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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 256 में से

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८४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ऊपर मँडराने वाले तथा मयूरपिच्छ रूपी छत्र धारण करनेवाले भगवान् कृष्ण की कान्ति को चुराने- वाले (अर्थात् श्रीकृष्ण के समान श्याम) भ्रमरों द्वारा सेवित थी। वह एक हाथ में कमल की नाल पकड़े हुए थी और दूसरे हाथ से, लीला के कारण, कमल को कभी खोलती और कभी बन्द करती थी जिस कारण कमल पर मँडरानेवाले भ्रमर बार बार गिरने से और उड़ने से आकुल हो- रहे थे और उज्ज्वल उँगलियों द्वारा पखुड़ियों के मर्दन से कमल म्लान हो रहा था। लता के वायु- कम्पित पल्लवों के नाच के समान चञ्चल तथा नवीन हाव भाव से शोभित कटाक्षों द्वारा वह सुन्दरी स्वयं कामदेव को भी काम-ज्वर के उत्कट आवेग का बलपूर्वक शिकार बना रही थी ॥२०-२२॥ वशिनां प्रथमोऽपि पार्थिवेन्द्रः स तदालोकसमानकालमेव। युगपद् विशिखैः प्रसूनकेतोरभवन् मर्मणि पञ्चभि विभिन्नः ॥२३॥ राजा अजयपाल, वशी पुरुषों में अग्रगण्य होने पर भी, उस दिव्य सुन्दरी को देखते ही काम- देव के पाँचों बाणों से एक साथ घायल हो गये ॥२३॥ विनियम्य च मानसं प्रयत्नात् क्षणमक्षोणमतिः पतिः पृथिव्याः। इदमन्तरचिन्तयत् तदानीं बहुभिर्व्याकुलितेन्द्रियो वितर्कैः ॥२४॥ बुद्धिमान् राजा ने बड़े प्रयत्न से अपने चित्त को वश में करके, अनेक तर्क-वितर्कों से व्याकुल मन में इस प्रकार विचार किया ॥२४॥ किमियं वनदेवतैव तावन् मधुलक्ष्मीः किमु लक्षणीयमूर्तिः। वरुणालयसोदरादमुष्माद् वरुणश्रीः सरसः किमुन्ममज्ज ॥२५॥ क्या यह सुन्दरी कोई वनदेवता है? या यह सुन्दर वसन्तलक्ष्मी है? या समुद्र के समान इस सरोवर से वरुण-लक्ष्मी प्रकट हुई है ? ॥२५॥ इदमद्भुतकौशलं विधातुर्मदिराक्षीरमणीयताविधाने। त्रिविष्टपेऽपि सुदुर्लभं प्रतीमः किमुतास्मिन् मसृणे मनुष्यलोके ॥२६॥ यह सुन्दरी सुन्दर रमणियों की रमणीयता के निर्माण में विधाता का अद्भुत कौशल है। ऐसा अद्भुत सौन्दर्य स्वर्ग में भी, हमारे विचार से, अत्यन्त दुर्लभ है, फिर इस अस्थिर मरणशील मनुष्यलोक की तो बात ही क्या ॥२६॥ मधुना मधुरीकृते वनेऽस्मिन् सततं सन्निहितः प्रसूनबाणः। विजने विजरीहरीति तस्य प्रतिकुञ्जं सहधर्मचारिणी वा ॥२७॥ अथवा, वसन्त से मधुर बनाये हुए इस उपवन में कामदेव सदा उपस्थित रहता है, अतः संभव है कि यह उसकी धर्मपत्नी रति हो जो उसके साथ इस उद्यान के कुंजों में विहार कर रही है ॥२७॥ कुसुमाकरशीलिते वनेऽस्मिन् मदनः सन्निहितः सहैव रत्या। रतिरेव विभाव्यते पुरस्तादतनुत्वादपरः परोक्ष एव ॥२८॥ वसन्त से सुशोभित इस उद्यान में कामदेव का रति के साथ विहार करना सर्वथा उचित है। अतः यह सुन्दरी निश्चय ही रति है और कामदेव, शरीररहित होने के कारण, दिखाई नहीं देता।२८।

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