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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

नवमः सर्गः ८७ स्वमनीषितसाधनाय यत्नादवनीश प्रवणीकृतात्मचेताः । भगवन्तममन्तरायसिद्धिं तमनन्तं त्वमनन्तरं भजेथाः ॥४५॥ राजन् ! अपने मन को सुदृढ़ करके, अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये, आप अब शीघ्र ही प्रयत्न- पूर्वक, निर्विघ्न सिद्धि देने वाले अनन्त भगवान् की उपासना करें ॥४५॥ कतिभिर्दिवसैर्जगन्निवासे वरिवस्याविधिना तव प्रसन्ने । भुवनत्रयमप्यधीनमेतत् किमु पातालतलस्थितैकनारी ॥४६॥ कुछ दिनों में ही आपकी सेवाविधि से जगन्निवास परमेश्वर के प्रसन्न हो जाने पर, तीनों लोक आपके अधीन हो सकते हैं फिर पाताल लोक में रहने वाली एक स्त्री की तो बात ही क्या ? ॥४६॥ गिरमित्थमुदीर्य सोपदेशां स दिशं स्वाभिमतां जगाम सिद्धः । परमेशमुपास्य पार्थिवोऽपि प्रमनाः प्रार्थितलाभतो बभूव ॥४७॥ इस प्रकार उपदेशयुक्त वचन कहकर वे सिद्ध पुरुष अपनी वांछित दिशा की ओर चले गये । राजा अजयपाल भी परमेश्वर की उपासना करके वांछित लाभ हो जाने से प्रसन्न हो गये ॥४७॥ अथ यस्य जलाशयस्य तीरे तरुणीं तां नयनातिथीचकार । परवानिव निममज्ज दूरं विहरन्नम्भसि तस्य भूमिपालः ॥४८॥ फिर उसी सरोवर के तीर पर जाकर, जहाँ उन्होंने उस तरुणी को देखा था और विवश से हो गये थे, राजा अजयपाल पानी में डुबकी लगाकर दूर तक घुस गये ॥४८॥ क्षणतः पृथुपन्नगोत्तमाङ्गोल्लसदुत्तुङ्गमणीमयूखजालैः । अपहस्तितपीवरान्धकारं फणिलोकं स विलोकयाञ्चकार ॥४९॥ क्षण भर बाद ही उन्होंने, बड़े-बड़े सर्पों के मस्तकों में चमकने वाली विशाल मणियों के किरण-समूह से अन्धकार को दूर करनेवाले, नागलोक को देखा ॥४९॥ वदनैर्मदनैकतानिदानैर्विलसत्पन्नगनारीजनानाम् । इतरेतरविस्मयाज्जगत्यां शशिनैकेन कृतार्थतां प्रपन्ने ॥५०॥ रजनीशदिनेशयोरयोगाद्विनिर्धारितवासरत्रियामे । अनिशं सरसीरुहं सहासं मुदिता यत्र निरन्तरं रथाङ्गाः ॥५१॥ उज्ज्वल सर्प-युवतियों के कामदेव को अत्यन्त जाग्रत् करने वाले अनेक चन्द्रमुखों से कृतार्थ नागलोक मानों एक ही चन्द्रमा से कृतार्थ हो जाने वाले मर्त्यलोक की हँसी कर रहा हो । चन्द्रमा और सूर्य के न होने के कारण नागलोक में दिन और रात का पता ही नहीं चलता था। अतः वहाँ कमल सदैव खिले रहते थे और चकवा चकवी सदैव साथ-साथ रहने के कारण प्रसन्न रहते थे ॥५०-५१॥ (५०-५१) जगत्यां मर्त्यलोके एकेनैव शशिना प्रकाशितायां सत्यामितरेतरविस्मयात् विलसन्तीनां पन्नग- नागरीजनानां मदनैकतानिदानैश्चन्द्रोपमैरनेकवदनैश्चन्द्राभावेऽपि कृतार्थतां प्रपन्ने नागलोके चन्द्रसूर्ययोरयोगा- द्विनिर्धारितरात्रिदिवसविभागे कमलानि निरन्तरं विकसन्ति चक्रवाकमिथुनानि च वियोगाभावे निरन्तरं प्रसन्नानि सन्तीत्यर्थः।

८८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इतरत्र यदर्जितं तपोभिः सुकृतं विस्मृतकैतवप्रपञ्चैः । फलमस्य महार्हमश्नुवानाश्चिरकालं निवसन्ति यत्र जीवाः ॥५२॥ अन्य लोकों में निश्छल तपस्या के द्वारा जो पुण्य प्राप्त किया था उसका महान् फल भोगने के लिए जीव चिरकाल तक नागलोक में निवास करते थे ॥५२॥ न जराकृतवैकृतप्रसङ्गो न च विच्छेदविभीषिकावकाशः । मिथुनस्य मिथोऽनुरागबन्धो नितरां यत्र निरामयश्चकास्ति ॥५३॥ न वहाँ वृद्धावस्था के कारण शरीर में विकृति होती थी और न वियोग के भीषण दुःख का अवकाश था। वहाँ दम्पति स्वस्थ परस्पर प्रेमानुराग से युक्त रहते थे ॥५३॥ वनिताऽऽस्यनिशाकरैरसङ्ख्यैर्बहुभिर्भोगिफणामणीदिनेशैः । उपरिस्थितियोग्यतां दधानं किमिवाधोभुवनं बुधास्तदाहुः ॥५४॥ सुन्दरीयों के मुखरूपी अनेक चन्द्रों से और सर्पों के फणों पर स्थित मणिरूपी अनेक सूर्यों से शोभित नागलोक के सब लोकों से ऊपर होने पर भी, विद्वान् जाने क्यों उसे नीचे का लोक कहते हैं ! ॥५४॥ स ददर्श दुरासदं समन्तात् किरणैस्तत्र शशाङ्ककोटिकल्पैः । हिमशैलमिव द्वितीयमुर्वीतलमाविश्य पुरो विरोचमानम् ॥५५॥ परितः खचिते प्रवालमुक्तामणिमाणिक्यमहेन्द्रनीलहारैः । स्थितमुज्ज्वलशातकुम्भपट्टे मृदुपट्टाम्बरसंस्तराभिरामे ॥५६॥ प्रगुणीकृतकान्तिमुन्मयूखैर्मणिभिः स्फारफणोपरि स्फुरद्भिः । जगतः प्रलयं विधातुमग्रे निजदेहे निहितैरिवांशुमद्भिः ॥५७॥ मुखमुज्वलमेककुण्डलेन श्रमदालोहितलोचनं दधानम् । अलिभिः कलिभिन्नसाहचर्यैः परिवेषायितमास्थितैः परीतम् ॥५८॥ स्फटिकाभवपुःप्रभापरीतं वसने नीलिमधामनी दधानम् । नवनीलसरोजकाननाभ्यामिव गीर्वाणतरङ्गिणीप्रवाहम् ॥५९॥ अवलोक्य तमद्भुताभिरामं स भृशं संभ्रमसंभृतः सभायाम् । प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः फणीन्द्रं विनिबद्धाञ्जलि दूरतोऽवतस्थे ॥६०॥ राजा अजयपाल ने अपने सामने ही स्थित सर्पों के राजराजेश्वर शेषनाग को देखा। वे करोड़ों चन्द्रमाओं की किरणों के समान प्रकाश की किरणों से जगमगा रहे थे और धरातल को फोड़ कर पाताल लोक में प्रकट द्वितीय हिमालय के समान शोभित हो रहे थे। वे कोमल रेशमी वस्त्रों की चादरों से सज्जित और चारों ओर मूंगे, मोती, हीरे, माणिक और नीलम के हारों से जड़े हुए देदीप्यमान सुवर्ण-सिंहासन पर विराजमान थे। अपने फैले हुए फणों पर जगमगाने (५७) प्रलये द्वादशादित्या आविर्भवन्तीत्यागमः । (५८) कलिना कलियुगेन भिन्नं विरहितं साहचर्यं सम्बन्धो येषां तैः। परिवेषायितमास्थितैः परिवेषं मंडलं प्राप्तैः ।

