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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

८० सुर्र्जनचरितमहाकाव्यम् धृतनिजासनसक्तगुणं वधुकुलमदीव्यत दोलनविभ्रमैः । प्रियगुणग्रथितान् पथिकप्रिया मुहुरसूनधिकण्ठमदोलयन् ।।५०।। लकड़ी की पट्टी को झूले के गुणों (रस्सियों) पर रख कर ललनायें झूला झूलने की क्रीड़ा कर रही थीं, किन्तु विरहिणी स्त्रियाँ अपने प्रियतमों के गुणों में अपने प्राणों को गूँथ कर उन प्राणों को बार-बार अपने कंठों में झुला रहीं थीं ।।५०।। हतहिमावरणः परिशीलयन् कमलिनीं मिलितां बहुकालतः । स्फुटमतृप्तमना दिननायकः शिथिलरथ्यरयः शनकैरगात् ।।५१।। (अपनी प्रिया कमलिनी के शत्रु) कुहरे और पाले के पर्दे को नष्ट करके, बहुत समय बाद मिली हुई प्रिया कमलिनी से प्रेमालाप करने वाले सूर्य भगवान्, अतृप्त मन से, अपने रथ के घोड़ों का वेग कम करके, बड़ी कठिनता से धीरे-धीरे गए। (वसन्त में दिन काफ़ी बड़े हो जाते हैं) ।।५१।। नियतमम्बुजिनोमवलोकयन्नजनि मन्दरुचिः शिशिरे रविः । इतरथा कथमेतदुदीक्षणात् प्रकृतिमाप पुनर्भंगवान् निजाम् ।।५२।। शिशिर-ऋतु में निश्चय ही अपनी प्रेयसी कमलिनी को न देखने के कारण सूर्य की प्रभा फीकी (मन्दरुचि) पड़ गई थी, अन्यथा अब वसन्त में कमलिनी को देखकर सूर्य भगवान् फिर स्वभाव से चण्डरुचि (उग्र तेज वाले; सूर्य का नाम) कैसे बन गये ? ।।५२।। दिनमुखोपचितं हरितां मुखान् मलिनिमानमुदस्य मरीचिमान् । कलहखेदितवल्लभचेतसामधिमुखं निदधे हरिणीदृशाम् ।।५३।। प्रातःकाल में दिशाओं के मुखों पर लगी हुई (अन्धकार की) कालिमा को हटा कर सूर्य न उस प्रणय-कलह से रात भर प्रियतमों के मन को दुःख देनेवाली कलहान्तरिता नायिकाओं के मुखों पर पोत दिया। (अपने हठ से वसन्त की रात प्रणय-कलह के कारण बेकार खो देने से प्रातः काल कलहान्तरिताओं के मुख शोक से मलिन हो गये) ।।५३।। सुवदनारदनच्छदकोमला नवविमुक्तपुटा मृदुपल्लवाः । असितदृक्श्वसितप्रतिरूपका मलयशैलसखा वनवायवः ।।५४।। नववधूनिभृतालपितोपमाः परभृतापरिषत्कलनिस्वनाः । पृथगपि प्रभवेयुरयोगिनां विशसने किमुताधिकसंहताः ।।५५।। सुन्दर मुख वाली रमणियों के अधर के समान कोमल नये खिले हुए ये मृदु पल्लव, काली आँखों वाली सुन्दरियों की साँस के समान सुगन्धित मलयगिरि के मित्र ये उपवन के वायु, नवोढा नायिकाओं के एकान्त में बोले गये वचनों के समान मधुर ये कोयलों की सुन्दर कूकें—इनमें से प्रत्येक अलग-अलग भी, विरही जनों को सन्ताप देने में पूर्ण समर्थ है, फिर सबके इकट्ठे मिल जाने पर तो कहना ही क्या ! ।।५४–५५।। विततबहुविधप्रसूनमालां भृततिलकां किल काञ्चनाढ्यभूषाम् । नरपतिरथ निर्ययौ तदानीं दयिततमामिव वोक्षितुं वनालीम् ।।५६।। तब विविध पुष्पों की विस्तृत मालायें धारण करने वाली, तिलक (सौभाग्य चिह्न; एक वृक्ष) से युक्त, सुवर्ण की समृद्धि से भूषित, प्रियतमा के समान लगने वाली, उपवन-वाटिका को देखने के लिये राजा अजयपाल चले ।।५६।। इति सुर्जनचरितमहाकाव्येऽष्टमः सर्गः । (५०) अदीव्यत इत्यत्र दिविरन्तर्भावितण्यर्थः कर्मणि लङ् क्रीडां कारितमित्यर्थः ।