सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इयमायतकौतुका भ्रमन्ती क्रमतस्ते कमलाकरादधस्तात् । विकचाम्बुजसौरभाद् व्युदस्य द्रुतमम्भांसि कदाचिदुन्ममज्ज ॥३७॥ एक बार कौतुकवश घूमती हुई यह विजया विकसित कमलों से सुगन्धित आपके उद्यान- सरोवर के पानी को हटा कर बाहर निकली ॥३७॥ मधुमासविशेषितामभिख्यामभिवीक्ष्योपवनस्य वामनेत्रा । नवमञ्जुलवेदिकानिषण्णा चिरमासीद् विरतेतरप्रसङ्गा ॥३८॥ वह वसन्त ऋतु से सुशोभित उद्यान की शोभा देखकर, प्रफुल्ल अशोक वृक्षों से रमणीय एक छोटे चबूतरे पर बैठ कर, अन्य बातों को भूल कर, उस उद्यान की शोभा में खो गई ॥३८॥ विशिखैर्विषमायुधस्य तीक्ष्णैः कृतरन्ध्रे हृदि वेदिमध्यमायाः । विहरन् विपिनान्तरे त्वमस्या नयनोपान्तपथेन संप्रविष्टः ॥३९॥ इसके बाद उद्यान में विहार करते हुए आप इस पतली कमर वाली