१२ नवमः सर्गः ८९ वाले मणियों की किरणों के कारण उनका तेज कई गुना बढ़ गया था—वे मणि क्या थे मानों विश्व का भावी प्रलय करने के लिये उन्होंने अपने शरीर में सूर्य रख रक्खे थे (प्रलय के समय द्वादश आदित्य उदित होते हैं) । वे एक कुंडल लगा कर (कुंडलाकार होकर) विराजमान थे और उनका मुख घूमते हुए लाल नेत्रों से शोभित था। (उनके मुख के सौरभ से आकृष्ट) कलि- युग से कोई सम्पर्क न रखनेवाले भ्रमर उनके चारों ओर परिधि बना कर स्थित थे। शुभ्र संगमरमर के समान कान्तिवाले शरीर पर दो नीले वस्त्र पहने हुए वे ऐसे शोभित हो रहे थे मानों दोनों तटों पर विकसित नीलकमलों के उपवनों के बीच गंगा जी का शुभ्र प्रवाह हो। राजा अजयपाल उन अद्भुत सौन्दर्यवाले शेषनाग को सभा में विराजमान देखकर अत्यन्त चकित हो गये और बार बार उनको प्रणाम करके, हाथ जोड़, दूर खड़े हो गये ॥५५-६०॥ अथ तं करुणाञ्चितेन किञ्चिन्नृपमालोक्य दृगञ्चलेन देवः । समचारयदीषदन्तिकस्थे भ्रुवमेकां भुजगे सुदामनाम्नि ॥६१॥ भगवान् शेषनाग ने करुणा-युक्त दृष्टि से थोड़ी देर राजा को देखा और फिर समीपस्थ सुदामा नामक सर्प पर थोड़ी दृष्टि डाली ॥६१॥ स तथेति तदिङ्गितं तदानीमभिनन्द्य द्रुतमेव काद्रवेयः । निजमालयमानयन् मनीषी बहुमानेन मनुष्यदेवमेतम् ॥६२॥ वह बुद्धिमान् नराकार सर्प सुदामा, 'जो आज्ञा' कहकर शेषनाग के संकेत का अभिनन्दन कर, राजा अजयपाल को अत्यन्त सम्मानपूर्वक अपने घर ले गया ॥६२॥ अतिथेः क्षितिलोकवासिनोऽस्य प्रभुणेव प्रथमं समर्थितस्य । उचितं रचयाञ्चकार यत्नान्नरनाथस्य समर्हणं सुदामा ॥६३॥ शेषनाग द्वारा पहले ही समर्थन किये हुए इन मर्त्यलोकवासी अतिथि राजा का सुदामा ने यत्नपूर्वक समुचित सत्कार किया ॥ ६३॥ अवतीर्णममुं कुतोऽपि लोकादपरं मन्मथमेव मन्यमानाः । परिवव्रुरवारिताभियेगा नगरस्था वरवर्णिनीसमूहाः ॥६४॥ किसी दूसरे लोक से आये हुए इन अतिथि को दूसरा कामदेव समझकर नगर की सुन्द- रियों के समूहों ने इन्हें घेर लिया ॥६४॥ विजया निजया ह्रिया निरुद्धा निजसौधस्य निषेव्य चन्द्रशालाम् । नयने विततीकृते कृशाङ्गी बत वातायनवर्त्मनि न्यधत्त ॥६५॥ कृशांगी विजया अपनी स्वाभाविक लज्जा के कारण सम्मुख नहीं आकर अपने महल की चन्द्रशाला (ऊपरी भाग) में चली गई और वहाँ खिड़की की जालियों में अपने फैलाये हुए नेत्र रख कर राजा को देखने लगी ॥६५॥ उपलभ्य च दर्शनं तदानीं तदसंभाव्यतरं मनुष्यभर्तुः । समरोपयदात्मजीविताशालतिकामुच्छ्वसिते पुनः स्वचित्ते ॥६६॥ फिर राजा अजयपाल का अत्यन्त दुर्लभ दर्शन प्राप्त करके विजया ने आनन्द की गहरी साँस ली और मुरझाई हुई जीवन की आशा-लता का अपने प्रसन्न चित्त में आरोपण किया ॥६६॥ (६२)काद्रवेयः नराकृतिसर्पः ।

९० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अपनीतपरिश्रमं कदाचित् प्रणयेन प्रवणीकृतं फणी सः। तमनुक्रमविकलमादपृच्छत् कुलनामाश्रयदेशकाङ्क्षितानि ॥६७॥ राजा की थकावट दूर हो जाने के बाद स्नेह से उन्हें आश्वस्त करके सुदामा ने, क्रम का ध्यान न रखकर, राजा से उनके कुल, नाम, आश्रय, देश और इच्छा के विषय में प्रश्न किये ॥६७॥ मिलितः पृथिवीपतिं पृथिव्यां कृपया यः समशिक्षयद् विधेयम्। भुवनानि परिभ्रमन् स सिद्धः पुरुषः प्रादुरभूत् तयोः पुरस्तात् ॥६८॥ वे सिद्ध पुरुष, जो राजा को पृथ्वी पर मिले थे और जिन्होंने राजा को इच्छा-पूर्ति का साधन बतलाया था, लोकों में घूमते-फिरते, उन दोनों के सामने आ खड़े हुए ॥६८॥ अथ संभ्रमतः समुच्छिताभ्यां कृतपादग्रहणस्तदा स ताभ्याम्। उपविश्य विशेषवित् सुदाम्ने नृपतेः कृत्स्नममुदाजहार वार्ताम् ॥६९॥ तब उन दोनों ने जल्दी-जल्दी उठकर उन सिद्ध पुरुष को पैर छूकर प्रणाम किया। फिर बैठ कर, सब कुछ जानने वाले उन सिद्ध पुरुष ने सुदामा को राजा का सारा हाल सुनाया ॥६९॥ अथ भगवदनुग्रहेण साक्षान्निरुपमरूपनिरूपणेन चास्य। गुणसमुदयमाकलय्य तस्मान् नरपतये तनयां ददौ सुदामा ॥७०॥ इसके बाद भगवान् के अनुग्रह से, राजा अजयपाल का अनुपम रूप देखकर और उनके गुण- समूहों का विचार करके, सुदामा ने राजा को अपनी कन्या दे दी ॥७०॥ स्मरस्य स्वारस्यात् समुचितसमारम्भकृतिनः समानेन प्रेम्णा मिलितमनयोर्यौवनजुषोः। विधित्सुः स्तम्भादिव्यवसितविशेषेण घटयन्- नुदारं दाम्पत्यं समगत समग्रेण यशसा ॥७१॥ समुचित जोड़ी मिलाने में कुशल कामदेव के स्वारस्य के कारण परस्पर समान प्रेम रखने- वाले इन युवक-युवती का मेल कराने के इच्छुक सुदामा ने, विवाह-मण्डप आदि विशिष्ट सामग्री द्वारा इन दोनों का उदार दाम्पत्य रचकर, सम्पूर्ण यश प्राप्त किया ॥७१॥ अथाभिवाद्य क्षितिपः स मान्यान् सुदामपुत्र्यां समुदा समेतः। प्रसेदुषः पन्नगलोकभर्तुर्निदेशतः स्वां नगरीं जगाम ॥७२॥ फिर उन राजा अजयपाल ने, प्रसन्न सुदामा-पुत्री विजया के साथ, मान्य लोगों का अभि- वादन किया और प्रसन्न होनेवाले नागलोक के राजराजेश्वर शेषनाग की आज्ञा लेकर वे स्त्री सहित अपनी नगरी को लौट आये ॥७२॥ भुक्त्वाऽवनिञ्चिरमवञ्चितयाचकोऽयं यास्यन् वनान्तपदवीमथ यौवनान्ते। आसञ्जयद् विजयिनों क्षितिपाललक्ष्मीं पुत्रे गुणोदयगरीयसि गङ्गदेवे ॥७३॥ याचकों को कभी विमुख न करने वाले राजा अजयपाल ने चिरकाल तक साम्राज्य का उप- भोग करके, वार्धक्य में वानप्रस्थ आश्रम को ग्रहण करने की इच्छा से, विजयशील साम्राज्य की लक्ष्मी को गुणों के उदय से श्रेष्ठ अपने पुत्र गङ्गदेव को सौंप दिया ॥७३॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये नवमः सर्गः। (७१) स्तम्भादिव्यवसितविशेषेण विवाहमण्डपादिसामग्रीविशेषेण। समगत संगतोऽभूत्।

दशमः सर्गः जज्ञे नृदेवादथ गङ्गदेवात् सोमेश्वरो नाम समः स्मरेण । राज्यं गुणप्राज्यमनुक्रमज्ञः क्रमागतं यः सुमुखः शशास ॥ १ ॥ राजा गङ्गदेव के कामदेव के समान सुन्दर सोमेश्वर नामक पुत्र उत्पन्न हुए जिन्होंने क्रमा- नुसार कुलपरम्परागत समृद्ध राज्य का शासन किया ॥ १ ॥ प्रलम्बबाहुः परिणाहिवक्षाः प्रलम्बवैरिप्रतिमल्लमूर्तिः । विहारभूमिर्विजयस्य भूमाविहाऽरविन्दप्रभवेन सृष्टः ॥ २ ॥ सोमेश्वर आजानुबाहु, चौड़े वक्षःस्थल वाले, बलदेव के समान वीर थे। उनको ब्रह्मा जी ने मानों पृथ्वी पर विजय की विहार-भूमि के रूप में निर्मित किया था ॥ २ ॥ स्वभावरम्येण मनोजमैत्रीं स्वभाबलेनाऽविरतं दधानम् । विभावयन्ति स्म निभालयन्त्यो विभावरीकान्तममुं सुमध्याः ॥ ३ ॥ स्वभाव से ही सुन्दर अपनी आभा के कारण निरन्तर कामदेव से मित्रता रखनेवाले राजा सोमेश्वर को दखकर रमणियाँ उन्हें चन्द्रमा (सोम) ही समझती थीं ॥ ३ ॥ ० शकुन्तलाऽऽभां गुणरूपशीलैः स कुन्तलानामधिपस्य पुत्रीम् । कर्पूरधारां जनलोचनानां कर्पूरदेवीमुदुवाह विद्वान् ॥ ४ ॥ विद्वान् सोमेश्वर ने कुन्तल देश के राजा की कन्या कर्पूरदेवी का, जो गुण, रूप और शील में शकुन्तला के समान थी और लोगों के नेत्रों को कपूर की धारा के समान आनन्द देती थी, पाणिग्रहण किया ॥ ४ ॥ लावण्यपूर्णामृतपुण्यवेणी मनोभुवो मूर्तिमती प्रशस्तिः । आसीत् कलानामधिदेवता सा विनोदभ

