सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सहजमेव समेत्य मधुश्रिया विकलयेत् पथिकान् बकुलद्रुमः । किमुत मेदुरितो मदिरेक्षणावदनवासितसीधुसुधारसैः ॥३७॥ वसन्त की लक्ष्मी को प्राप्त कर बकुल वृक्ष सहज ही पथिकों को व्याकुल कर देता है; फिर मादक नयनों वाली कामिनियों के मुख से उगली हुई मदिरा के अमृत-रस को पीकर विकसित होने पर तो कहना ही क्या ! (कवि समय के अनुसार बकुलवृक्ष स्त्रियों के मुख से कुल्ले की हुई मदिरा को पीकर अत्यन्त विकसित होता है) ॥३७॥ अदशदाम्रलतांनवपल्लवं सुललितस्वरहेतुकूहूमुखः । अभवदाशु वियोगमृगीदृशां हृदयमर्मणि दारुणवेदना ॥३८॥ अत्यन्त ललित-स्वर में कूकने वाली कोयल ने आम्रलता के नये पल्लव पर चोंच मारी, किन्तु इससे शीघ्र ही वियोगिनी स्त्रियों के हृदयमर्मों पर भीषण आघात हुआ ॥३८॥ स्मृतिभुवः श्वसितैरिव शीतलैैरपि नितान्तमरुन्तुदकर्मभिः । अजनि चेतसि मन्दसमीरर्णैश्चरममन्दरुजाध्वगयोषिताम् ॥३९॥ कामदेव की साँसों के समान शीतल, किन्तु फिर भी मर्मस्पर्शी पीड़ा देने वाले, मन्द पवन से प्रोषितपतिका स्त्रियों के मन में तीव्र वेदना हुई ॥३९॥ अधिवनान्तमशोकमहीरुहः स्फुटमशोभत कोमलपल्लवः । निहितदोहदमन्दुमुखीपदं किमु सभाजयितुं प्रसृतः करः ॥४०॥ उपवन में अशोक वृक्ष की कोमल शाखा ऐसी शोभित हुई मानों (अशोक को) पुष्पित करने वाले, चन्द्रमुखी कामिनी के पैर को पूजने के लिए बढ़ाया हुआ अशोक का हाथ हो । (कवि- समय के अनुसार अशोक वृक्ष स्त्रियों के पादाघात से पुष्पित होता है ) ॥४०॥ ज्वलयताथ पलाशमयेन्धनैर्मनसिजज्वलनं मधुयज्वना । विरहिणामभिचारमखे द्विजः प्रथम ऋत्विगकारि वनप्रियः ॥४१॥ वसन्त रूपी यजमान ने विरही पुरुषों को मारने के निमित्त कराये गये यज्ञ में पलाश-रूपी ईंधन (समिधा) से कामदेव रूपी अग्नि को प्रज्वलित करके वन में रहने वाले द्विज (पक्षी अर्थात् कोयल; ब्राह्मण) को प्रथम ऋत्विक् (यज्ञ करने वाला प्रमुख ब्राह्मण) बनाया ॥४१॥ दिनकृतोज्झितदक्षिणवर्त्मना प्रथयतातिकठोरकरव्रजम् । अहरहः परितापमुपेयिवान् नृपतिनेव कुनीतिमता जनः ॥४२॥ दक्षिणायन से उत्तरायण होने वाले और किरण-समूह को अत्यन्त उग्र करने वाले सूर्य के कारण जनता को दिन-दिन अधिक गर्मी प्राप्त होती गई; जिस प्रकार दक्षिण (उचित और न्याय- शील) मार्ग छोड़ देने वाले अन्यायी और अत्यन्त कठोर कर लगाने वाले निर्दय, कुनीति वाले राजा के कारण जनता का सन्ताप दिन-दिन बढ़ता जाता है ॥४२॥ (४१) मधुयज्वना वसन्तरूपयजमानेन। वनप्रियो द्विजः कोकिलः। प्रथम ऋत्विक् प्रधानयाज्ञिकः।