सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ नवमः सर्गः ८९ वाले मणियों की किरणों के कारण उनका तेज कई गुना बढ़ गया था—वे मणि क्या थे मानों विश्व का भावी प्रलय करने के लिये उन्होंने अपने शरीर में सूर्य रख रक्खे थे (प्रलय के समय द्वादश आदित्य उदित होते हैं) । वे एक कुंडल लगा कर (कुंडलाकार होकर) विराजमान थे और उनका मुख घूमते हुए लाल नेत्रों से शोभित था। (उनके मुख के सौरभ से आकृष्ट) कलि- युग से कोई सम्पर्क न रखनेवाले भ्रमर उनके चारों ओर परिधि बना कर स्थित थे। शुभ्र संगमरमर के समान कान्तिवाले शरीर पर दो नीले वस्त्र पहने हुए वे ऐसे शोभित हो रहे थे मानों दोनों तटों पर विकसित नीलकमलों के उपवनों के बीच गंगा जी का शुभ्र प्रवाह हो। राजा अजयपाल उन अद्भुत सौन्दर्यवाले शेषनाग को सभा में विराजमान देखकर अत्यन्त चकित हो गये और बार बार उनको प्रणाम करके, हाथ जोड़, दूर खड़े हो गये ॥५५-६०॥ अथ तं करुणाञ्चितेन किञ्चिन्नृपमालोक्य दृगञ्चलेन देवः । समचारयदीषदन्तिकस्थे भ्रुवमेकां भुजगे सुदामनाम्नि ॥६१॥ भगवान् शेषनाग ने करुणा-युक्त दृष्टि से थोड़ी देर राजा को देखा और फिर समीपस्थ सुदामा नामक सर्प पर थोड़ी दृष्टि डाली ॥६१॥ स तथेति तदिङ्गितं तदानीमभिनन्द्य द्रुतमेव काद्रवेयः । निजमालयमानयन् मनीषी बहुमानेन मनुष्यदेवमेतम् ॥६२॥ वह बुद्धिमान् नराकार सर्प सुदामा, 'जो आज्ञा' कहकर शेषनाग के संकेत का अभिनन्दन कर, राजा अजयपाल को अत्यन्त सम्मानपूर्वक अपने घर ले गया ॥६२॥ अतिथेः क्षितिलोकवासिनोऽस्य प्रभुणेव प्रथमं समर्थितस्य । उचितं रचयाञ्चकार यत्नान्नरनाथस्य समर्हणं सुदामा ॥६३॥ शेषनाग द्वारा पहले ही समर्थन किये हुए इन मर्त्यलोकवासी अतिथि राजा का सुदामा ने यत्नपूर्वक समुचित सत्कार किया ॥ ६३॥ अवतीर्णममुं कुतोऽपि लोकादपरं मन्मथमेव मन्यमानाः । परिवव्रुरवारिताभियेगा नगरस्था वरवर्णिनीसमूहाः ॥६४॥ किसी दूसरे लोक से आये हुए इन अतिथि को दूसरा कामदेव समझकर नगर की सुन्द- रियों के समूहों ने इन्हें घेर लिया ॥६४॥ विजया निजया ह्रिया निरुद्धा निजसौधस्य निषेव्य चन्द्रशालाम् । नयने विततीकृते कृशाङ्गी बत वातायनवर्त्मनि न्यधत्त ॥६५॥ कृशांगी विजया अपनी स्वाभाविक लज्जा के कारण सम्मुख नहीं आकर अपने महल की चन्द्रशाला (ऊपरी भाग) में चली गई और वहाँ खिड़की की जालियों में अपने फैलाये हुए नेत्र रख कर राजा को देखने लगी ॥६५॥ उपलभ्य च दर्शनं तदानीं तदसंभाव्यतरं मनुष्यभर्तुः । समरोपयदात्मजीविताशालतिकामुच्छ्वसिते पुनः स्वचित्ते ॥६६॥ फिर राजा अजयपाल का अत्यन्त दुर्लभ दर्शन प्राप्त करके विजया ने आनन्द की गहरी साँस ली और मुरझाई हुई जीवन की आशा-लता का अपने प्रसन्न चित्त में आरोपण किया ॥६६॥ (६२)काद्रवेयः नराकृतिसर्पः ।