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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 256 में से

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अष्टमः सर्गः ७७ अपि नरेन्द्रपरम्परागतं पदमवाप्य नवाधिपतिर्भुवः । स्वमहसा सहसा बहुसम्पदा बहलयन्नन्यदिवाकरोत् ॥३०॥ पृथ्वी का नया अधिकार पाने वाले अजयपाल ने राजपरंपरा से प्राप्त पद को अपने तेज से और सर्वतोमुखी सम्पत्ति से बढ़ा कर और ही बना दिया ॥३०॥ यदलभन्त पुरा पृथिवीभुजो विजयमानचमूचरसङ्गरैः । स्वनगरे निवसन् नयकोविदः स तदवाप यशः प्रहसन्मुखः ॥३१॥ पहले राजाओं ने जो यश अपने विजयशील सैनिकों द्वारा युद्धों से प्राप्त किया था उस यश को नीतिकुशल और हँसमुख राजा अजयपाल ने राजधानी में रह कर ही प्राप्त कर लिया ॥३१॥ तरुणयन् मिथुनेषु परस्परप्रणयबन्धमपाकृतकैटवम् । सुरभयन्नथ मन्दसमीरणं सुरभिराविर्बभूवदभितो वनम् ॥३२॥ स्त्री-पुरुषों के परस्पर निष्कपट प्रेम-बन्धन को दृढ़ बनाने वाला और मन्द पवन को सुगन्धित [L13

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