सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अपनीतपरिश्रमं कदाचित् प्रणयेन प्रवणीकृतं फणी सः। तमनुक्रमविकलमादपृच्छत् कुलनामाश्रयदेशकाङ्क्षितानि ॥६७॥ राजा की थकावट दूर हो जाने के बाद स्नेह से उन्हें आश्वस्त करके सुदामा ने, क्रम का ध्यान न रखकर, राजा से उनके कुल, नाम, आश्रय, देश और इच्छा के विषय में प्रश्न किये ॥६७॥ मिलितः पृथिवीपतिं पृथिव्यां कृपया यः समशिक्षयद् विधेयम्। भुवनानि परिभ्रमन् स सिद्धः पुरुषः प्रादुरभूत् तयोः पुरस्तात् ॥६८॥ वे सिद्ध पुरुष, जो राजा को पृथ्वी पर मिले थे और जिन्होंने राजा को इच्छा-पूर्ति का साधन बतलाया था, लोकों में घूमते-फिरते, उन दोनों के सामने आ खड़े हुए ॥६८॥ अथ संभ्रमतः समुच्छिताभ्यां कृतपादग्रहणस्तदा स ताभ्याम्। उपविश्य विशेषवित् सुदाम्ने नृपतेः कृत्स्नममुदाजहार वार्ताम् ॥६९॥ तब उन दोनों ने जल्दी-जल्दी उठकर उन सिद्ध पुरुष को पैर छूकर प्रणाम किया। फिर बैठ कर, सब कुछ जानने वाले उन सिद्ध पुरुष ने सुदामा को राजा का सारा हाल सुनाया ॥६९॥ अथ भगवदनुग्रहेण साक्षान्निरुपमरूपनिरूपणेन चास्य। गुणसमुदयमाकलय्य तस्मान् नरपतये तनयां ददौ सुदामा ॥७०॥ इसके बाद भगवान् के अनुग्रह से, राजा अजयपाल का अनुपम रूप देखकर और उनके गुण- समूहों का विचार करके, सुदामा ने राजा को अपनी कन्या दे दी ॥७०॥ स्मरस्य स्वारस्यात् समुचितसमारम्भकृतिनः समानेन प्रेम्णा मिलितमनयोर्यौवनजुषोः। विधित्सुः स्तम्भादिव्यवसितविशेषेण घटयन्- नुदारं दाम्पत्यं समगत समग्रेण यशसा ॥७१॥ समुचित जोड़ी मिलाने में कुशल कामदेव के स्वारस्य के कारण परस्पर समान प्रेम रखने- वाले इन युवक-युवती का मेल कराने के इच्छुक सुदामा ने, विवाह-मण्डप आदि विशिष्ट सामग्री द्वारा इन दोनों का उदार दाम्पत्य रचकर, सम्पूर्ण यश प्राप्त किया ॥७१॥ अथाभिवाद्य क्षितिपः स मान्यान् सुदामपुत्र्यां समुदा समेतः। प्रसेदुषः पन्नगलोकभर्तुर्निदेशतः स्वां नगरीं जगाम ॥७२॥ फिर उन राजा अजयपाल ने, प्रसन्न सुदामा-पुत्री विजया के साथ, मान्य लोगों का अभि- वादन किया और प्रसन्न होनेवाले नागलोक के राजराजेश्वर शेषनाग की आज्ञा लेकर वे स्त्री सहित अपनी नगरी को लौट आये ॥७२॥ भुक्त्वाऽवनिञ्चिरमवञ्चितयाचकोऽयं यास्यन् वनान्तपदवीमथ यौवनान्ते। आसञ्जयद् विजयिनों क्षितिपाललक्ष्मीं पुत्रे गुणोदयगरीयसि गङ्गदेवे ॥७३॥ याचकों को कभी विमुख न करने वाले राजा अजयपाल ने चिरकाल तक साम्राज्य का उप- भोग करके, वार्धक्य में वानप्रस्थ आश्रम को ग्रहण करने की इच्छा से, विजयशील साम्राज्य की लक्ष्मी को गुणों के उदय से श्रेष्ठ अपने पुत्र गङ्गदेव को सौंप दिया ॥७३॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये नवमः सर्गः। (७१) स्तम्भादिव्यवसितविशेषेण विवाहमण्डपादिसामग्रीविशेषेण। समगत संगतोऽभूत्।