१२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् असूयताऽसौ सुतनुस्तनूजौ जयप्रभावाविव विक्रमार्द्धिः । नृपस्तयोः पूर्वजमाह पृथ्वीराजं स माणिक्यमथानुजातम् ॥ ७ ॥ जैसे पराक्रमशक्ति विजय और प्रभाव को उत्पन्न करती है वैसे ही सुन्दरी कर्पूरदेवी ने दो पुत्रों को जन्म दिया जिनमें बड़े का नाम, राजा सोमेश्वर ने, पृथ्वीराज और छोटे का नाम माणिक्यराज रक्खा ॥ ७ ॥ गुणैर्महाघ्यैर्महसा यशोभिरन्योन्यसाधर्म्यमुभौ दधानौ । सौभ्रात्रसम्पादितशुद्धचित्तावैवयं दधाते स्म यथाश्विनेयौ ॥ ८ ॥ पृथ्वीराज और माणिक्यराज दोनों भाई बहुमूल्य गुणों में, तेज में और यश में एक दूसरे के समान थे और दोनों, भ्रातृप्रेम से विशुद्ध अन्तःकरण वाले होने के कारण, अश्विनीकुमारों की भाँति, एक से लगते थे ॥ ८ ॥ विभज्य राज्यं भुजवीर्यभाजौ पित्रा प्रणीतं प्रतिपालयन्तौ । निशाकरार्काविव न स्वकीयमतीयुतुस्तौ समयं कथञ्चित् ॥ ९ ॥ श्रेष्ठ बाहुबल वाले उन दोनों भाइयों ने पिता के दिये हुए राज्य को आपस में बाँट कर शासन किया और सूर्य तथा चन्द्र के समान कभी एक दूसरे के समय का उल्लंघन नहीं किया ॥ ९ ॥ पित्रार्पितायामवितृप्तचेताः सम्प्रद्य प्राप्तगुणप्रकर्षः । ज्यायांस्तयोः सन्ततमात्मतेजःसमृद्धिसाध्यां विभुतामियेष ॥१०॥ बड़े भाई पृथ्वीराज ने, अपने गुणप्रकर्ष के कारण, पिता के दिये हुए साम्राज्य से सन्तुष्ट न होकर, अपने स्वयं के पराक्रम से अधिक साम्राज्य प्राप्त किया ॥१०॥ पुरो बहिः क्वापि विहारभूमौ वसन्तमेनं प्रतिहारपत्नी । समागतां काञ्चन कान्यकुब्जात् प्रावेदयत् पार्श्वचरीं प्रगल्भाम् ॥११॥ एक दिन जब पृथ्वीराज अपने नगर के बाहर उद्यानभूमि में विहार कर रहे थे तब प्रतिहारी ने निवेदन किया कि कान्यकुब्ज (कन्नौज) देश से आई हुई एक चतुर महिला मिलना चाहती है ॥११॥ तदिङ्गितेनाधिगतप्रवेशा विधाय शश्वन् नृपतौ प्रणामम् । पृष्टा समाचष्ट समाहिताऽसौ हितार्थिनी भर्तुरथात्मजायाः ॥१२॥ राजा के संकेत से अनुमति पाकर प्रतिहारी ने उस महिला को भीतर प्रविष्ट किया । उसने राजा को प्रणाम करके, पूछे जाने पर, सावधानी से, अपने स्वामी की पुत्री के हित के लिये इस प्रकार निवेदन किया ॥१२॥ यमश्ववारा नवलक्षसङ्ख्याः सङ्ख्यास्वसङ्ख्येयगुणं भजन्ते । कन्या ततोऽजायत कान्यकुब्जक्षितीश्वरात् कान्तिमतीति नाम्ना ॥१३॥ जिनकी संख्या की कोई गणना नहीं ऐसे गुणों से युक्त और नौ लाख घुड़सवारों की सेना के स्वामी कान्यकुब्ज देश के राजा की कान्तिमती नामक कन्या है ॥१३॥

दशमः सर्गः ९३ सुवर्णशैलात् पृथिवीविभागं पयांसि पीयूषपयोधिमध्यात् । तेजः शरच्छीतमरीचिबिम्बाच्छ्रीखण्डशैलानिलतस्तदंशम् ॥१४॥ आकाशमाकृष्य पुनः स्वकीयतूणीररन्ध्रान् निजनैपुणेन । विनिर्ममे काचन सृष्टिरन्या मन्ये मनोजेन मनोहरा सा ॥१५॥ उस कान्तिमती को मानों कामदेव ने, स्वर्णमय सुमेरु पर्वत से पृथ्वी का भाग लेकर, अमृत- समुद्र से जल का भाग लेकर, शरद् ऋतु के पूर्ण चन्द्रबिम्ब से तेज का अंश लेकर, (चन्दनों से सुशोभित) मलयगिरि के पवन से वायु का अंश लेकर और अपने तरकस के भीतर से आकाश का अंश निकालकर इन अपूर्व पंच महाभूतों से, अपनी निपुणता को सिद्ध करने के लिए एक अद्वि- तीय सुन्दरी के रूप में रचा है ॥१४-१५॥ निर्माय तां मन्मथजैत्रसिद्धिमाकृष्टसारा विधिना पदार्थाः । ये न्यक्कृताः किन्नु त एव जाताः सुधासुधांशूत्पलपङ्कजाद्याः ॥१६॥ अथवा, स्वयं ब्रह्मा ने कामदेव की विजयसिद्धि के रूप में उसका निर्माण विविध पदार्थों का सार निकाल कर किया और जिन-जिन पदार्थों का सार निकाल कर उन्हें फेंक दिया शायद वे पदार्थ ही लोक में अमृत, चन्द्रमा, कुमुद, कमल इत्यादि नामों से प्रसिद्ध हुये !।१६॥ सुधामयः कोपि भवेत् पयोधिर्मथ्नाति तञ्चेत् स्वयमेव कामः । जायेत चेत् काचन तत्र लक्ष्मीः समानतामृच्छति सैव तस्याः ॥१७॥ यदि कोई अमृत का समुद्र हो और यदि स्वयं कामदेव उसका मन्थन करे और फिर उसमें से कोई लक्ष्मी प्रकट हो तो वह लक्ष्मी ही कान्तिमती की कुछ समानता कर सकती है ॥१७॥ एकैककर्मण्युचिते समर्थाः संमोहना ये मदनस्य बाणाः । इयन्तु तस्य स्फुटयत्यजस्रं कर्माद्भुतं मार्गणपञ्चकस्य ॥१८॥ कामदेव के पाँचों बाण अलग-अलग अपने एक-एक संमोहन कर्म में ही समर्थ हैं, किन्तु यह कान्तिमती तो कामदेव के पाँचों बाणों की एक साथ पाँचों संमोहन कर्मों में निपुण अद्भुत- शक्ति है ॥१८॥ अभ्याशमभ्यासवशाद् गतायाः पितुः कदाचित् तनुमध्यमायाः । कर्णान्तरस्या विविशुस्त्वदीया गुणोच्चयाश्चारणगीयमानाः ॥१९॥ अभ्यासवश एक दिन जब कान्तिमती अपने पिता के पास बैठी हुई थी तब चारणों द्वारा गाए गए आपके गुणसमूहों ने इसके कानों में प्रवेश किया ॥१९॥ सा वर्तमाना तरुणिम्नि नव्ये कामेव धत्तेऽङ्कुरितामवस्थाम् । येते निगूढान्यपि मानसानि निगूहितुं सन्ततमीहितानि ॥२०॥ कान्तिमती नई तरुणावस्था (नवयौवन) में स्थित होकर एक अद्वितीय (कामदेव द्वारा) अंकुरित अवस्था को धारण कर रही है। वह (लज्जावश) मन में छिपी हुई इच्छाओं को भी बार बार छिपाने का यत्न करती है ॥२०॥

