सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
अष्टमः सर्गः ७७ अपि नरेन्द्रपरम्परागतं पदमवाप्य नवाधिपतिर्भुवः । स्वमहसा सहसा बहुसम्पदा बहलयन्नन्यदिवाकरोत् ॥३०॥ पृथ्वी का नया अधिकार पाने वाले अजयपाल ने राजपरंपरा से प्राप्त पद को अपने तेज से और सर्वतोमुखी सम्पत्ति से बढ़ा कर और ही बना दिया ॥३०॥ यदलभन्त पुरा पृथिवीभुजो विजयमानचमूचरसङ्गरैः । स्वनगरे निवसन् नयकोविदः स तदवाप यशः प्रहसन्मुखः ॥३१॥ पहले राजाओं ने जो यश अपने विजयशील सैनिकों द्वारा युद्धों से प्राप्त किया था उस यश को नीतिकुशल और हँसमुख राजा अजयपाल ने राजधानी में रह कर ही प्राप्त कर लिया ॥३१॥ तरुणयन् मिथुनेषु परस्परप्रणयबन्धमपाकृतकैटवम् । सुरभयन्नथ मन्दसमीरणं सुरभिराविर्बभूवदभितो वनम् ॥३२॥ स्त्री-पुरुषों के परस्पर निष्कपट प्रेम-बन्धन को दृढ़ बनाने वाला और मन्द पवन को सुगन्धित [L13
७८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सहजमेव समेत्य मधुश्रिया विकलयेत् पथिकान् बकुलद्रुमः । किमुत मेदुरितो मदिरेक्षणावदनवासितसीधुसुधारसैः ॥३७॥ वसन्त की लक्ष्मी को प्राप्त कर बकुल वृक्ष सहज ही पथिकों को व्याकुल कर देता है; फिर मादक नयनों वाली कामिनियों के मुख से उगली हुई मदिरा के अमृत-रस को पीकर विकसित होने पर तो कहना ही क्या ! (कवि समय के अनुसार बकुलवृक्ष स्त्रियों के मुख से कुल्ले की हुई मदिरा को पीकर अत्यन्त विकसित होता है) ॥३७॥ अदशदाम्रलतांनवपल्लवं सुललितस्वरहेतुकूहूमुखः । अभवदाशु वियोगमृगीदृशां हृदयमर्मणि दारुणवेदना ॥३८॥ अत्यन्त ललित-स्वर में कूकने वाली कोयल ने आम्रलता के नये पल्लव पर चोंच मारी, किन्तु इससे शीघ्र ही वियोगिनी स्त्रियों के हृदयमर्मों पर भीषण आघात हुआ ॥३८॥ स्मृतिभुवः श्वसितैरिव शीतलैैरपि नितान्तमरुन्तुदकर्मभिः । अजनि चेतसि मन्दसमीरर्णैश्चरममन्दरुजाध्वगयोषिताम् ॥३९॥ कामदेव की साँसों के समान शीतल, किन्तु फिर भी मर्मस्पर्शी पीड़ा देने वाले, मन्द पवन से प्रोषितपतिका स्त्रियों के मन में तीव्र वेदना हुई ॥३९॥ अधिवनान्तमशोकमहीरुहः स्फुटमशोभत कोमलपल्लवः । निहितदोहदमन्दुमुखीपदं किमु सभाजयितुं प्रसृतः करः ॥४०॥ उपवन में अशोक वृक्ष की कोमल शाखा ऐसी शोभित हुई मानों (अशोक को) पुष्पित करने वाले, चन्द्रमुखी कामिनी के पैर को पूजने के लिए बढ़ाया हुआ अशोक का हाथ हो । (कवि- समय के अनुसार अशोक वृक्ष स्त्रियों के पादाघात से पुष्पित होता है ) ॥४०॥ ज्वलयताथ पलाशमयेन्धनैर्मनसिजज्वलनं मधुयज्वना । विरहिणामभिचारमखे द्विजः प्रथम ऋत्विगकारि वनप्रियः ॥४१॥ वसन्त रूपी यजमान ने विरही पुरुषों को मारने के निमित्त कराये गये यज्ञ में पलाश-रूपी ईंधन (समिधा) से कामदेव रूपी अग्नि को प्रज्वलित करके वन में रहने वाले द्विज (पक्षी अर्थात् कोयल; ब्राह्मण) को प्रथम ऋत्विक् (यज्ञ करने वाला प्रमुख ब्राह्मण) बनाया ॥