२०) शिखिनो मयूरस्य पत्रेण पिच्छेन कृतमातपत्रं येन सः श्रीकृष्णः तस्य कान्तिं शोभां श्यामतामित्यर्थः।

८४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ऊपर मँडराने वाले तथा मयूरपिच्छ रूपी छत्र धारण करनेवाले भगवान् कृष्ण की कान्ति को चुराने- वाले (अर्थात् श्रीकृष्ण के समान श्याम) भ्रमरों द्वारा सेवित थी। वह एक हाथ में कमल की नाल पकड़े हुए थी और दूसरे हाथ से, लीला के कारण, कमल को कभी खोलती और कभी बन्द करती थी जिस कारण कमल पर मँडरानेवाले भ्रमर बार बार गिरने से और उड़ने से आकुल हो- रहे थे और उज्ज्वल उँगलियों द्वारा पखुड़ियों के मर्दन से कमल म्लान हो रहा था। लता के वायु- कम्पित पल्लवों के नाच के समान चञ्चल तथा नवीन हाव भाव से शोभित कटाक्षों द्वारा वह सुन्दरी स्वयं कामदेव को भी काम-ज्वर के उत्कट आवेग का बलपूर्वक शिकार बना रही थी ॥२०-२२॥ वशिनां प्रथमोऽपि पार्थिवेन्द्रः स तदालोकसमानकालमेव। युगपद् विशिखैः प्रसूनकेतोरभवन् मर्मणि पञ्चभि विभिन्नः ॥२३॥ राजा अजयपाल, वशी पुरुषों में अग्रगण्य होने पर भी, उस दिव्य सुन्दरी को देखते ही काम- देव के पाँचों बाणों से एक साथ घायल हो गये ॥२३॥ विनियम्य च मानसं प्रयत्नात् क्षणमक्षोणमतिः पतिः पृथिव्याः। इदमन्तरचिन्तयत् तदानीं बहुभिर्व्याकुलितेन्द्रियो वितर्कैः ॥२४॥ बुद्धिमान् राजा ने बड़े प्रयत्न से अपने चित्त को वश में करके, अनेक तर्क-वितर्कों से व्याकुल मन में इस प्रकार विचार किया ॥२४॥ किमियं वनदेवतैव तावन् मधुलक्ष्मीः किमु लक्षणीयमूर्तिः। वरुणालयसोदरादमुष्माद् वरुणश्रीः सरसः किमुन्ममज्ज ॥२५॥ क्या यह सुन्दरी कोई वनदेवता है? या यह सुन्दर वसन्तलक्ष्मी है? या समुद्र के समान इस सरोवर से वरुण-लक्ष्मी प्रकट हुई है ? ॥२५॥ इदमद्भुतकौशलं विधातुर्मदिराक्षीरमणीयताविधाने। त्रिविष्टपेऽपि सुदुर्लभं प्रतीमः किमुतास्मिन् मसृणे मनुष्यलोके ॥२६॥ यह सुन्दरी सुन्दर रमणियों की रमणीयता के निर्माण में विधाता का अद्भुत कौशल है। ऐसा अद्भुत सौन्दर्य स्वर्ग में भी, हमारे विचार से, अत्यन्त दुर्लभ है, फिर इस अस्थिर मरणशील मनुष्यलोक की तो बात ही क्या ॥२६॥ मधुना मधुरीकृते वनेऽस्मिन् सततं सन्निहितः प्रसूनबाणः। विजने विजरीहरीति तस्य प्रतिकुञ्जं सहधर्मचारिणी वा ॥२७॥ अथवा, वसन्त से मधुर बनाये हुए इस उपवन में कामदेव सदा उपस्थित रहता है, अतः संभव है कि यह उसकी धर्मपत्नी रति हो जो उसके साथ इस उद्यान के कुंजों में विहार कर रही है ॥२७॥ कुसुमाकरशीलिते वनेऽस्मिन् मदनः सन्निहितः सहैव रत्या। रतिरेव विभाव्यते पुरस्तादतनुत्वादपरः परोक्ष एव ॥२८॥ वसन्त से सुशोभित इस उद्यान में कामदेव का रति के साथ विहार करना सर्वथा उचित है। अतः यह सुन्दरी निश्चय ही रति है और कामदेव, शरीररहित होने के कारण, दिखाई नहीं देता।२८।

नवमः सर्गः ८५ स्वयमेव समीपमेत्य तावत् प्रणयप्रश्नपुरःसरं कृशाङ्ग्याः । कुलजातिनिवासचेष्टितानि प्रतिपत्स्ये निखिलानि सावधानः ॥२९॥ मैं स्वयं ही इस कृशांगी के पास जाकर प्रेमपूर्वक प्रश्न करके सावधान मन से इसके कुल, जाति, निवास और कार्य का सारा विवरण प्राप्त कर लूं ॥२९॥ इति चिन्तयति क्षणं क्षितीशे मदनाकूतभरं तरङ्गयन्ती । अविशत् सरसं हृदं तदन्तःकरणं चापि समं सुमध्यमा सा ॥३०॥ जब राजा अजयपाल इस प्रकार सोच ही रहे थे तभी वह सुन्दरी मानों कामदेव के रहस्य को शीघ्र तरंगित करती हुईं उस सरस सरोवर में और साथ ही साथ राजा के सरस हृदय में प्रवेश कर गईं ॥३०॥ अथ रीतिमानुषीममुष्याः प्रविलोक्याकृतिविभ्रमानुरूपाम् । सुविषण्णमना मनोरथानामपि दुष्प्रापमभीप्सितं स मेने ॥३१॥ उसके अलौकिक सौन्दर्य और हाव-भाव के अनुरूप उसका यह अलौकिक व्यवहार देखकर दुःखित-हृदय राजा ने अपने मनोरथों को नितान्त दुष्प्राप्य माना ॥३१॥ स तथागतया तयैव शक्त्या नृपतिर्मर्मणि कीलितः स्मरेण । अवधूय विधेयमात्मनीनं विवशात्मा दिवसान् निनाय शून्यः ॥३२॥ सरोवर में विलीन होनेवाली उस सौन्दर्य-शक्ति के द्वारा हृदय-मर्म में काम-वेदना से पीड़ित राजा अजयपाल विवश होकर अपने सब कर्त्तव्य भूल गये और शून्यमन से दिन बिताने लगे ॥३२॥ धृतिमेतु धृतिः कथं नु तस्मिन् स्थितिरोतिः स्थितिमीहतां कथं वा । स्मृतिभूरतिभूमिमागतोऽयं मतिसंस्थां समतीत्य वर्तते स्म ॥३३॥ जब चरम उत्कर्ष पर पहुँचे हुए कामदेव ने बुद्धि की सीमा को पार कर राजा के हृदय पर आधिपत्य जमा लिया तो फिर राजा कैसे धैर्य धारण करते अथवा शान्तचित्त होकर किस प्रकार स्थित होते ? ॥३३॥ अथ कश्चन भागधेययोगात् मिलितः संसदि सिद्धपूरुषोऽस्य । विनयेन निवेदितो नृपेण प्रणिधाय प्रमना मनाग् बभाषे ॥३४॥ सौभाग्य से एक दिन कोई सिद्धपुरुष राजसभा में आये । राजा के सविनय निवेदन करने पर उन्होंने ध्यान करके, प्रसन्न हो, कुछ इस प्रकार कहा ॥३४॥ [L28