९४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् निजेन्द्रियेभ्योऽपि निगूह्यमानं गाहेत कोऽन्तःकरणं कुमार्याः । अनन्यजन्माऽयमनन्यवृत्तिरुपायतौ यन् मतिमानुपास्ते ॥२१॥ स्वयं अपनी ही इन्द्रियों से भी छिपाये हुए (भावों वाले) कुमारी के अन्तःकरण को कौन जान सकता है ? स्वयं आत्मभू बुद्धिमान् कामदेव, शरीर-रहित होने पर भी, अन्य सब कार्य छोड़ कर बड़े यत्नपूर्वक, कुमारी के अन्तःकरण में प्रवेश पाने के लिये, उपासना किया करता है ॥२१॥ कलाविलासेऽप्यलसं कृशाङ्ग्याः ससञ्ज नालञ्जनरञ्जनाय । क्रीडाविनोदेषु विनोदितायाः सखीसमाजे न ससज्ज चेतः ॥२२॥ कृशांगी कान्तिमती का चित्त, कलाविलास में भी आलस धारण करके, लोगों को प्रसन्न न कर सका और सखीसमाज में भी, क्रीडा और विनोद से सखियों द्वारा कान्तिमती को प्रसन्न करने का प्रयत्न करने पर भी, इसका चित्त प्रसन्न न हो सका ॥२२॥ दिने दिने दूनधियो नताङ्ग्याः प्रपद्यमानं परिपाण्डिमानम् । सुवर्णपङ्केरुहकान्तिवक्त्रं बभूव दुर्वर्णसरोजवर्णम् ॥२३॥ (विरह में) दुः‌खित मन वाली कृशांगी का दिन-दिन पीला पड़ने वाला मुख, जो पहले खिले हुए स्वर्ण-कमल के समान था, अब मुरझाये हुये पीले कमल के समान हो गया है ॥२३॥ प्रतिक्षणं क्षामतरीभवन्त्या भवत्कृते पाण्डरदीर्घमस्याः । चकर्ष कृष्णप्रतिपन्मृगाङ्कबिम्बस्य कान्तिं मुखमुत्पलाक्ष्याः ॥२४॥ आपके विरह में प्रतिक्षण दुबली होने वाली कमलनयनी कान्तिमती का पीला और लटका हुआ मुख, कृष्णपक्ष की प्रतिपदा के (दिन-दिन ह्रास होने वाले) चन्द्रबिम्ब के समान लग रहा है ॥२४॥ जानौ कफोणि शिथिले कपोलं कराम्बुजन्मन्थ नासिकायाम् । विधाय दृष्टिं त्वयि चित्तवृत्तिं निनाय दीना कतिचिद् दिनानि ॥२५॥ घुटने पर कुहनी, ढीले और दुर्बल कर-कमल पर गाल, नाक पर दृष्टि और आप में मन रख कर बिचारी कान्तिमती किसी तरह कुछ दिन निकाल रही है ॥२५॥ अथैकदा कन्दलितानुरागा यामे तुरीये किल यामवत्याः । स्वप्नान्तरे कञ्चन पञ्चबाणसमानकान्तिं सुमुखी ददर्श ॥२६॥ एक बार सुमुखी कान्तिमती ने, अनुराग बढ़ जाने के कारण, रात के तीसरे पहर में स्वप्न में कामदेव के समान सुन्दर किसी पुरुष को (आपको) देखा ॥२६॥ ततस्तदीयाननपूर्णचन्द्रविलोचनान् मानसमिन्दुमुख्याः । विमुक्तमर्यादमभूत् तरङ्गैर्गभीरमप्यम्बु यथाम्बुराशेः ॥२७॥ तब आपके मुखरूपी पूर्णचन्द्र के दर्शन करने से चन्द्रमुखी कान्तिमती का मानसरोवर के समान गंभीर मन, पूर्णचन्द्र के दर्शन करने से ज्वार आए हुए समुद्र के गंभीर जल के समान, बड़ी-बड़ी तरंगों से उद्वेलित होकर मर्यादा छोड़ बैठा ॥२७॥ (२१) अनन्यजन्मा कामः।

दशमः सर्गः ९५ कुण्ठं विवेकाङ्कुशमाशु कृत्वा व्रीडाख्यवारां विघटय्य दूरात् । छित्वा तदन्तःस्थितिशृङ्खलाञ्च बभ्राम कन्दर्पमदद्विपेन्द्रः ॥२८॥ कान्तिमती का मदनमद-रूपी मदोत्कट हाथी, विवेक-रूपी अंकुश को कुंठित समझ कर (कुछ न गिन कर), तथा शीघ्र लज्जा-रूपी बन्धन-स्थान को दूर से ही तोड़-फोड़ कर और पैरों में बँधी हुई शान्तभाव-रूपी लोह-शृङ्खला को आमूल उखाड़ कर, निरंकुश और उच्छृंखल घूमने लगा ॥२८॥ मृगीदृशा संसदि सङ्गिनीनां हासप्रसङ्गे विहितं तया यत् । शुष्काधरे शीर्णरुचिस्मितं तन् नालं कपोलस्य विकासनाय ॥२९॥ सखी समाज में, हँसी मजाक के प्रसंग में, मृगनयनी कान्तिमती ने अपने सूखे होठों पर जो दिखावटी मुसकान लाने का यत्न किया, उस मुसकान से उसका गाल भी विकसित न हो पाया ॥२९॥ कुशेशयाक्षी निशि निःशलाके यदश्रुपूरं विजहौ निषण्णा । उच्छूनशोणेक्षणमज्जनेन स्नातं तदावेदयदाननाब्जम् ॥३०॥ कमल-नयनी कान्तिमती रात में एकान्त स्थान में बैठ कर जो आँसुओं की धारा बहाती है उसे सूजी हुई लाल आँखों के जल में स्नान करने वाला मुख-कमल बतलाता है ॥३०॥ न्यस्तं स्तनान्ते तनुमध्यमाया बलात् सखीभिर्नलिनीपलाशम् । तदूष्मणा तत्क्षणमेव शीर्णं निःश्वाससंक्षापवनैर्विकीर्णम् ॥३१॥ पतली कमर वाली कान्तिमती के स्तनों के बीच में सखियों ने जो कमल-पत्र रक्खा वह तत्काल विरह-ताप से सूख गया और गहरी साँसों के वेग से टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया ॥३१॥ मृणालजालं यदि नाम तीव्रतापेन नीयेत न नीलिमानम् । निश्चीयतां निश्चलदेहवल्ली कथं नु तस्मिन् मिलिता मृगाक्ष्याः ॥३२॥ कमलपत्रों की सेज यदि विरह के उग्र ताप से मुरझा कर नीली न पड़ जाय तो इसका निश्चय कैसे हो कि मृगनयनी कान्तिमती की निश्चल देह-लता उस पर सोई थी ? ॥३२॥ निर्बन्धपृष्टाऽपि न सन्दधाति प्रश्नानुरूपोत्तरमातुरा सा । बाष्पाम्बुरुद्धार्धपदं कदाचित् स्वयं गृणीते तव नाम तन्वी ॥३३॥ प्रेमपूर्वक कुशल प्रश्न पूछे जाने पर भी व्याकुल कान्तिमती प्रश्नानुकूल उत्तर नहीं दे पाती । दुबले-पतले शरीरवाली वह कभी-कभी आपका नाम लेने का प्रयत्न करती है, किन्तु आँसुओं के जल से कंठ रुँध जाने के कारण आधा नाम ही मुख से निकल पाता है ॥३३॥ ऋज्वी यदीन्दोश्चरमा कला स्याद् यद्युष्णभावं च भजेदभीक्ष्णम् । तदा मनोजाग्नितनूकृतायास्तनोरमुष्यास्तुलनामुपैति ॥३४॥ यदि चन्द्रमा की अन्तिम कला सरल (सीधी) हो और सदा उष्ण बनी रहे तो वह कामाग्नि से तप्त और क्षीण कान्तिमती के शरीर की समानता कर सकती है ॥३४॥ (२८) वारी गजबन्धनस्थानम् । (३०) रात्रौ विजने निषण्णया सरोजलोचनया यद् रुदितं तस्मात् तदीय मुखकमलं शोथं प्राप्तयोर्लोहित- योर्नेत्रयोरश्रुप्रवाहे आत्मानं कृतस्नानं न्यवेदयत् ।

