भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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अष्टमः सर्गः ७५ शुभमुहूर्तमिवास्य महीपतेः समधिगम्यनियोगमयोपमम् । स्थपतयः खलु पुष्कररोधसः सुनिपुणाः परिकर्म विनिर्ममुः ॥१५॥ राजा के शुभ मुहूर्त के समान सुन्दर आदेश को पाकर कुशल कारीगरों ने पुष्कर के तट पर लोहे के समान दृढ़ घाट बना दिये ॥१५॥ कनकपुष्पमिव क्रमशोभितामुपरि बिभ्रदथाधिकविस्तृतिम् । व्यरचि कारुगणेन सुमेरुवत् समवतारचयो मणिभिः शुभैः ॥१६॥ कारीगरों ने सोने के फूल के समान सुन्दर, नीचे से ऊपर जाने पर क्रमशः चौड़ी होने वाली, सुन्दर मणियों से जड़ी हुईं, घाटों पर सीढ़ियां भी बनाईं ॥१६॥ तदुपरि प्रथितोज्वलतेजसा प्रतिदिशं पृथिवीपतिना ततः । मणिहिरण्मयहर्म्यनिवेशनं दिविषदामुपदीकृतमायतम् ॥१७॥ सीढ़ियों के ऊपर प्रत्येक दिशा में, तेजस्वी और विख्यात राजा ने देवताओं के योग्य, सोने और मणियों से जड़े हुये विशाल महल बनवाये ॥१७॥ प्रथममेव बभूव निवासभूः सुमनसां किल पुष्करतीर्थभूः । अनलदेवनिवेदितमन्दिरैरजनि सा सुतराममरावती ॥१८॥ पुष्कर तीर्थ की भूमि पहले से ही देवताओं के रहने योग्य थी और राजा अनलदेव के बनवाये हुये घाटों, महलों और मन्दिरों के कारण तो वह इन्द्रपुरी ही बन गई ॥१८॥ कलियुगेऽत्र निगूहितमूर्तयोऽप्यतिमनोरमधामजिघृक्षवः । उपहितायतनप्रतिमामिषाद् ववृतिरे प्रकटास्त्रिदिवौकसः ॥१९॥ कलियुग में स्वर्ग के देवता पृथ्वी पर अपना स्वरूप प्रकट नहीं करते, फिर भी अत्यन्त मनो- हर स्थान में रहने की इच्छा करते ही हैं। अतः पुष्कर के मन्दिरों में बड़ी-बड़ी प्रतिमाओं के बहाने वे प्रकट हुये ॥१९॥ अवततार हरिर्दशधा क्रमात् समयदेशविशेषवशात् पुरा । युगपदेव तदेकनिकेतने दशभिराविर्बभूत् तनुभिर्विभुः ॥२०॥ पहले भगवान् समय और देश विशेष का ध्यान करके क्रमशः दश अवतारों के रूप में प्रकट हुए थे, किन्तु वे पुष्कर के एक ही मन्दिर में एक साथ दसों अवतारों के रूप में प्रकट हुये ॥२०॥ स्फटिकदेवकुले क्वचन स्थितं जलदखण्डमखण्डरुचिं दधौ । हिममयावरणोज्झितमण्डले हिमकरे हरिणस्य यथा वपुः ॥२१॥ संगमरमर के मन्दिर में एक मेघ का टुकड़ा अखण्ड शोभा धारण करता हुआ ऐसा लग रहा था मानों कुहरे के आवरण से मुक्त चन्द्रबिम्ब में हरिण का शरीर हो ॥२१॥ दिविषदायतनान्यभितस्तदा तरुणचारुतरारुणपल्लवैः । व्यरचयत् फलपुष्पपुरस्कृतान्युपवनानि घनान्यवनीपतिः ॥२२॥ राजा ने देव-मन्दिरों के चारों ओर नवीन और अत्यन्त सुन्दर लाल पत्तों वाले एवं पुष्पों और फलों से लदे हुये घने उपवन लगवाये ॥२२॥