४१॥ दिनकृतोज्झितदक्षिणवर्त्मना प्रथयतातिकठोरकरव्रजम् । अहरहः परितापमुपेयिवान् नृपतिनेव कुनीतिमता जनः ॥४२॥ दक्षिणायन से उत्तरायण होने वाले और किरण-समूह को अत्यन्त उग्र करने वाले सूर्य के कारण जनता को दिन-दिन अधिक गर्मी प्राप्त होती गई; जिस प्रकार दक्षिण (उचित और न्याय- शील) मार्ग छोड़ देने वाले अन्यायी और अत्यन्त कठोर कर लगाने वाले निर्दय, कुनीति वाले राजा के कारण जनता का सन्ताप दिन-दिन बढ़ता जाता है ॥४२॥ (४१) मधुयज्वना वसन्तरूपयजमानेन। वनप्रियो द्विजः कोकिलः। प्रथम ऋत्विक् प्रधानयाज्ञिकः।
अष्टमः सर्गः ७९ परिमलैः परितैः पवनेरितैर्विविधपुष्पसमृद्धिसमुद्भवैः । तत इतो ह्रियमाणमनाः क्वचित् स्थितिमधान् न मधुव्रतसन्ततिः ॥४३॥ नाना प्रकार के पुष्पों के मकरन्द से उत्पन्न होनेवाली और वायु द्वारा चारों ओर फैलाई गई सुगन्ध के कारण इधर-उधर खींचे गये चित्त वाली भ्रमरों की पंक्ति कहीं स्थिर होकर नहीं बैठ सकी ॥४३॥ कुसुमपल्लवदुर्ललिता लताः परभृताऽऽविरुतानि वनानिलाः । परममीभिरकारि वशे जगद् विभुतयैव यशोऽलभत स्मरः ॥४४॥ पुष्पों और पल्लवों के दुलार से लाड़ली लतायें, कोयलों की कूकें, उपवंन के पवन—इन सबने जगत् को वश में कर लिया, किन्तु प्रभु होने के कारण यश मिला कामदेव को ॥४४॥ विधिवशः प्रसवोऽस्तु यथा तथा कुरबकान् न परो रसिकस्तरुः । सकृदुपात्तवधूपरिरम्भजाः शिथिलिता यदमुष्य न कण्टकाः ॥४५॥ फूलना-फलना तो विधाता के हाथ है इसलिये भले ही कुरवक वृक्ष के काँटे उत्पन्न होते हैं, [
८० सुर्र्जनचरितमहाकाव्यम् धृतनिजासनसक्तगुणं वधुकुलमदीव्यत दोलनविभ्रमैः । प्रियगुणग्रथितान् पथिकप्रिया मुहुरसूनधिकण्ठमदोलयन् ।।५०।। लकड़ी की पट्टी को झूले के गुणों (रस्सियों) पर रख कर ललनायें झूला झूलने की क्रीड़ा कर रही थीं, किन्तु विरहिणी स्त्रियाँ अपने प्रियतमों के गुणों में अपने प्राणों को गूँथ कर उन प्राणों को बार-बार अपने कंठों में झुला रहीं थीं ।।५०।। हतहिमावरणः परिशीलयन् कमलिनीं मिलितां बहुकालतः । स्फुटमतृप्तमना दिननायकः शिथिलरथ्यरयः शनकैरगात् ।।५१।। (अपनी प्रिया कमलिनी के शत्रु) कुहरे और पाले के पर्दे को नष्ट करके, बहुत समय बाद मिली हुई प्रिया कमलिनी से प्रेमालाप करने वाले सूर्य भगवान्, अतृप्त मन से, अपने रथ के घोड़ों का वेग कम करके, बड़ी कठिनता से धीरे-धीरे गए। (वसन्त में दिन काफ़ी बड़े हो जाते हैं) ।।५१।। नियतमम्बुजिनोमवलोकयन्नजनि मन्दरुचिः शिशिरे रविः । इतरथा कथमेतदुदीक्षणात् प्रकृतिमाप पुनर्भंगवान् निजाम् ।।५२।। शिशिर-ऋतु में निश्चय ही अपनी प्रेयसी कमलिनी को न देखने के कारण सूर्य की प्रभा फीकी (मन्दरुचि) पड़ गई थी, अन्यथा अब वसन्त में कमलिनी को देखकर सूर्य भगवान् फिर स्वभाव से चण्डरुचि (उग्र तेज वाले; सूर्य का नाम) कैसे बन गये ? ।।