९६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सर्वेन्द्रियाणि प्रतिपत्तिशून्यान्यस्या दधत्याः सततं वयस्याः । विलोचनोन्मीलनमीलनाभ्यां प्रबोधमूर्च्छे परमुन्नयन्ति ॥३५॥ कान्तिमती की सब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने में निश्चेष्ट हैं। इसकी सखियाँ केवल इसके नेत्रों के खुलने और बन्द होने से जागरण और मूर्च्छा का अनुमान लगाती हैं ॥३५॥ अवाप्तदाहस्तनुते स्म दाहं मूर्च्छाङ्गतोऽसौ व्यतरच्च मूर्च्छाम् । मन्ये मनोभूरतनूत्वमस्यै निजं पदं दित्सति सेव्यमानः ॥३६॥ इसकी सेवा से प्रसन्न होकर कामदेव अपनी वस्तुएँ इसे दे रहा ह—कामदेव को शिवजी के तृतीय नेत्र से दाह मिला था, अतः वह कान्तिमती को (पूर्वराग) दाह दे रहा है। उसे (दाह के बाद) मूर्च्छा मिली थी, अतः वह इसे भी मूर्च्छा दे रहा है। कामदेव स्वयं शरीर-रहित है, अतः अत्यन्त प्रसन्न होकर अब वह कान्तिमती को भी अपने समान ही शरीर-रहित बनाना चाहता है ॥३६॥ अत्रान्तरेऽरुन्तुदमन्यदेव दैवेन वैमुख्यभृतोपनीतम् । जामातरं प्रार्थयते प्रतीपो राजन्यमन्यं जनको यदस्याः ॥३७॥ इसी बीच में विमुख विधाता ने एक मर्म-स्पर्शी घटना खड़ी कर दी है। वह यह कि कान्ति- मती के पिता, इसके शत्रु बनकर, एक दूसरे राजा को अपना जामाता बनाना चाहते हैं ॥३७॥ अथातिरेकस्रवदस्त्रवर्षैराप्लावयन्ती वपुरुष्णमुष्णैः । प्रत्येकमाभाष्य सखीः कथञ्चिच्छनैर्बभाषे करुणं कुमारी ॥३८॥ तब दुःख के आवेग से बहनेवाले गरम आँसुओं की वृष्टि से अपने गरम शरीर को सींचती हुई कान्तिमती प्रत्येक सखी को निर्दिष्ट कर किसी प्रकार धीरे-धीरे करुणस्वर से बोली ॥३८॥ अहो महामोहजविभ्रमोऽयं व्योमस्थितेन्दोः परिशीलनाय । रसातलावस्थितपञ्जरान्तःस्थिता चकोरी कुरुते यदाशाम् ॥३९॥ अहो ! पृथ्वी पर स्थित पिंजरे में बन्द चकोरी की आकाश में स्थित चन्द्रमा को प्राप्त करने की आशा कितने बड़े अज्ञान से उत्पन्न मूर्खता की बात है ! ॥३९॥ असंस्तुते पुंसि नराधिनाथे हासाय सन्देशवचो वधूनाम् । तत्रापि पाणिग्रहणाय कन्यावचोविकाशोऽपि विडम्बनाय ॥४०॥ बिना जान-पहचान के पुरुष के लिये, और विशेष कर राजा के लिये, किसी कुमारी का प्रणय- सन्देश वचन हास्यास्पद है। फिर कन्या का अपनी ओर से विवाह का प्रस्ताव तो और भी विड- म्बनापूर्ण है ॥४०॥ अतीव दुष्प्राप्यमनोरथेऽस्मिन्नाशा ङ्कुरस्यापि न मेऽवकाशः । अतः परं पञ्चशरस्य पञ्चसहस्रसङ्ख्या विशिखाः पतन्तु ॥४१॥ मेरे अत्यन्त दुष्प्राप्य इस मनोरथ में आशा के अंकुर उगने का कोई अवकाश नहीं है। अतः अब भले ही कामदेव के पाँच क्या पाँच हज़ार बाण भी मुझ पर पड़ें तो भी कोई चिन्ता नहीं ॥४१॥

१३ दशमः सर्गः ९७ इति ब्रुवाणां वरवर्णनों तां हृदा विनिर्णोय सखी जगाद । त्वय्येव तावद् विशिनष्टि शोभां मनोऽनुरूपो हि मनोरथस्ते ॥४२॥ इस प्रकार कहने वाली सुन्दरी कान्तिमती से सखी ने, मन में विचार कर, कहा कि तुम्हारे मन के अनुकूल यह मनोरथ तुम्हीं को शोभा देता है ॥४२॥ लावण्यतारुण्यगुणाभिजात्यैरनूनता ते नियतं नताङ्गि । जागर्ति योग्यद्वययोजनायां विधे विदग्धाभिमता च वृत्तिः ॥४३॥ नतांगि ! तुम्हारे सौन्दर्य, यौवन, गुण, और कुल आदि में कोई कमी नहीं है और विधाता की चातुर्य से शोभित मनोवृत्ति दो योग्य युवक-युवती को मिलाने में प्रसिद्ध है ही ॥४३॥ तद् धैर्यवृत्त्या विनिरुध्य बाधां कालं कियन्तं प्रतिपालय त्वम् । यावद् विदध्यामहमात्मबुध्या कमप्युपायं कमलायताक्षि ॥४४॥ कमल-नयनि ! कुछ समय तक व्यथा को रोक कर धैर्य धारण करो, तब तक अपनी बुद्धि के अनुसार मैं भी कुछ न कुछ उपाय निकाल लूंगी ॥४४॥ इत्थं समाश्वास्य सखीं सखेदं समीक्ष्य मां साश्रुमुखी जगाद । शाकम्भरीं प्राप्य पुरं समस्तं पृथ्वीपतेस्तस्य निवेदयेति ॥४५॥ अपनी सखी कान्तिमती को इस प्रकार आश्वासन देने पर, मुझे खिन्न देख कर, रोते हुये उसने मुझसे कहा कि शाकंभरी नगरी जाकर पृथ्वीराज के समक्ष सारा हाल निवेदन करो ॥४५॥ ॰ तदेतदावेदितमग्रतस्ते यथानुभूतं ननु भूपतीश । व्रजाम्यहं शाधि मम क्षमस्व वैयात्यमेतत् परतन्त्रवृत्तेः ॥४६॥ राजन् ! मैंने आपके आगे सारा हाल निवेदन कर दिया है। अब मैं जाती हूँ, मुझे आज्ञा दें, और परतन्त्र होने के कारण जो कुछ मुझसे यह धृष्टता हुई उसे क्षमा करें ॥४६॥ एवं निवेद्याऽऽनतकन्धरा सा धराभृता भूमिभुजो भुजिष्या । प्रमोदमञ्जुस्मितकौमुदीभिर्मुखेन्दुमुद्भासयता बभाषे ॥४७॥ इस प्रकार निवेदन करके नतमस्तक खड़ी हुई कान्यकुब्जेश्वर की परिचारिका से राजा पृथ्वीराज ने, हर्ष स मनोहर मुसकान रूपी चाँदनी से अपने मुख-चन्द्र को प्रकाशित करते हुये, यह कहा ॥४७॥ संसारकासारसरोरुहिण्यास्तस्याः स्मरस्याप्यधिदेवतायाः । पीयूषधारामधुरा गुणौघा मया मुहुः श्रोत्रपुटेन पीताः ॥४८॥ संसार-रूपी सरोवर की सरोजिनी और कामदेव की भी स्वामिनी उस कान्तिमती के अमृत की धारा के समान मधुर गुण-समूहों को मैंने बार बार अपने कानों-रूपी दोनों से पिया है ॥४८॥ जानीहि पाणिस्थितमेव तावन् महत् मनोराज्यफलं मृगाक्ष्याः । एवं यदि त्वत्कथनानुरूपस्तस्यामपि स्यादनुरागबन्धः ॥४९॥ उस मृग-नयनी के महान् मनोरथ के फल को हथेली पर रखा हुआ ही समझो, यदि, जैसा तुम कह रही हो, उसके हृदय में भी मेरे प्रति इतना अनुराग है ॥४९॥

गच्छ संवर्धय सावधाना कल्याणि कान्तां मम वाचिकेन । इतीरयित्वा त्वरितं कृतज्ञः कृतप्रसादो विससर्ज दूतीम् ॥५२॥

Wait, look at line 10: "तद् गच्छ" or "तद्गच्छ"? There is a space: "तद् गच्छ".

Let's check line 4: "में शीघ्र ही कोई न कोई उपाय ढूंढ कर..." Wait, "में" or "मैं"? Look at the first word: "मैं" or "में"? It has two matras: "मैं"! Let's look at the first character: "मैं शीघ्र ही..." -> Yes, "मैं"!

Let's check line 4: "ढूंढ" or "ढूँढ"? It has a candrabindu: "ढूँढ".

Let's check line 4: "मादकनयनी के सन्ताप को दूर करूँगा ।" Wait, "को" has a dot? "क़ो"? No, just "को".

Let's check line 12: "कल्याणि ! अब तुम जाओ और सावधानी के साथ मेरे वचनों से प्रिया को सन्तुष्ट करो ।"

Line 13: "कुशल पृथ्वीराज ने यह कहकर और अपने सत्कार से दूती को प्रसन्न करके रवाना किया ॥५२॥"

