सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः ७९ परिमलैः परितैः पवनेरितैर्विविधपुष्पसमृद्धिसमुद्भवैः । तत इतो ह्रियमाणमनाः क्वचित् स्थितिमधान् न मधुव्रतसन्ततिः ॥४३॥ नाना प्रकार के पुष्पों के मकरन्द से उत्पन्न होनेवाली और वायु द्वारा चारों ओर फैलाई गई सुगन्ध के कारण इधर-उधर खींचे गये चित्त वाली भ्रमरों की पंक्ति कहीं स्थिर होकर नहीं बैठ सकी ॥४३॥ कुसुमपल्लवदुर्ललिता लताः परभृताऽऽविरुतानि वनानिलाः । परममीभिरकारि वशे जगद् विभुतयैव यशोऽलभत स्मरः ॥४४॥ पुष्पों और पल्लवों के दुलार से लाड़ली लतायें, कोयलों की कूकें, उपवंन के पवन—इन सबने जगत् को वश में कर लिया, किन्तु प्रभु होने के कारण यश मिला कामदेव को ॥४४॥ विधिवशः प्रसवोऽस्तु यथा तथा कुरबकान् न परो रसिकस्तरुः । सकृदुपात्तवधूपरिरम्भजाः शिथिलिता यदमुष्य न कण्टकाः ॥४५॥ फूलना-फलना तो विधाता के हाथ है इसलिये भले ही कुरवक वृक्ष के काँटे उत्पन्न होते हैं, [