सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् निहतमूर्ध्वमुपस्कृतमञ्जसाञ्जनशिलाफलकं तलशालिभिः । नवघनाभमुदीक्ष्य जनावृतं न विजहुर्विपिनं वनबर्हिणः ॥८॥ काले पत्थर की बड़ी पट्टियों को, जिनको मजदूरों ने बराबर करके ऊपर रक्खा था, नये काले बादल समझ कर बन के मोर, जन-समूह के होने पर भी, वन को छोड़ कर नहीं भागे ॥८॥ विकटटङ्कविदारणसंभवैररुणितं घनगैरिकरेणुभिः । क्षितिभृतः क्षतजद्रववद् बभौ बहलनिर्झरनीरमनारतम् ॥९॥ भीषण औजारों से पर्वत की चट्टानों को तोड़ देने के कारण उनमें से गहरे जल की धारा फूट पड़ी जो गेरु के कणों से मिल कर लाल हो गई और ऐसी लगी मानों चट्टानों के टूटने से पर्वत पर जो घाव पड़ गये थे उनसे निरन्तर रुधिर की धारा बह रही हो ॥९॥ परशुपातपरासुमहातरुप्रपतनोत्पतदायतनिःस्वनैः । क्षितिभृदार्तरवं व्यतनोदिव प्रतिरवैर्मुखरीकृतदिङ्मुखैः ॥१०॥ कुल्हाड़ों और फरसों की चोटों से बड़े-बड़े वृक्षों के गिरने के जो विकट शब्द हुये वे दिशाओं की प्रतिध्वनि के कारण प्रगुणित होकर ऐसे लगे मानों पर्वत, अपने ऊपर चोटें पड़ने से, कराह रहा हो ॥१०॥ उपलताडननिष्ठुरनिस्वनव्रणितकर्णयुगं गिरिगह्वरे । उपलताभवनं वनदेवतामिथुनमुज्झितधैर्यमवर्तत ॥११॥ पर्वत की गुफाओं में लता भवन के समीप स्थित वन देवताओं का मिथुन, चट्टानों को तोड़ने के भयंकर शब्दों के कारण मानों अपने कानों में प्रहार का अनुभव करता हुआ, अधीर हो उठा ॥११॥ विदलितद्रुममुद्धृतकण्टकं चिरनिराकृतवन्यमृगद्विजम् । विपणिनां विनिवेशमनोरमं गिरिवनं नगरं समजायत ॥१२॥ वृक्षों को तोड़ देने से, कांटों को उखाड़ फेंकने से, जंगली जानवरों की भगा देने से और व्यापारियों के सुन्दर मकान बन जाने से वह पर्वतप्रदेश सुन्दर नगर के समान बन गया ॥१२॥ अतिबलोद्धृतदीर्घशिलावटाः सपदि निर्मलनिर्झरपूरिताः । तनुभृतां महतामवगाहनक्षमत्तमाः सरितः शतशोऽभवन् ॥१३॥ अत्यन्त बलपूर्वक बड़ी-बड़ी चट्टानों के तोड़ देने से वहाँ गहरे गर्त बन गये जिनमें से निर्मल झरने बहने लगे और उन झरनों के आपस में मिल जाने से वहाँ बड़े-बड़े प्राणियों के स्नान करने योग्य सैकड़ों नदियाँ बन गईं ॥१३॥ अथ रथप्रतिमर्जववत्तया जितमनोभिरनोभिरनायतैः । .परिजनाः परितो गिरितस्ततो मणिशिलाशकलान् समुपाहरन् ॥१४॥ लोग, रथ के समान लगने वालीं, अपने वेग से मन की गति को भी जीतने वालीं, छोटी-छोटी गाड़ियों (बहेलियों) में पर्वत के चारों ओर से मणिशिलाओं के टुकड़े रख कर घर ले गये ॥१४॥