Line 16: "बन्धु-वर्ग

पुरं समन्तादकुतोभयोऽसौ कुतूहलीकृत्य विनिर्णयाय । बभ्राम तद्गोपुरतोरणाट्टशृङ्गारकाक्रीडकृतोपशोभाम् ॥५८॥ कुतूहलवश सब कुछ अच्छी तरह देख लेने के लिये वे पृथ्वीराज, नगर के दरवाजे, महलों के बाहरी फाटक, बड़े-बड़े महल, चौराहे और उद्यान आदि से शोभित कान्यकुब्ज नगरी में घूमते रहते थे ॥५८॥ स रोधसा सञ्चरते स्म नित्यं सुरापगायास्तुरगद्वितीयः । वीचीपरीरम्भणमेदुरेण संवोज्यमानो वनमारुतेन ॥५९॥ वे अकेले ही घोड़े पर सवार होकर प्रतिदिन गंगा के तट पर चक्कर लगाया करते थे और गंगा की लहरों के आलिंगन से गीला, वन का पवन उनका श्रम दूर किया करता था ॥५९॥ कुमुद्वतीकामुककान्तिपूरैर्धौतान्धकारासु निशीथिनीषु । कदाचिदस्याः पुलिनं जगाम तुरङ्गमं पाययितुं पयांसि ॥६०॥ उन रातों में जिनका अन्धकार कुमुदिनी के प्रिय चन्द्रमा की चाँदनी की धाराओं से धो दिया गया था, एक बार पृथ्वीराज अपने घोड़े को गंगातट पर जल पिलाने गये ॥६०॥ निमग्नवक्त्रं पिबतो हयस्य चलाचलस्फोणितफेनगन्धात् । आपेतुरत्याकुलमुत्पलाक्षीचक्षुर्वलोलाः सहसा शफर्यः ॥६१॥ जब घोड़ा नीची गर्दन करके जल पी रहा था तो उसके मुँह चलाने और फू-फू करने से जो झाग निकले उनकी गन्ध से आकृष्ट होकर कमल-नयनी सुन्दरियों के नेत्रों के समान चंचल मछलियाँ सहसा दौड़-दौड़ कर आने लगीं ॥६१॥ विलोक्य ताः कौतुकमग्नचेताश्चिक्षेप मुक्ताः क्षितिपः स्वकण्ठात् । लाजांशया तत्र जलाशयान्तःस्थिताः समुत्पेतुरनेकशतः ॥६२॥ उनको देख कर कुतूहल में मग्न चित्त वाले पृथ्वीराज ने अपने कंठ से मोतियों का हार निकाल कर उसके मोती थोड़े-थोड़े करके जल में फेंकना शुरु किया और जल के अन्दर स्थित वे मछलियाँ भी उन मोतियों को लावा समझ कर एक के ऊपर एक टूट पड़ीं ॥६२॥ क्रीडन्तमेवं तुरगद्वितीयं विलोकयामास विशालसत्वम् । तं कान्यकुब्जेश्वरकन्यका सा प्रसादवातायनगा सखीभिः ॥६३॥ घोड़े के उस पराक्रमी साथी को इस प्रकार खेल करते हुए, महल की खिड़की से, सखियों के साथ कान्यकुब्जेश्वर की कन्या ने देखा ॥६३॥ रूपेण गम्भीरमनोरमेण लोकोत्तरेणापि विचेष्टितेन । पर्याकुला विस्मयकौतुकाभ्यां स्वैरं बभाषे क्षितिपात्मजा सा ॥६४॥ उसके गंभीर और सुन्दर रूप को तथा लोकोत्तर क्रीड़ा को देखकर कान्तिमती विस्मय और कुतूहल से भर गईं और स्वच्छन्द होकर बोली ॥६४॥

१०० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् कोऽयं कलानाथ इवामृतानि किरन् दृशोः कन्दलयन्ननङ्गम् । एकोऽप्यनेकावृतवत् प्रभावाद् व्यपेतशङ्को विजरीहरीति ॥६५॥ चन्द्रमा के समान अमृत की वर्षा करने वाले, नेत्रों में कामदेव को जगाने वाले, अकेले होते हुए भी अपने प्रभाव के कारण अनेकों से घिरे हुए से लगने वाले, ये कौन हैं जो इस प्रकार निःशंक होकर विहार कर रहे हैं ? ॥६५॥ लाजानिवाऽऽजानुभुजोऽनुवेलं क्षिपत्यसौ पाथसि मौक्तिकानि । सत्त्वेन रूपेण जनातिगेन मन्ये भुवः कोपि भवेदधीशः ॥६६॥ ये आजानुबाहु हैं और लगातार जल में लावे जैसे मोती फेंक रहे हैं। इनके अलौकिक बल और रूप से पता चलता है कि कोई पृथिवीपति हैं ॥६६॥ निमज्जयन्ती हृदयं मृगाक्ष्याः सुधाम्बुराशौ मधुरैर्वचोभिः । जगाद तां बुद्धिमती भुजिष्या शाकम्भरीं या नगरीं गतासीत् ॥६७॥ अपने मधुर वचनों से मृगनयनी कान्तिमती का हृदय अमृत के समुद्र में डुबाती हुई वह बुद्धिमती परिचारिका, जो पहले शाकंभरी नगरी गई थी, यों बोलीं ॥६७॥ असंशयं सोऽयमशीर्णसत्वः सोमेश्वरस्य प्रथमस्तनूजः । आकारतो वा गुणवैभवाद् वा कस्तेन तुल्यो जगति द्वितीयः ॥६८॥ निःसन्देह ये सोमेश्वर के महाप्रतापी बड़े पुत्र हैं। रूप और गुण में इनके बराबर संसार में और कौन है ? ॥६८॥ प्रत्येषि नो चेन् मम शंसितेन कृशाङ्गि सन्देहविनोदनाय । अस्यान्तिकं प्रेषय कान्तिराशेः काञ्चित् तदा प्रत्ययितां भुजिष्याम् ॥६९॥ कृशांगि ! यदि आपको मेरे कथन में विश्वास नहीं हो तो अपने सन्देह के निवारण के लिये आप इन कान्तिपुञ्ज के पास किसी विश्वस्त परिचारिका को भेज कर देख लीजिए ॥६९॥ स्वभाव एवायमधीश्वराणां छायाद्वितीया अपि कौतुकेन । परीतमात्मानमुदारभृत्यवर्गैरिवार्यत्तधियो विदन्ति ॥७०॥ राजाओं का यह स्वभाव है कि अकेले होने पर भी कौतुकवश वे अपने आपको उदार अनु- चरों के समूहों से घिरे हुए समझते हैं ॥७०॥ समापिते सम्प्रति हाररत्ने जिघृक्षुरन्यान्यपि मौक्तिकानि । पश्चात्स्थितं कञ्चन मन्यमानः प्रसारयिष्यत्ययमग्रपाणिम् ॥७१॥ अभी जब यह हार समाप्त हो जायगा तो और मोतियों की इच्छा से ये, अपने पीछे किसी अनुचर को खड़ा हुआ समझकर, अपना हाथ बढ़ा देंगे ॥७१॥ प्रियां निशम्येति गिरं तदीयां कुतूहलेनाकुलिता कुमारी । समर्प्य मुक्ताफलजालकानि जवेन काञ्चित् प्रजिघाय दूतीम् ॥७२॥ उसके ये प्रिय वचन सुन कर कुमारी ने कुतूहलवश एक दूती को मोतियों के समूह देकर जल्दी से भेजा ॥७२॥

दशमः सर्गः १०१ आदेशतोऽस्याः सविधं जगाम दूती मनोवृत्तिरिव द्वितीया। मीनावलीरिङ्गणलोलदृष्टेर्मीनाङ्कमानं हरतो नृपस्य ॥७३॥ कुमारी की दूसरी मनोवृत्ति के समान वह दूती, आज्ञा पाकर, पृथ्वीराज के समीप गई जो चंचल नेत्रों से मछलियों का तैरना देख रहे थे और अपने सौन्दर्य से कामदेव का अभिमान दूर कर रहे थे ॥७३॥ अधृष्यरूपस्य धराभृतोऽस्य भीताप्यसौ साहसबद्धधैर्या । समीपमासाद्य शनैर्नयज्ञा छायेव पश्चादवतिष्ठते स्म ॥७४॥ राजा के प्रतापी रूप को देखकर वह भयभीत हो गई, किन्तु साहस करके धैर्य धारण किया और नीतिकुशल होने के कारण धीरे से पास जाकर छाया के समान पीछे खड़ी हो गई ॥७४॥ कौतूहलक्षिप्तहृदा नृपेण क्षिप्ते समस्ते सरिति स्वहारे। प्रसारिते पाणितलेऽस्य पश्चादुपानयन् मौक्तिकजालकं सा ॥७५॥ कुतूहलवश राजा ने अपना सारा हार गंगा में फेंक देने पर पीछे हाथ बढ़ाया और परिचा- रिका ने मोती का जाल उस पर रख दिया ॥७५॥ क्रमेण मीनास्यमुपागतासु मुक्तासु तास्वप्रथितासु तन्वी। आच्छिद्य सद्यो निजकण्ठदेशादकुण्ठसत्वा विततार हारम् ॥७६॥ उन खुले हुए मोतियों के धीरे-धीरे मछलियों के मुंह में पहुँच जाने पर, परिचारिका ने झट उत्साहपूर्वक अपने गले से हार उतार कर राजा के हाथ में धर दिया ॥७६॥ ॰ अथाङ्गनाकण्ठविभूषणं तद् विलोक्य विस्मेरमना मनीषी। विवर्त्य वक्त्रं विततप्रभावो विलोकयंस्तामबलां बभाषे ॥७७॥ बुद्धिमान् और विख्यात प्रभाव वाले राजा ने उस स्त्री के कंठ के हार को देखकर आश्चर्य- चकित होकर मुँह पीछे फेरा और उस अवला की ओर देखते हुए बोले ॥७७॥ का त्वं कुतस्त्यासि निशाचरीव घने निशीथे विजने भ्रमन्ती। त्वया किमर्थं व्ययितानि तावन् महार्घमुक्ताफलजालकानि ॥७८॥ तुम कौन हो ? कहाँ की हो ? इस घनी आधी रात में राक्षसी की तरह जंगल में क्यों घूम रही हो ? और अपने बहुमूल्य मोतियों के समूह तुमने किसलिये खर्च कर दिए ? ॥७८॥ तथा प्रगल्भाऽपि नृपप्रभावात् सा साध्वसोत्कम्पितचित्तवृत्तिः। प्रणम्य सङ्कोचितगात्रयष्टिः सगद्गदं प्रत्यवदत् कथञ्चित् ॥७९॥ यह सुन कर उस प्रौढ परिचारिका की चित्तवृत्ति, राजा के प्रभाव के कारण, भय से कम्पित हो उठी। राजा को प्रणाम करके, अपने पतले शरीर को सिकोड़ती हुई गद्गद कण्ठ से किसी प्रकार यों बोली ॥७९॥ अहं महाभाग ! महीश्वरस्य कुमारिकायाः परिचारिकाऽस्मि । प्रमाणयन्ती नियमेन तस्या निदेशमस्यां निशि बंभ्रमीमि ॥८०॥ महाभाग ! मैं कान्यकुब्जेश्वर की राजकुमारी की परिचारिका हूँ और नियमपूर्वक उन कुमारी की आज्ञा का पालन करने के कारण इस रात्रि में भी यहाँ आई हूँ ॥८०॥

