सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमः सर्गः ८३ निपुणं निजदेवमर्चयेति प्रथिताकूतमुदाहृताऽथ सख्या। कुटिलीकृतपाटलान्तनेत्रा वदनेऽस्याः क्षिपति स्म तानि तूर्णम् ॥१५॥ सामने लगे हुए फूलों में से झट पाँच छःफूल तोड़कर मुग्धा वधू ने, प्रियतम के पास होने के कारण, उन्हें हथेली में छिपा लिया। किन्तु किसी सखी ने उसे देख लिया और व्यंग्यपूर्वक कहा— 'इन फूलों से अपने देवता की अच्छी तरह पूजा करो।' इस पर मुग्धा वधू ने, अपनी तिरछी और लाल आँखों से उसकी ओर देखकर, शीघ्र उन फूलों को सखी के मुख पर ही फेंक दिया ॥१४-१५॥ नवखण्डितपल्लवावलीनां क्षरितक्षीरकषायितः क्रमेण। श्रमशीकरजालकेऽबलानां क्षणमस्पन्द इवास गन्धवाहः ॥१६॥ नये कोमल पत्तों के समूहों को तोड़ने के कारण उनमें से निकले हुए रस से सुगन्धित पवन, क्रमशः ललनाओं के श्रमजन्य पसीने की बूंदों के जाल पर, क्षण भर गतिशून्य सा होकर, रुका रहा ॥१६॥ समुदान्समुदायमङ्गनानां श्रमखेदादलसालसञ्चलन्तम्। न विवेद विदूरतां भजन्तं वनलक्ष्मीविनिभालनान् नरेन्द्रः ॥१७॥ उपवन की शोभा देखने में संलग्न होने के कारण, राजा को, परिश्रम के खेद से धीरे धीरे चलने वाले और बहुत दूर तक चले जाने वाले स्त्रियों के समूह का ध्यान नहीं रहा ॥१७॥ अवगाह्य च काननं महीयः सुमुहूर्तादथ देवतासहायः। अवलोकयति स्म लोकपालप्रतिमल्लः कमलाकरं प्रफुल्लम् ॥१८॥ ईन्द्रादि दिक्पालों के समान प्रतापी राजा अजयपाल ने अकेले ही उस बड़े उद्यान के भीतर जाकर सुमुहूर्त में एक कमलों से खिले हुए सरोवर को देखा ॥१८॥ तटसीमनि तस्य वेदिकायां स्फुटकङ्केल्लिनिकुञ्जरञ्जितायाम्। अमृत्ताञ्जनतामयं निनाय स्वदृशोः कामपि भामिनीमपूर्वाम् ॥१९॥ राजा ने उस सरोवर के किनारे पर, खिले हुए अशोक के कुंज से शोभित एक छोटे से चबूतरे पर स्थित, नेत्रों को अमृत के अञ्जन के समान आनन्द देने वाली एक अलौकिक सुन्दरी को देखा ॥१९॥ चिकुरार्पितदिव्यदामगन्धादुपरिष्टात् परितो विवर्तमानैः। शिखिपत्रकृतातपत्रकान्ति कलयद्भिर्भ्रमरैर्निषेव्यमाणाम् ॥२०॥ पतनोत्पतनाकुलद्विरेफं मुहुरुन्मुद्रणमुद्रणाभियोगात्। स्फुरदङ्गुलिमुह्यमानपत्रं कलमयन्तीं कमलं करस्थनालम् ॥२१॥ मदनज्वरमुल्वणानुबन्धं मदनेऽपि प्रसभं निवेशयन्तीम्। नवविभ्रमसंभृतैरपाङ्गै रतिवल्लीदल ताण्डवप्रसङ्गैः ॥२२॥ वह सुन्दरी अपने बालों में लगाई गई अलौकिक पुष्पमाला की सुगन्ध के कारण चारों ओर (१९) कंकेल्लिरशोकः। (२०) शिखिनो मयूरस्य पत्रेण पिच्छेन कृतमातपत्रं येन सः श्रीकृष्णः तस्य कान्तिं शोभां श्यामतामित्यर्थः।