५२।। दिनमुखोपचितं हरितां मुखान् मलिनिमानमुदस्य मरीचिमान् । कलहखेदितवल्लभचेतसामधिमुखं निदधे हरिणीदृशाम् ।।५३।। प्रातःकाल में दिशाओं के मुखों पर लगी हुई (अन्धकार की) कालिमा को हटा कर सूर्य न उस प्रणय-कलह से रात भर प्रियतमों के मन को दुःख देनेवाली कलहान्तरिता नायिकाओं के मुखों पर पोत दिया। (अपने हठ से वसन्त की रात प्रणय-कलह के कारण बेकार खो देने से प्रातः काल कलहान्तरिताओं के मुख शोक से मलिन हो गये) ।।५३।। सुवदनारदनच्छदकोमला नवविमुक्तपुटा मृदुपल्लवाः । असितदृक्श्वसितप्रतिरूपका मलयशैलसखा वनवायवः ।।५४।। नववधूनिभृतालपितोपमाः परभृतापरिषत्कलनिस्वनाः । पृथगपि प्रभवेयुरयोगिनां विशसने किमुताधिकसंहताः ।।५५।। सुन्दर मुख वाली रमणियों के अधर के समान कोमल नये खिले हुए ये मृदु पल्लव, काली आँखों वाली सुन्दरियों की साँस के समान सुगन्धित मलयगिरि के मित्र ये उपवन के वायु, नवोढा नायिकाओं के एकान्त में बोले गये वचनों के समान मधुर ये कोयलों की सुन्दर कूकें—इनमें से प्रत्येक अलग-अलग भी, विरही जनों को सन्ताप देने में पूर्ण समर्थ है, फिर सबके इकट्ठे मिल जाने पर तो कहना ही क्या ! ।।५४–५५।। विततबहुविधप्रसूनमालां भृततिलकां किल काञ्चनाढ्यभूषाम् । नरपतिरथ निर्ययौ तदानीं दयिततमामिव वोक्षितुं वनालीम् ।।५६।। तब विविध पुष्पों की विस्तृत मालायें धारण करने वाली, तिलक (सौभाग्य चिह्न; एक वृक्ष) से युक्त, सुवर्ण की समृद्धि से भूषित, प्रियतमा के समान लगने वाली, उपवन-वाटिका को देखने के लिये राजा अजयपाल चले ।।५६।। इति सुर्जनचरितमहाकाव्येऽष्टमः सर्गः । (५०) अदीव्यत इत्यत्र दिविरन्तर्भावितण्यर्थः कर्मणि लङ् क्रीडां कारितमित्यर्थः ।
११ नवमः सर्गः अवनीरमणो मनोरमाभिः कियतीभिः कुतुकेन कामिनीभिः । कुसुमाकरकौशलं दिदृक्षुर्निजमाराममथोज्वलं जगाम ॥ १ ॥ राजा अजयपाल कुछ सुन्दर कामिनियों के साथ कौतुकवश वसन्त की शोभा देखने के लिये अपने सुन्दर उपवन में गये ॥ १ ॥ जितपल्लवविभ्रमाः कराग्रैर्विहसन्त्यो नखरोचिषा प्रसूनम् । मुखरैः कलनूपुरैरलीनां दुरहङ्कारमनारतं हरन्त्यः ॥ २ ॥ भणितैरनृतीकृतामृतौघैः कलकण्ठीविरुतानि कुण्ठयन्त्यः । शिथिलां सुरभिश्रियं वितेनुः प्रविशन्त्यः पृषतीदृशो वनान्तम् ॥ ३ ॥ अपने कोमल हाथों से पल्लवों की शोभा हरने वाली, नखों की कान्ति से पुष्पों को मात करने वाली, नूपुरों की मनोहर ध्वनि से भ्रमरों के दुर्मद को सदैव हरने वाली, अमृत के प्रवाह को तुच्छ करने वाले मधुर वचनों से कोयलों की कूक को कुण्ठित करने वाली मृगनयनी कामिनियों ने उपवन में प्रवेश करके वसन्त की शोभा को अपनी शोभा के आगे फीका बना दिया ॥ २-३ ॥ करमर्पयितुं कृतानुबन्धां नवसूनस्तबकेषु वामनेत्राम् । प्रतिषेद्धुमसूयया किमुच्चैः कृतनादं मधुपालिरुच्चचाल ॥ ४ ॥ नये पुष्पों के गुच्छों में (तोड़ने के लिये) हाथ डालने के यत्न में बद्धपरिकर मृगनयनी को ईर्ष्या के कारण मानों मना करती हुई भ्रमरों की पंक्ति उच्च-स्वर से हुंकारती हुई उड़ गई ॥ ४ ॥ अविषह्यमनङ्गकिङ्करीभिः सहकाराङ्कुरभङ्गमङ्गनाभिः । अवलोक्य विदूरमुत्पतन्ती विकला किं पिककामिनी चुकूज ॥ ५ ॥ कामदेव के आधीन स्त्रियाँ आम की नई कोंपल का (कामदेव का धनुष होने के कारण) तोड़ना नहीं सह सकतीं। मानों इसीलिये यह देख कर कोयल दूर उड़ गई और व्याकुल होकर कूकने लगी ॥ ५ ॥ घनकुञ्जतिरोहितं धुवत्यास्तरुमुच्चैः कुसुमाशया युवत्याः । कलकङ्कणझङ्कृतं निशम्य क्षणसंभावितवैशसा सपत्नी ॥ ६ ॥ स्फुरिताधरपल्लवा सकम्पा पवमानोल्लसितेन कापि वल्ली । अरुणं मुखमातपेन भूयोऽप्यरुणिम्नैव तिरोहितं वहन्ती ॥ ७ ॥ द्रुतमुच्चलितुं कृतप्रयत्ना विनिरुद्धा घनवीरुधां वितानैः । सहसावचितैः सह प्रसूनै र्न दुकूलं गलितं विदाञ्चकार ॥ ८ ॥ घने कुंज में छिपे हुये किसी वृक्ष को, फूलों की आशा से, जोर से हिलाती हुई युवती के कंकणों (६) वैशसं ईर्ष्याजन्यक्रोधः ।
८२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् की सुन्दर झनकार सुन कर समीपस्थ लता को, युवती को सपत्नी समझकर, तुरन्त ईर्ष्या हो गई और वह अपने पल्लव-रूपी अधर को फड़काती हुई, वायु से हिलने के कारण मानों क्रोध से काँपती हुई, धूप से लाल मुख को क्रोध की लाली से छिपाती हुई, वेग से चलने के लिये तैयार हुई, किन्तु अन्य घनी लताओं के विस्तार से रोक ली गई; ईर्ष्या से वह इतनी आकुल हो गई थी कि उसे हिलने के कारण सहसा नीचे गिरे हुए अपने फूलों-रूपी वस्त्र तक का ध्यान नहीं रहा ॥ ६-८ ॥ जननावधि सेवितां नितान्तं बत सत्स्वामिवधूमिवान्तराद्राम् । स्वपदव्यसनेऽपि षट्पदाली सुमनःसन्ततिमन्वियाय दूरम् ॥ ९ ॥ विद्वान् पिता की पुत्री, जन्म से ही अच्छी तरह सेवित, दयार्द्रहृदया और सुशीला स्वामिनी के समान जन्म से ही भलीभाँति सेवित, मकरन्द से आर्द्र, और शुभ्र होने के कारण सुन्दर, पुष्पों की पंक्ति के पीछे, अपने स्थान से हटाकर दूर ले जाये जाने पर भी, भ्रमरों
नवमः सर्गः ८३ निपुणं निजदेवमर्चयेति प्रथिताकूतमुदाहृताऽथ सख्या। कुटिलीकृतपाटलान्तनेत्रा वदनेऽस्याः क्षिपति स्म तानि तूर्णम् ॥१५॥ सामने लगे हुए फूलों में से झट पाँच छःफूल तोड़कर मुग्धा वधू ने, प्रियतम के पास होने के कारण, उन्हें हथेली में छिपा लिया। किन्तु किसी सखी ने उसे देख लिया और व्यंग्यपूर्वक कहा— 'इन फूलों से अपने देवता की अच्छी तरह पूजा करो।' इस पर मुग्धा वधू ने, अपनी तिरछी और लाल आँखों से उसकी ओर देखकर, शीघ्र उन फूलों को सखी के मुख पर ही फेंक दिया ॥१४-१५॥ नवखण्डितपल्लवावलीनां क्षरितक्षीरकषायितः क्रमेण। श्रमशीकरजालकेऽबलानां क्षणमस्पन्द इवास गन्धवाहः ॥१६॥ नये कोमल पत्तों के समूहों को तोड़ने के कारण उनमें से निकले हुए रस से सुगन्धित पवन, क्रमशः ललनाओं के श्रमजन्य पसीने की बूंदों के जाल पर, क्षण भर गतिशून्य सा होकर, रुका रहा ॥१६॥ समुदान्समुदायमङ्गनानां श्रमखेदादलसालसञ्चलन्तम्। न विवेद विदूरतां भजन्तं वनलक्ष्मीविनिभालनान् नरेन्द्रः ॥१७॥ उपवन की शोभा देखने में संलग्न होने के कारण, राजा को, परिश्रम के खेद से धीरे धीरे चलने वाले और बहुत दूर तक चले जाने वाले स्त्रियों के समूह का ध्यान नहीं रहा ॥१७॥ अवगाह्य च काननं महीयः सुमुहूर्तादथ देवतासहायः। अवलोकयति स्म लोकपालप्रतिमल्लः कमलाकरं प्रफुल्लम् ॥१८॥ ईन्द्रादि दिक्पालों के समान प्रतापी राजा अजयपाल ने अकेले ही उस बड़े उद्यान के भीतर जाकर सुमुहूर्त में एक कमलों से खिले हुए सरोवर को देखा ॥१८॥ तटसीमनि तस्य वेदिकायां स्फुटकङ्केल्लिनिकुञ्जरञ्जितायाम्। अमृत्ताञ्जनतामयं निनाय स्वदृशोः कामपि भामिनीमपूर्वाम् ॥१९॥ राजा ने उस सरोवर के किनारे पर, खिले हुए अशोक के कुंज से शोभित एक छोटे से चबूतरे पर स्थित, नेत्रों को अमृत के अञ्जन के समान आनन्द देने वाली एक अलौकिक सुन्दरी को देखा ॥१९॥ चिकुरार्पितदिव्यदामगन्धादुपरिष्टात् परितो विवर्तमानैः। शिखिपत्रकृतातपत्रकान्ति कलयद्भिर्भ्रमरैर्निषेव्यमाणाम् ॥२०॥ पतनोत्पतनाकुलद्विरेफं मुहुरुन्मुद्रणमुद्रणाभियोगात्। स्फुरदङ्गुलिमुह्यमानपत्रं कलमयन्तीं कमलं करस्थनालम् ॥२१॥ मदनज्वरमुल्वणानुबन्धं मदनेऽपि प्रसभं निवेशयन्तीम्। नवविभ्रमसंभृतैरपाङ्गै रतिवल्लीदल ताण्डवप्रसङ्गैः ॥२२॥ वह सुन्दरी अपने बालों में लगाई गई अलौकिक पुष्पमाला की सुगन्ध के कारण चारों ओर (१९) कंकेल्लिरशोकः। (२०) शिखिनो मयूरस्य पत्रेण पिच्छेन कृतमातपत्रं येन सः श्रीकृष्णः तस्य कान्तिं शोभां श्यामतामित्यर्थः।
८४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ऊपर मँडराने वाले तथा मयूरपिच्छ रूपी छत्र धारण करनेवाले भगवान् कृष्ण की कान्ति को चुराने- वाले (अर्थात् श्रीकृष्ण के समान श्याम) भ्रमरों द्वारा सेवित थी। वह एक हाथ में कमल की नाल पकड़े हुए थी और दूसरे हाथ से, लीला के कारण, कमल को कभी खोलती और कभी बन्द करती थी जिस कारण कमल पर मँडरानेवाले भ्रमर बार बार गिरने से और उड़ने से आकुल हो- रहे थे और उज्ज्वल उँगलियों द्वारा पखुड़ियों के मर्दन से कमल म्लान हो रहा था। लता के वायु- कम्पित पल्लवों के नाच के समान चञ्चल तथा नवीन हाव भाव से शोभित कटाक्षों द्वारा वह सुन्दरी स्वयं कामदेव को भी काम-ज्वर के उत्कट आवेग का बलपूर्वक शिकार बना रही थी ॥२०-२२॥ वशिनां प्रथमोऽपि पार्थिवेन्द्रः स तदालोकसमानकालमेव। युगपद् विशिखैः प्रसूनकेतोरभवन् मर्मणि पञ्चभि विभिन्नः ॥२३॥ राजा अजयपाल, वशी पुरुषों में अग्रगण्य होने पर भी, उस दिव्य सुन्दरी को देखते ही काम- देव के पाँचों बाणों से एक साथ घायल हो गये ॥