१०२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मया पराधीनतया विमुक्ता स्वाभाविकी भीतिरपि त्रपापि । प्रभोर्निदेशस्य नितान्तवश्या गुणागुणं नैव विचारयन्ति ॥८१॥ पराधीन होने के कारण मैंने स्वाभाविक (स्त्री-सुलभ) भय और लज्जा दोनों छोड़ दिये हैं। स्वामी की आज्ञा के अत्यन्त परवश अनुचरगण गुण और दोष का विचार नहीं करते ॥८१॥ एकं भवन्तं विहरन्तमत्र स्वतन्त्रमत्यन्तमगाधसत्त्वम् । अन्तःपुरस्थ्या ददृशुः कृशाङ्ग्यो वातायनालम्बिदृगम्बुजान्ताः ॥८२॥ अत्यन्त पराक्रमी आपको यहाँ अकेले ही स्वतन्त्र-रूप से विहार करते हुये, अन्तःपुर की स्त्रियों ने, खिड़की की जालियों में अपने नयन-कमल झुका कर देखा ॥८२॥ आरूढसौधोच्छ्रितचन्द्रशाला बाला च सा त्वामवलोकयन्ती । अपृच्छदच्छाशयमायताक्षी पुनः पुनः पार्श्वचरीसमाजम् ॥८३॥ महल की ऊँची चन्द्रशाला पर चढ़कर राजकुमारी ने शुद्ध हृदय वाले आपको देखा और विस्मय से आँखें चौड़ी करके बार बार अनुचरियों के समाज से यों पूछा ॥८३॥ सख्यः समक्षीक्रियते पुरस्तात् कोऽयं विलासायुधवद् विलासी । धरावतीर्णः किमु रोहिणीशो हिनस्ति धैर्यस्थितिमिङ्गनानाम् ॥८४॥ सखियों ! कामदेव के समान विलासी ये कौन सामने दिखाई दे रहे हैं? क्या स्वयं चन्द्रमा धरती पर उतर कर रमणियों के धैर्य को दूर कर रहे हैं? ॥८४॥ निशम्य तद् बुद्धिमती भुजिष्या शाकम्भरीं या नगरीं गतासीत् । आचष्ट सा स्पष्टमयं स पृथ्वीराजो मया तत्र हि दृष्टपूर्वः ॥८५॥ यह सुनकर वह बुद्धिमती परिचारिका, जो पहले शाकंभरी नगरी गई थी, स्पष्ट बोली कि ये तो राजा पृथ्वीराज हैं जिनको मैंने पहले शाकंभरी में देखा था ॥८५॥ अन्या जगाद ग्रहिला स्वपक्षे साक्षेपमस्या विनिगृह्य वाचम् । असावसम्भावितभाषितेन येते मनस्तोषयितुं भवत्याः ॥८६॥ तब दूसरी सखी अपने पक्ष में आग्रह रखती हुई, आक्षेपपूर्वक पहली परिचारिका का खंडन करती हुई कहने लगी कि यह तो असंभव बात बना कर आपके मन को बहलाने का यत्न कर रही है ॥८६॥ यत्प्रस्थितौ वारणवाजिपत्तिभरेण दोलायितमेति भूमिः । एकाकिनोऽस्य भ्रमणं निशायां प्रत्येतु कोऽस्मिन् परराष्ट्रचक्रे ॥८७॥ जिन पृथ्वीराज के प्रस्थान के समय हाथियों, घोड़ों और पदातियों के भार से भूमि काँप उठती है, वे यहाँ दूसरे राज्य में रात के समय अकेले घूमेंगे-यह कौन मान सकता है ? ॥८७॥ भवन्ति तुल्याकृतयोप्यनेके लोकेऽत्र का विप्रतिपत्तिशङ्का । कल्याणि तुल्यासि यथा रतेस्त्वं मुखेन तुल्यश्च यथा तवेन्दुः ॥८८॥ इस संसार में बहुत से लोग हैं जिनकी आकृति आपस में मिलती है। इसमें कौन-सी विरोध वाली बात या शंका हो सकती है ? कल्याणि ! जैसे आप स्वयं रति के समान हैं या जैसे चन्द्रमा आपके मुख के समान है ॥८८॥

दशमः सर्गः १०३ तस्योपमानं यदि मानवेषु न वेत्सि रूपेण गुणैश्च तैस्तैः । विद्याधरो वा धरणीं विहर्तुं वृन्दारकः कश्चन वाऽवतीर्णः ॥८९॥ और यदि आप यही समझती हैं कि मनुष्यों में कोई भी रूप में और विविध गुणों में पृथ्वीराज के समान नहीं है, तो हो सकता ह कि यह कोई विद्याधर या कोई देवता पृथ्वी पर विहार करने के लिये आया हो ॥८९॥ एवं ब्रुवाणां स्मयपूर्वमेनां भूयोऽपि सा सस्मितमाबभाषे । प्रत्यक्षदृष्टं किमिमं पदार्थं वितण्डया खण्डयितुं प्रवृत्ता ॥९०॥ इस प्रकार गर्वपूर्वक कहनेवाली सखी से पहली सखी फिर हँस कर बोली, प्रत्यक्ष दिखाइ देनेवाले पदार्थ को तुम झूठमूठ अपनी वितण्डा से खंडन करने का क्यों प्रयत्न कर रही हो ? ॥९०॥ प्रतिश्रुतं विष्टपविश्रुतेन पुरो ममाऽत्राऽऽगमनाय येन । अभ्यागतो निह्नुतराजलक्ष्मा स क्ष्माधिनाथः किल पक्ष्मलाक्षि ॥९१॥ राजकुमारि ! ये वे ही विश्वविख्यात राजा पृथ्वीराज हैं जिन्होंने मेरे सामने यहाँ आने का वादा किया था और अब अपना राजसीय वेश छिपा कर छद्मवेश में यहाँ आए हैं ॥९१॥ इत्थं तयोरत्र चिराय वादद्यूतं प्रवृत्तं कुतुकेन सख्योः । नृपात्मजा सुन्दर ! सन्दिहाना मां प्राहिणोत् तत्त्वविनिर्णयाय ॥९२॥ 'इस प्रकार उन दोनों सखियों में कुतूहलवश बहुत देर तक शर्त के साथ वाद-विवाद चलता रहा। हे सुन्दर ! तब सन्देह करनेवाली राजकुमारी ने तत्त्वनिर्णय के लिए मुझे यहाँ भेजा ॥९२॥ उदीरयित्वेवमुपात्तमौनां मनाग् विहस्येति बभाण भूपः । बाले तवानेन गवेषणेन फलं न किञ्चित् प्रविलोकयामि ॥९३॥ इस प्रकार कहकर मौन हो जाने वाली परिचारिका से राजा ने जरा मुस्कुरा कर कहा, 'बाले ! तुम्हारी इस खोज का मैं कुछ भी फल नहीं देखता ॥९३॥ प्रत्येष्यति त्वद्वचनादियञ्चेत् सन्देग्धि किं बुद्धिमती वचोभिः । जनः कुतर्कापहृतप्रतीतिर्नहि प्रमाणीकुरुतेऽन्यवाणीम् ॥९४॥ यदि राजकुमारी तुम्हारे वचनों का विश्वास कर लेगी तो फिर बुद्धिमती होने पर भी वह सन्देह क्यों करती है ? कुतर्क के कारण जिनका विश्वास डगमगा जाता है वे लोग दूसरे के वचनों को प्रमाण नहीं मानते ॥९४॥ तां मद्वचोभिर्वद सन्दिहानामागामिनी कामिनि यामनीयम् । सनिर्णयं ते हृदयं विधात्री सन्धेहि धैर्यं कियतोपि यामान् ॥९५। उन सन्देह करनेवाली राजकुमारी से तुम मेरी ओर से कहना कि हे कामिनि ! आगामिनी रात्रि तुम्हारे सन्देह का निवारण करके तुम्हारे हृदय को निर्णय वाला बना देगी। कुछ पहरों तक और धैर्यं धारण करो' ॥९५॥

