सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् न च नवस्तबके सुरभूरुहां रतिपते र्न तथा च शरासने । अतितरां रतिमानशिरे यथा तदधिगत्य वनं मधुपाङ्गनाः ॥२३॥ भ्रमरियों ने जैसी रति उन उपवनों में दिखाई वैसी न तो कल्पवृक्षों के नये पुष्पों के गुच्छों में दिखाई और न कामदेव के पुष्प धनुष में ॥२३॥ सपदि तत्र वनेऽवनिमण्डने फलमनेकविधं यदजायत । तदुपयुज्य तपस्विगणः स्फुटं निजतपःफलितं सममन्यत ॥२४॥ पृथ्वी के भूषण उस उपवन में जो नाना प्रकार के फल उत्पन्न हुये उनको खाकर तपस्वी पूरुषों ने अपना तप सफल समझा ॥२४॥ अथ विधाय विधेयमखण्डयन् गुरुगिरां गरिमाणमकैतवम् । नरपतिः प्रयतश्चिरमुत्सुकप्रियपुरन्ध्रिपुरं धृतिमान् ययौ ॥२५॥ सावधान और धीर राजा अनलदेव ने अपने पुरोहित गुरु के वचनों के गौरव की रक्षा करते हुये निष्कपट रीति से उनकी आज्ञानुसार कार्य सम्पूर्ण किया और फिर चिरकाल से अपने प्रिय की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने वाली स्त्रियों से शोभित अपनी राजधानी गये ॥२५॥ अजनि तस्य सुतः सुकृतालयः क्षितितले जगदेव इति श्रुतः ! विपुलसत्वगुणो जगतोऽप्यलं वितरणाय वनीयकवत्सलः ॥२६॥ उन अनलदेव के पुण्यात्मा, विपुल सत्वगुण से युक्त, महान् बलशाली, सम्पूर्ण जगत् को दान देन में समर्थ, याचकों के प्रिय, जगदेव नाम से विख्यात पुत्र उत्पन्न हुये ॥२६॥ उपचितो जगति प्रथितैर्गुणैर्गुणिसमाजसमादरमण्डितः । प्रतिहतप्रतिपक्षगणोन्नतिर्वसुमतीमशिषद् वशिनां पतिः ॥२७॥ संसार में प्रसिद्ध गुणों से युक्त, गुणी पुरुषों के समुदाय का समुचित आदर करने वाले और शत्रु-समुदाय की उन्नति को रोकने वाले तथा वशी पुरुषों में अग्रगण्य जगदेव ने पृथ्वी पर शासन किया ॥२७॥ विशदकीर्तिमतीव विशालयन् बिसलतामिव तामरसाकरः । स किल बीसलदेवमजीजनद् वसुसमानगुणं वसुधाधिपः ॥२८॥ जैसे सूर्य कमलों की मृणाल-लता को विकसित बनाते हैं वैसे ही अपनी शुभ्र-कीर्ति को अत्यन्त विकसित बनाने वाले उन राजा जगदेव ने देवता के समान गुणवान् (अथवा अग्नि के समान प्रतापी) बीसलदेव को जन्म दिया ॥२८॥ सुचरितैः सततं जनरञ्जनव्यसनिनः खलु बीसलदेवतः । अजयपाल इति प्रथितः सुतो रिपुसमाजजयी समजायत ॥२९॥ अपने सुन्दर चरितों से सदा प्रजा को आनन्दित करने में संलग्न बीसलदेव के शत्रुसमाज को जीतन वाले अजयपाल नाम से विख्यात पुत्र उत्पन्न हुये ॥२९॥