सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें११ नवमः सर्गः अवनीरमणो मनोरमाभिः कियतीभिः कुतुकेन कामिनीभिः । कुसुमाकरकौशलं दिदृक्षुर्निजमाराममथोज्वलं जगाम ॥ १ ॥ राजा अजयपाल कुछ सुन्दर कामिनियों के साथ कौतुकवश वसन्त की शोभा देखने के लिये अपने सुन्दर उपवन में गये ॥ १ ॥ जितपल्लवविभ्रमाः कराग्रैर्विहसन्त्यो नखरोचिषा प्रसूनम् । मुखरैः कलनूपुरैरलीनां दुरहङ्कारमनारतं हरन्त्यः ॥ २ ॥ भणितैरनृतीकृतामृतौघैः कलकण्ठीविरुतानि कुण्ठयन्त्यः । शिथिलां सुरभिश्रियं वितेनुः प्रविशन्त्यः पृषतीदृशो वनान्तम् ॥ ३ ॥ अपने कोमल हाथों से पल्लवों की शोभा हरने वाली, नखों की कान्ति से पुष्पों को मात करने वाली, नूपुरों की मनोहर ध्वनि से भ्रमरों के दुर्मद को सदैव हरने वाली, अमृत के प्रवाह को तुच्छ करने वाले मधुर वचनों से कोयलों की कूक को कुण्ठित करने वाली मृगनयनी कामिनियों ने उपवन में प्रवेश करके वसन्त की शोभा को अपनी शोभा के आगे फीका बना दिया ॥ २-३ ॥ करमर्पयितुं कृतानुबन्धां नवसूनस्तबकेषु वामनेत्राम् । प्रतिषेद्धुमसूयया किमुच्चैः कृतनादं मधुपालिरुच्चचाल ॥ ४ ॥ नये पुष्पों के गुच्छों में (तोड़ने के लिये) हाथ डालने के यत्न में बद्धपरिकर मृगनयनी को ईर्ष्या के कारण मानों मना करती हुई भ्रमरों की पंक्ति उच्च-स्वर से हुंकारती हुई उड़ गई ॥ ४ ॥ अविषह्यमनङ्गकिङ्करीभिः सहकाराङ्कुरभङ्गमङ्गनाभिः । अवलोक्य विदूरमुत्पतन्ती विकला किं पिककामिनी चुकूज ॥ ५ ॥ कामदेव के आधीन स्त्रियाँ आम की नई कोंपल का (कामदेव का धनुष होने के कारण) तोड़ना नहीं सह सकतीं। मानों इसीलिये यह देख कर कोयल दूर उड़ गई और व्याकुल होकर कूकने लगी ॥ ५ ॥ घनकुञ्जतिरोहितं धुवत्यास्तरुमुच्चैः कुसुमाशया युवत्याः । कलकङ्कणझङ्कृतं निशम्य क्षणसंभावितवैशसा सपत्नी ॥ ६ ॥ स्फुरिताधरपल्लवा सकम्पा पवमानोल्लसितेन कापि वल्ली । अरुणं मुखमातपेन भूयोऽप्यरुणिम्नैव तिरोहितं वहन्ती ॥ ७ ॥ द्रुतमुच्चलितुं कृतप्रयत्ना विनिरुद्धा घनवीरुधां वितानैः । सहसावचितैः सह प्रसूनै र्न दुकूलं गलितं विदाञ्चकार ॥ ८ ॥ घने कुंज में छिपे हुये किसी वृक्ष को, फूलों की आशा से, जोर से हिलाती हुई युवती के कंकणों (६) वैशसं ईर्ष्याजन्यक्रोधः ।