भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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८८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इतरत्र यदर्जितं तपोभिः सुकृतं विस्मृतकैतवप्रपञ्चैः । फलमस्य महार्हमश्नुवानाश्चिरकालं निवसन्ति यत्र जीवाः ॥५२॥ अन्य लोकों में निश्छल तपस्या के द्वारा जो पुण्य प्राप्त किया था उसका महान् फल भोगने के लिए जीव चिरकाल तक नागलोक में निवास करते थे ॥५२॥ न जराकृतवैकृतप्रसङ्गो न च विच्छेदविभीषिकावकाशः । मिथुनस्य मिथोऽनुरागबन्धो नितरां यत्र निरामयश्चकास्ति ॥५३॥ न वहाँ वृद्धावस्था के कारण शरीर में विकृति होती थी और न वियोग के भीषण दुःख का अवकाश था। वहाँ दम्पति स्वस्थ परस्पर प्रेमानुराग से युक्त रहते थे ॥५३॥ वनिताऽऽस्यनिशाकरैरसङ्ख्यैर्बहुभिर्भोगिफणामणीदिनेशैः । उपरिस्थितियोग्यतां दधानं किमिवाधोभुवनं बुधास्तदाहुः ॥५४॥ सुन्दरीयों के मुखरूपी अनेक चन्द्रों से और सर्पों के फणों पर स्थित मणिरूपी अनेक सूर्यों से शोभित नागलोक के सब लोकों से ऊपर होने पर भी, विद्वान् जाने क्यों उसे नीचे का लोक कहते हैं ! ॥५४॥ स ददर्श दुरासदं समन्तात् किरणैस्तत्र शशाङ्ककोटिकल्पैः । हिमशैलमिव द्वितीयमुर्वीतलमाविश्य पुरो विरोचमानम् ॥५५॥ परितः खचिते प्रवालमुक्तामणिमाणिक्यमहेन्द्रनीलहारैः । स्थितमुज्ज्वलशातकुम्भपट्टे मृदुपट्टाम्बरसंस्तराभिरामे ॥५६॥ प्रगुणीकृतकान्तिमुन्मयूखैर्मणिभिः स्फारफणोपरि स्फुरद्भिः । जगतः प्रलयं विधातुमग्रे निजदेहे निहितैरिवांशुमद्भिः ॥५७॥ मुखमुज्वलमेककुण्डलेन श्रमदालोहितलोचनं दधानम् । अलिभिः कलिभिन्नसाहचर्यैः परिवेषायितमास्थितैः परीतम् ॥५८॥ स्फटिकाभवपुःप्रभापरीतं वसने नीलिमधामनी दधानम् । नवनीलसरोजकाननाभ्यामिव गीर्वाणतरङ्गिणीप्रवाहम् ॥५९॥ अवलोक्य तमद्भुताभिरामं स भृशं संभ्रमसंभृतः सभायाम् । प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः फणीन्द्रं विनिबद्धाञ्जलि दूरतोऽवतस्थे ॥६०॥ राजा अजयपाल ने अपने सामने ही स्थित सर्पों के राजराजेश्वर शेषनाग को देखा। वे करोड़ों चन्द्रमाओं की किरणों के समान प्रकाश की किरणों से जगमगा रहे थे और धरातल को फोड़ कर पाताल लोक में प्रकट द्वितीय हिमालय के समान शोभित हो रहे थे। वे कोमल रेशमी वस्त्रों की चादरों से सज्जित और चारों ओर मूंगे, मोती, हीरे, माणिक और नीलम के हारों से जड़े हुए देदीप्यमान सुवर्ण-सिंहासन पर विराजमान थे। अपने फैले हुए फणों पर जगमगाने (५७) प्रलये द्वादशादित्या आविर्भवन्तीत्यागमः । (५८) कलिना कलियुगेन भिन्नं विरहितं साहचर्यं सम्बन्धो येषां तैः। परिवेषायितमास्थितैः परिवेषं मंडलं प्राप्तैः ।