सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० अष्टमः सर्गः इति निशम्य गिरोऽथ पुरोधसः श्रितमनोरमपुष्कररोधसः । समनुमोदितवान् मुदितः प्रभुर्हितवचो हि सताममृतायते ॥ १ ॥ पुष्कर के मनोहर तट पर खड़े हुये पुरोहित के पूर्वोक्त वचन सुन कर राजा अनलदेव ने प्रसन्न होकर उनका अनुमोदन किया । हित के लिये कहे गये वचन सज्जनों को अमृत तुल्य लगते हैं ॥ १ ॥ अदिशदाशु च दाशरथिप्रभश्चतुरदासजनान् स जनाधिपः । सपदि पुष्करतीर्थपरिष्कृतौ व्रजत सम्प्रति सोद्यमतामिति ॥ २ ॥ भगवान् राम के समान तेजस्वी राजा ने अपने अनुचरों को शीघ्र पुष्कर में घाट बनाने के लिये आज्ञा दी ॥ २ ॥ उपलदारणदारुणवर्तनाः परशुपट्टिशटङ्कपरिच्छदाः । प्रचलिताश्चपलं चपलेरितैः कलकलैरथ जानपदा जनाः ॥ ३ ॥ इसके बाद मज़दूर लोग जो पत्थर फोड़ने के भीषण कार्य में कुशल थे, फरसे, फावड़े, टाँके आदि औज़ार लेकर वेग से, चापल्य से कलकल शब्द करते हुये, रवाना हुये ॥ ३ ॥ गुरुवरण्डकरज्जुभिरूर्जिता जितयमानुचरव्रजडम्बराः । मृगयुवन् मृगयूथमुपाद्रवन् द्रुतपदध्वनिनाऽध्वनि केचन ॥ ४ ॥ कुछ लोग बड़ी-बड़ी पट्टियाँ उठाने योग्य दृढ़ रस्सियाँ लेकर, यमराज के दूतों के समूह की तीव्र गति को जीतने वाले वेग से, जिस प्रकार शिकारी शिकार पर टूट पड़ता है उसी प्रकार, पग-ध्वनि से मार्ग गुंजाते हुये, टूट पड़े ॥ ४ ॥ अगणितोन्मदवारणयूथपाः प्रसभरुद्धबिलेशयकन्दराः । शिखरिणां शिखराणि समापतन् प्लवगतैरपरे प्लवगा इव ॥ ५ ॥ कुछ लोग मदमत्त हाथियों के झुण्ड की परवाह न करके, वेग से पर्वत की गुफाओं को रोक कर, बन्दरों की तरह कूदते फाँदते, पर्वतों के शिखरों पर चढ़ गये ॥ ५ ॥ उपरिगप्रतिबिम्बविभावनात् प्रतिमुहूर्तमुपस्थितसंभ्रमाः । अघटयन् घटकाः कटकान्तरे प्रणिहिताः स्फटिकोपलपट्टकान् ॥ ६ ॥ ऊपर दिखाई देने वाली अपनी परछाईं के कारण कुछ देर चकित हुये कुशल मज़दूरों ने संगमरमर की बड़ी-बड़ी पट्टियाँ पानी के किनारे पर खड़ी कर दीं ॥ ६ ॥ गिरिदरीशयिताः शरदम्बुदाः स्फटिकपट्टधिया घनपट्टिशैः । अभिहता जनताः समतापयन् सपदि सस्तनितैस्तडिदग्निभिः ॥ ७ ॥ पर्वत की गुफाओं में सोने वाले शरद् ऋतु के सफ़ेद बादलों को संगमरमर की पट्टियाँ समझ कर कुछ मज़दूरों ने बड़े-बड़े औजारों से उन्हें तोड़ दिया और शीघ्र ही उनमें से भयंकर गर्जना और बिजलियों की आग निकली जिससे बड़ी दूर तक लोग भयभीत हो गये ॥ ७ ॥