भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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नवमः सर्गः ८५ स्वयमेव समीपमेत्य तावत् प्रणयप्रश्नपुरःसरं कृशाङ्ग्याः । कुलजातिनिवासचेष्टितानि प्रतिपत्स्ये निखिलानि सावधानः ॥२९॥ मैं स्वयं ही इस कृशांगी के पास जाकर प्रेमपूर्वक प्रश्न करके सावधान मन से इसके कुल, जाति, निवास और कार्य का सारा विवरण प्राप्त कर लूं ॥२९॥ इति चिन्तयति क्षणं क्षितीशे मदनाकूतभरं तरङ्गयन्ती । अविशत् सरसं हृदं तदन्तःकरणं चापि समं सुमध्यमा सा ॥३०॥ जब राजा अजयपाल इस प्रकार सोच ही रहे थे तभी वह सुन्दरी मानों कामदेव के रहस्य को शीघ्र तरंगित करती हुईं उस सरस सरोवर में और साथ ही साथ राजा के सरस हृदय में प्रवेश कर गईं ॥३०॥ अथ रीतिमानुषीममुष्याः प्रविलोक्याकृतिविभ्रमानुरूपाम् । सुविषण्णमना मनोरथानामपि दुष्प्रापमभीप्सितं स मेने ॥३१॥ उसके अलौकिक सौन्दर्य और हाव-भाव के अनुरूप उसका यह अलौकिक व्यवहार देखकर दुःखित-हृदय राजा ने अपने मनोरथों को नितान्त दुष्प्राप्य माना ॥३१॥ स तथागतया तयैव शक्त्या नृपतिर्मर्मणि कीलितः स्मरेण । अवधूय विधेयमात्मनीनं विवशात्मा दिवसान् निनाय शून्यः ॥३२॥ सरोवर में विलीन होनेवाली उस सौन्दर्य-शक्ति के द्वारा हृदय-मर्म में काम-वेदना से पीड़ित राजा अजयपाल विवश होकर अपने सब कर्त्तव्य भूल गये और शून्यमन से दिन बिताने लगे ॥३२॥ धृतिमेतु धृतिः कथं नु तस्मिन् स्थितिरोतिः स्थितिमीहतां कथं वा । स्मृतिभूरतिभूमिमागतोऽयं मतिसंस्थां समतीत्य वर्तते स्म ॥३३॥ जब चरम उत्कर्ष पर पहुँचे हुए कामदेव ने बुद्धि की सीमा को पार कर राजा के हृदय पर आधिपत्य जमा लिया तो फिर राजा कैसे धैर्य धारण करते अथवा शान्तचित्त होकर किस प्रकार स्थित होते ? ॥३३॥ अथ कश्चन भागधेययोगात् मिलितः संसदि सिद्धपूरुषोऽस्य । विनयेन निवेदितो नृपेण प्रणिधाय प्रमना मनाग् बभाषे ॥३४॥ सौभाग्य से एक दिन कोई सिद्धपुरुष राजसभा में आये । राजा के सविनय निवेदन करने पर उन्होंने ध्यान करके, प्रसन्न हो, कुछ इस प्रकार कहा ॥३४॥ [L28