१०४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इत्युक्तवान् मुक्तसरित्प्रतीरः प्रत्यागमत् स्वं शिविरं स वीरः । सापि प्रविष्टा सुमनाः पुरान्तः प्रमोदयामास मनः कुमार्याः ॥९६॥ यह कहकर वीर पृथ्वीराज गंगा के तट को छोड़कर अपने शिविर में चले गए और वह परि- चारिका भी प्रसन्न मन से अन्तःपुर में प्रवेश करके राजकुमारी के हृदय को प्रमोद देने लगी ॥९६॥ आकर्ण्य सन्देशहरोपनीतं सन्देहहारि प्रियभाषितं तत् । आसन्नसङ्गं तमुदीक्षमाणा क्षणं मृगाक्षी युगवद् विवेद ॥९७॥ संदेश लानेवाली परिचारिका के संदेह को हरनेवाले उन प्रियतम के प्रिय वचनों को सुन कर और प्रियतम का संग समीप जानकर मृगनयनी राजकुमारी के लिये एक क्षण भी युग के समान बीतने लगा ॥९७॥ अन्येद्युरुन्निद्रकुमुद्वतीके काले कलाविद् विहिताभ्युपायः । अलक्ष्यमाणः प्रतिहारपालैः पुरं कुमार्याः प्रमना विवेश ॥९८॥ दूसरे दिन रात में जब कुमुदिनी खिल रही थी, कला-निपुण

१४ दशमः सर्गः १०५ अयोजयत् तन् मिथुनं मनोज्ञं योग्यद्वयीयोजनविद् विधाता । प्राज्योदितस्नेहसमृद्धमन्तर्मनोभवाग्निं विनिधाय साक्ष्ये ॥१०३॥ योग्य वर-वधू को मिलाने में दक्ष विधाता ने, अत्यन्त उत्कृष्ट स्नेह से परिवर्धित, हृदय में स्थित, कामदेव रूपी अग्नि को साक्षी करके उस मनोहर वर-वधू के मिथुन को मिला दिया ॥१०३॥ मनोऽनुवृत्तिं मदनस्य तन्वन् प्रमाणयन् प्रेम नवं प्रियायाः । स विस्मृतान्यव्यसनप्रसङ्गो निनाय कान्तः कतिचित् त्रियामाः ॥१०४॥ कामदेव के मनोऽनुकूल व्यवहार करनेवाले और प्रिया के नवीन प्रेम को प्रमाणित करने वाले प्रिय पृथ्वीराज ने अन्य सब कुछ भूल कर कुछ रातें वहीं बिता दीं ॥१०४॥ वधूस्वभावान् नमितं मुखाब्जं समुन्नमय्य प्रणयात् प्रियायाः । प्रयातुकमः शिविरं स विज्ञः शनैरथाभाषत नीरजाक्षीम् ॥१०५॥ अपने शिविर में जाने की इच्छा रखनेवाले बुद्धिमान् राजा ने कमल-नयनी प्रिया के, नवोढ़ा के स्वभाव के कारण लज्जावश झुकाए गए मुख-कमल को प्रेमपूर्वक उठाकर, धीरे-धीरे उससे ये वचन कहे ॥१०५॥ न मां समायातमिहायताक्षि ! कश्चिद् विजानाति जनो मदीयः । अतो ममादर्शनजातखेदः कर्ता कुतर्काननुजीविलोकः ॥१०६॥ विशालनेत्रे ! मेरे अनुचरों में से कोई यह नहीं जानता कि मैं यहाँ आया हुआ हूँ। अतः मुझे न देखने के कारण दुखी हुए वे लोग नाना प्रकार के कुतर्क कर रहे होंगे ॥१०६॥ ऽमया विनाऽसौ विषयं विषादी नूनं व्रजेद् वीरजनो मदीयः । अनन्तरैरन्तरमेत्य भूपैस्ततो विलुप्येत बलेन राष्ट्रम् ॥१०७॥ मेरे वीर लोग मेरे बिना दुखी होकर देश लौट जायँगे और फिर अन्य राजाओं से मिलकर इस राज्य को बलपूर्वक नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे ॥१०७॥ न चोत्सहे सोढुमहं मुहूर्तपि त्वदीयं विरहं वरोरु । संभाव्य ऽसामन्तजनं समस्तं समग्रयिष्यामि मनोरथं ते ॥१०८॥ वरोरु ! मैं क्षण भर भी तुम्हारा विरह नहीं सह सकता। अतः मैं शीघ्र अपने सब सामन्तों से परामर्श करके तुम्हारे मनोरथ को पूर्ण करूँगा ॥१०८॥ इतीरिता रीतिविदा प्रियेण तरङ्गितान्तःकरणा कृशाङ्गी । निश्वस्य वाष्पाम्बुभरेण पूर्णां दृशं दधे दीननमां सखीषु ॥१०९॥ रीति कुशल प्रिय से इस प्रकार सम्बोधित की गई कृशांगी का मन उद्वेलित हो उठा और उसने गहरी साँस लेकर अपनी आँसुओं से पूरी भरी हुई अत्यन्त दीन दृष्टि सखियों पर डाली ॥१०९॥ ततो भविष्यद्विरहोपतप्तं मुखेन्दुमालोक्य स कान्तिमत्याः । पाणौ समादाय दयालुरेनां निशान्तमध्यान् निशि निर्जगाम ॥११०॥ दयालु पृथ्वीराज कान्तिमती के, भावी विरह की कल्पना से सन्तप्त मुख-चन्द्र को देखकर, उसे अपने हाथों का सहारा देते हुए साथ लेकर, रात में, अन्तःपुर के बीच से रवाना हो गए ॥११०॥

१०६ सुजनचरितमहाकाव्यम् अतीत्य कक्षाः सुतरां स दक्षो द्वारि स्थितानां तुरगोत्तमानाम् । आच्छिद्य कञ्चिज्जविनं प्रवीणं समं कलत्रेण समारुरोह ॥१११॥ अत्यन्त दक्ष राजा, अन्तःपुर के कमरों को पार करके, बाहर द्वार पर बँधे हुए उत्तम घोड़ों में से किसी वेगशाली सधे हुए घोड़े को खोल कर अपनी स्त्री के साथ उस पर चढ़ गए ॥१११॥ द्वारि स्थितैरस्फुरितस्वकृत्यैः सविस्मयत्रासमुदीक्ष्यमाणः । जगाम तेनैव तुरङ्गमेण निजं निवेशं धरणीवतंसः ॥ ११२॥ किंकर्तव्यविमूढ द्वारपालों के भय और विस्मय से देखते देखते राजा पृथ्वीराज उसी घोड़े पर चढ़े हुए अपने शिविर में चले गए ॥११२॥ सामन्तमुख्यः समुपैत्य कश्चिन् मुदाऽथ भूपालमुदाजहार । ससाधनः साधय तावदिन्द्रप्रस्थोन्मुखस्त्वं सुमनाः सदारः ॥११३॥ फिर एक सामन्तश्रेष्ठ ने उनके पास आकर प्रसन्नतापूर्वक निवेदन किया कि आप प्रसन्न मन से साधनसहित सपत्नीक इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) की ओर प्रस्थान कर दीजिये ॥११३॥ चत्वारि यावत् किल योजनानि व्रजस्यतिक्रम्य जनाधिनाथ । तव प्रसादादहमेक एव निवारिष्यामि विरोधिसैन्यम् ॥११४॥ नरनाथ ! जब तक आप चार योजन (बत्तीस मील) न चले जायँगे तब तक आपकी कृपा से में अकेला ही शत्रु सेना को रोक रखूँगा ॥११४॥ अन्योऽब्रवीद् वीरवरः सगर्वं गव्यूतिषट्कावधियाप्तियावत् । तावन् महीशाऽहितवाहिनीनामहं निरोत्स्यामि रयं यथाद्रिः ॥११५॥ दूसरे वीर सामन्तश्रेष्ठ ने सगर्व कहा—राजन् ! जब तक आप छ गव्यूति (चौबीस मील) न चले जायँगे तब तक मैं शत्रुसेना के वेग को, नदी के वेग को पर्वत के समान, रोकूँगा ॥११५॥ एवं हरिप्रस्थगमे यथेच्छं भवन्ति यावन्त्यपि योजनानि । विभज्य तान्येव गृहीतवन्तो युद्धाय सर्वे, कृतसत्यबन्धाः ॥११६॥ इस प्रकार इन्द्रप्रस्थ तक जितने भी योजन होते थे उन सब योजनों को आपस में बाँटकर वे वीर सामन्त युद्ध के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो गए ॥११६॥ रिङ्गत्तुरङ्गं विलसच्छताङ्गमुत्तुङ्गमातङ्गमुपात्तपत्ति । स्फुरत्पताकं घनघोषघोरं सैन्यं रिपोः सन्निदधे तदानीम् ॥११७॥ इसके बाद दौड़ते हुए घोड़ों से और रथों से शोभित, बड़े-बड़े हाथियों से युक्त और सैनिकों से लसी हुई, शत्रु सेना पताका फहराती हुई और भयंकर शब्द करती हुई समीप आ गई ॥११७॥ धैर्यातिरेकादवधीर्य तत्तु पृथ्वीपतिः पूर्णमनाः प्रतस्थे । अव्यग्रचेताः पुनरग्रतोऽस्य सामन्त एकः समराय तस्थौ ॥११८॥ उत्कृष्ट धैर्य के कारण उस सेना की अवहेलना करके पृथ्वीराज पूर्ण उत्साह से इन्द्रप्रस्थ की ओर चल दिए और एक धीर चित्त वीर सामन्त युद्ध के लिए तैयार हो गए ॥११८॥ (११४-११५) योजनं क्रोशचतुष्टयं, गव्यूतिः क्रोशद्वयम् ।