सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् की सुन्दर झनकार सुन कर समीपस्थ लता को, युवती को सपत्नी समझकर, तुरन्त ईर्ष्या हो गई और वह अपने पल्लव-रूपी अधर को फड़काती हुई, वायु से हिलने के कारण मानों क्रोध से काँपती हुई, धूप से लाल मुख को क्रोध की लाली से छिपाती हुई, वेग से चलने के लिये तैयार हुई, किन्तु अन्य घनी लताओं के विस्तार से रोक ली गई; ईर्ष्या से वह इतनी आकुल हो गई थी कि उसे हिलने के कारण सहसा नीचे गिरे हुए अपने फूलों-रूपी वस्त्र तक का ध्यान नहीं रहा ॥ ६-८ ॥ जननावधि सेवितां नितान्तं बत सत्स्वामिवधूमिवान्तराद्राम् । स्वपदव्यसनेऽपि षट्पदाली सुमनःसन्ततिमन्वियाय दूरम् ॥ ९ ॥ विद्वान् पिता की पुत्री, जन्म से ही अच्छी तरह सेवित, दयार्द्रहृदया और सुशीला स्वामिनी के समान जन्म से ही भलीभाँति सेवित, मकरन्द से आर्द्र, और शुभ्र होने के कारण सुन्दर, पुष्पों की पंक्ति के पीछे, अपने स्थान से हटाकर दूर ले जाये जाने पर भी, भ्रमरों