भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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नवमः सर्गः ८७ स्वमनीषितसाधनाय यत्नादवनीश प्रवणीकृतात्मचेताः । भगवन्तममन्तरायसिद्धिं तमनन्तं त्वमनन्तरं भजेथाः ॥४५॥ राजन् ! अपने मन को सुदृढ़ करके, अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये, आप अब शीघ्र ही प्रयत्न- पूर्वक, निर्विघ्न सिद्धि देने वाले अनन्त भगवान् की उपासना करें ॥४५॥ कतिभिर्दिवसैर्जगन्निवासे वरिवस्याविधिना तव प्रसन्ने । भुवनत्रयमप्यधीनमेतत् किमु पातालतलस्थितैकनारी ॥४६॥ कुछ दिनों में ही आपकी सेवाविधि से जगन्निवास परमेश्वर के प्रसन्न हो जाने पर, तीनों लोक आपके अधीन हो सकते हैं फिर पाताल लोक में रहने वाली एक स्त्री की तो बात ही क्या ? ॥४६॥ गिरमित्थमुदीर्य सोपदेशां स दिशं स्वाभिमतां जगाम सिद्धः । परमेशमुपास्य पार्थिवोऽपि प्रमनाः प्रार्थितलाभतो बभूव ॥४७॥ इस प्रकार उपदेशयुक्त वचन कहकर वे सिद्ध पुरुष अपनी वांछित दिशा की ओर चले गये । राजा अजयपाल भी परमेश्वर की उपासना करके वांछित लाभ हो जाने से प्रसन्न हो गये ॥४७॥ अथ यस्य जलाशयस्य तीरे तरुणीं तां नयनातिथीचकार । परवानिव निममज्ज दूरं विहरन्नम्भसि तस्य भूमिपालः ॥४८॥ फिर उसी सरोवर के तीर पर जाकर, जहाँ उन्होंने उस तरुणी को देखा था और विवश से हो गये थे, राजा अजयपाल पानी में डुबकी लगाकर दूर तक घुस गये ॥४८॥ क्षणतः पृथुपन्नगोत्तमाङ्गोल्लसदुत्तुङ्गमणीमयूखजालैः । अपहस्तितपीवरान्धकारं फणिलोकं स विलोकयाञ्चकार ॥४९॥ क्षण भर बाद ही उन्होंने, बड़े-बड़े सर्पों के मस्तकों में चमकने वाली विशाल मणियों के किरण-समूह से अन्धकार को दूर करनेवाले, नागलोक को देखा ॥४९॥ वदनैर्मदनैकतानिदानैर्विलसत्पन्नगनारीजनानाम् । इतरेतरविस्मयाज्जगत्यां शशिनैकेन कृतार्थतां प्रपन्ने ॥५०॥ रजनीशदिनेशयोरयोगाद्विनिर्धारितवासरत्रियामे । अनिशं सरसीरुहं सहासं मुदिता यत्र निरन्तरं रथाङ्गाः ॥५१॥ उज्ज्वल सर्प-युवतियों के कामदेव को अत्यन्त जाग्रत् करने वाले अनेक चन्द्रमुखों से कृतार्थ नागलोक मानों एक ही चन्द्रमा से कृतार्थ हो जाने वाले मर्त्यलोक की हँसी कर रहा हो । चन्द्रमा और सूर्य के न होने के कारण नागलोक में दिन और रात का पता ही नहीं चलता था। अतः वहाँ कमल सदैव खिले रहते थे और चकवा चकवी सदैव साथ-साथ रहने के कारण प्रसन्न रहते थे ॥५०-५१॥ (५०-५१) जगत्यां मर्त्यलोके एकेनैव शशिना प्रकाशितायां सत्यामितरेतरविस्मयात् विलसन्तीनां पन्नग- नागरीजनानां मदनैकतानिदानैश्चन्द्रोपमैरनेकवदनैश्चन्द्राभावेऽपि कृतार्थतां प्रपन्ने नागलोके चन्द्रसूर्ययोरयोगा- द्विनिर्धारितरात्रिदिवसविभागे कमलानि निरन्तरं विकसन्ति चक्रवाकमिथुनानि च वियोगाभावे निरन्तरं प्रसन्नानि सन्तीत्यर्थः।