२३॥ विनियम्य च मानसं प्रयत्नात् क्षणमक्षोणमतिः पतिः पृथिव्याः। इदमन्तरचिन्तयत् तदानीं बहुभिर्व्याकुलितेन्द्रियो वितर्कैः ॥२४॥ बुद्धिमान् राजा ने बड़े प्रयत्न से अपने चित्त को वश में करके, अनेक तर्क-वितर्कों से व्याकुल मन में इस प्रकार विचार किया ॥२४॥ किमियं वनदेवतैव तावन् मधुलक्ष्मीः किमु लक्षणीयमूर्तिः। वरुणालयसोदरादमुष्माद् वरुणश्रीः सरसः किमुन्ममज्ज ॥२५॥ क्या यह सुन्दरी कोई वनदेवता है? या यह सुन्दर वसन्तलक्ष्मी है? या समुद्र के समान इस सरोवर से वरुण-लक्ष्मी प्रकट हुई है ? ॥२५॥ इदमद्भुतकौशलं विधातुर्मदिराक्षीरमणीयताविधाने। त्रिविष्टपेऽपि सुदुर्लभं प्रतीमः किमुतास्मिन् मसृणे मनुष्यलोके ॥२६॥ यह सुन्दरी सुन्दर रमणियों की रमणीयता के निर्माण में विधाता का अद्भुत कौशल है। ऐसा अद्भुत सौन्दर्य स्वर्ग में भी, हमारे विचार से, अत्यन्त दुर्लभ है, फिर इस अस्थिर मरणशील मनुष्यलोक की तो बात ही क्या ॥२६॥ मधुना मधुरीकृते वनेऽस्मिन् सततं सन्निहितः प्रसूनबाणः। विजने विजरीहरीति तस्य प्रतिकुञ्जं सहधर्मचारिणी वा ॥२७॥ अथवा, वसन्त से मधुर बनाये हुए इस उपवन में कामदेव सदा उपस्थित रहता है, अतः संभव है कि यह उसकी धर्मपत्नी रति हो जो उसके साथ इस उद्यान के कुंजों में विहार कर रही है ॥२७॥ कुसुमाकरशीलिते वनेऽस्मिन् मदनः सन्निहितः सहैव रत्या। रतिरेव विभाव्यते पुरस्तादतनुत्वादपरः परोक्ष एव ॥२८॥ वसन्त से सुशोभित इस उद्यान में कामदेव का रति के साथ विहार करना सर्वथा उचित है। अतः यह सुन्दरी निश्चय ही रति है और कामदेव, शरीररहित होने के कारण, दिखाई नहीं देता।२८।
नवमः सर्गः ८५ स्वयमेव समीपमेत्य तावत् प्रणयप्रश्नपुरःसरं कृशाङ्ग्याः । कुलजातिनिवासचेष्टितानि प्रतिपत्स्ये निखिलानि सावधानः ॥२९॥ मैं स्वयं ही इस कृशांगी के पास जाकर प्रेमपूर्वक प्रश्न करके सावधान मन से इसके कुल, जाति, निवास और कार्य का सारा विवरण प्राप्त कर लूं ॥२९॥ इति चिन्तयति क्षणं क्षितीशे मदनाकूतभरं तरङ्गयन्ती । अविशत् सरसं हृदं तदन्तःकरणं चापि समं सुमध्यमा सा ॥३०॥ जब राजा अजयपाल इस प्रकार सोच ही रहे थे तभी वह सुन्दरी मानों कामदेव के रहस्य को शीघ्र तरंगित करती हुईं उस सरस सरोवर में और साथ ही साथ राजा के सरस हृदय में प्रवेश कर गईं ॥३०॥ अथ रीतिमानुषीममुष्याः प्रविलोक्याकृतिविभ्रमानुरूपाम् । सुविषण्णमना मनोरथानामपि दुष्प्रापमभीप्सितं स मेने ॥३१॥ उसके अलौकिक सौन्दर्य और हाव-भाव के अनुरूप उसका यह अलौकिक व्यवहार देखकर दुःखित-हृदय राजा ने अपने मनोरथों को नितान्त दुष्प्राप्य माना ॥३१॥ स तथागतया तयैव शक्त्या नृपतिर्मर्मणि कीलितः स्मरेण । अवधूय विधेयमात्मनीनं विवशात्मा दिवसान् निनाय शून्यः ॥३२॥ सरोवर में विलीन होनेवाली उस सौन्दर्य-शक्ति के द्वारा हृदय-मर्म में काम-वेदना से पीड़ित राजा अजयपाल विवश होकर अपने सब कर्त्तव्य भूल गये और शून्यमन से दिन बिताने लगे ॥३२॥ धृतिमेतु धृतिः कथं नु तस्मिन् स्थितिरोतिः स्थितिमीहतां कथं वा । स्मृतिभूरतिभूमिमागतोऽयं मतिसंस्थां समतीत्य वर्तते स्म ॥३३॥ जब चरम उत्कर्ष पर पहुँचे हुए कामदेव ने बुद्धि की सीमा को पार कर राजा के हृदय पर आधिपत्य जमा लिया तो फिर राजा कैसे धैर्य धारण करते अथवा शान्तचित्त होकर किस प्रकार स्थित होते ? ॥३३॥ अथ कश्चन भागधेययोगात् मिलितः संसदि सिद्धपूरुषोऽस्य । विनयेन निवेदितो नृपेण प्रणिधाय प्रमना मनाग् बभाषे ॥३४॥ सौभाग्य से एक दिन कोई सिद्धपुरुष राजसभा में आये । राजा के सविनय निवेदन करने पर उन्होंने ध्यान करके, प्रसन्न हो, कुछ इस प्रकार कहा ॥३४॥ [L28
८६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इयमायतकौतुका भ्रमन्ती क्रमतस्ते कमलाकरादधस्तात् । विकचाम्बुजसौरभाद् व्युदस्य द्रुतमम्भांसि कदाचिदुन्ममज्ज ॥३७॥ एक बार कौतुकवश घूमती हुई यह विजया विकसित कमलों से सुगन्धित आपके उद्यान- सरोवर के पानी को हटा कर बाहर निकली ॥३७॥ मधुमासविशेषितामभिख्यामभिवीक्ष्योपवनस्य वामनेत्रा । नवमञ्जुलवेदिकानिषण्णा चिरमासीद् विरतेतरप्रसङ्गा ॥३८॥ वह वसन्त ऋतु से सुशोभित उद्यान की शोभा देखकर, प्रफुल्ल अशोक वृक्षों से रमणीय एक छोटे चबूतरे पर बैठ कर, अन्य बातों को भूल कर, उस उद्यान की शोभा में खो गई ॥३८॥ विशिखैर्विषमायुधस्य तीक्ष्णैः कृतरन्ध्रे हृदि वेदिमध्यमायाः । विहरन् विपिनान्तरे त्वमस्या नयनोपान्तपथेन संप्रविष्टः ॥३९॥ इसके बाद उद्यान में विहार करते हुए आप इस पतली कमर वाली
नवमः सर्गः ८७ स्वमनीषितसाधनाय यत्नादवनीश प्रवणीकृतात्मचेताः । भगवन्तममन्तरायसिद्धिं तमनन्तं त्वमनन्तरं भजेथाः ॥४५॥ राजन् ! अपने मन को सुदृढ़ करके, अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये, आप अब शीघ्र ही प्रयत्न- पूर्वक, निर्विघ्न सिद्धि देने वाले अनन्त भगवान् की उपासना करें ॥४५॥ कतिभिर्दिवसैर्जगन्निवासे वरिवस्याविधिना तव प्रसन्ने । भुवनत्रयमप्यधीनमेतत् किमु पातालतलस्थितैकनारी ॥४६॥ कुछ दिनों में ही आपकी सेवाविधि से जगन्निवास परमेश्वर के प्रसन्न हो जाने पर, तीनों लोक आपके अधीन हो सकते हैं फिर पाताल लोक में रहने वाली एक स्त्री की तो बात ही क्या ? ॥४६॥ गिरमित्थमुदीर्य सोपदेशां स दिशं स्वाभिमतां जगाम सिद्धः । परमेशमुपास्य पार्थिवोऽपि प्रमनाः प्रार्थितलाभतो बभूव ॥४७॥ इस प्रकार उपदेशयुक्त वचन कहकर वे सिद्ध पुरुष अपनी वांछित दिशा की ओर चले गये । राजा अजयपाल भी परमेश्वर की उपासना करके वांछित लाभ हो जाने से प्रसन्न हो गये ॥४७॥ अथ यस्य जलाशयस्य तीरे तरुणीं तां नयनातिथीचकार । परवानिव निममज्ज दूरं विहरन्नम्भसि तस्य भूमिपालः ॥४८॥ फिर उसी सरोवर के तीर पर जाकर, जहाँ उन्होंने उस तरुणी को देखा था और विवश से हो गये थे, राजा अजयपाल पानी में डुबकी लगाकर दूर तक घुस गये ॥४८॥ क्षणतः पृथुपन्नगोत्तमाङ्गोल्लसदुत्तुङ्गमणीमयूखजालैः । अपहस्तितपीवरान्धकारं फणिलोकं स विलोकयाञ्चकार ॥४९॥ क्षण भर बाद ही उन्होंने, बड़े-बड़े सर्पों के मस्तकों में चमकने वाली विशाल मणियों के किरण-समूह से अन्धकार को दूर करनेवाले, नागलोक को देखा ॥४९॥ वदनैर्मदनैकतानिदानैर्विलसत्पन्नगनारीजनानाम् । इतरेतरविस्मयाज्जगत्यां शशिनैकेन कृतार्थतां प्रपन्ने ॥५०॥ रजनीशदिनेशयोरयोगाद्विनिर्धारितवासरत्रियामे । अनिशं सरसीरुहं सहासं मुदिता यत्र निरन्तरं रथाङ्गाः ॥५१॥ उज्ज्वल सर्प-युवतियों के कामदेव को अत्यन्त जाग्रत् करने वाले अनेक चन्द्रमुखों से कृतार्थ नागलोक मानों एक ही चन्द्रमा से कृतार्थ हो जाने वाले मर्त्यलोक की हँसी कर रहा हो । चन्द्रमा और सूर्य के न होने के कारण नागलोक में दिन और रात का पता ही नहीं चलता था। अतः वहाँ कमल सदैव खिले रहते थे और चकवा चकवी सदैव साथ-साथ रहने के कारण प्रसन्न रहते थे ॥५०-५१॥ (५०-५१) जगत्यां मर्त्यलोके एकेनैव शशिना प्रकाशितायां सत्यामितरेतरविस्मयात् विलसन्तीनां पन्नग- नागरीजनानां मदनैकतानिदानैश्चन्द्रोपमैरनेकवदनैश्चन्द्राभावेऽपि कृतार्थतां प्रपन्ने नागलोके चन्द्रसूर्ययोरयोगा- द्विनिर्धारितरात्रिदिवसविभागे कमलानि निरन्तरं विकसन्ति चक्रवाकमिथुनानि च वियोगाभावे निरन्तरं प्रसन्नानि सन्तीत्यर्थः।
८८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इतरत्र यदर्जितं तपोभिः सुकृतं विस्मृतकैतवप्रपञ्चैः । फलमस्य महार्हमश्नुवानाश्चिरकालं निवसन्ति यत्र जीवाः ॥५२॥ अन्य लोकों में निश्छल तपस्या के द्वारा जो पुण्य प्राप्त किया था उसका महान् फल भोगने के लिए जीव चिरकाल तक नागलोक में निवास करते थे ॥५२॥ न जराकृतवैकृतप्रसङ्गो न च विच्छेदविभीषिकावकाशः । मिथुनस्य मिथोऽनुरागबन्धो नितरां यत्र निरामयश्चकास्ति ॥५३॥ न वहाँ वृद्धावस्था के कारण शरीर में विकृति होती थी और न वियोग के भीषण दुःख का अवकाश था। वहाँ दम्पति स्वस्थ परस्पर प्रेमानुराग से युक्त रहते थे ॥५३॥ वनिताऽऽस्यनिशाकरैरसङ्ख्यैर्बहुभिर्भोगिफणामणीदिनेशैः । उपरिस्थितियोग्यतां दधानं किमिवाधोभुवनं बुधास्तदाहुः ॥५४॥ सुन्दरीयों के मुखरूपी अनेक चन्द्रों से और सर्पों के फणों पर स्थित मणिरूपी अनेक सूर्यों से शोभित नागलोक के सब लोकों से ऊपर होने पर भी, विद्वान् जाने क्यों उसे नीचे का लोक कहते हैं ! ॥५४॥ स ददर्श दुरासदं समन्तात् किरणैस्तत्र शशाङ्ककोटिकल्पैः । हिमशैलमिव द्वितीयमुर्वीतलमाविश्य पुरो विरोचमानम् ॥५५॥ परितः खचिते प्रवालमुक्तामणिमाणिक्यमहेन्द्रनीलहारैः । स्थितमुज्ज्वलशातकुम्भपट्टे मृदुपट्टाम्बरसंस्तराभिरामे ॥५६॥ प्रगुणीकृतकान्तिमुन्मयूखैर्मणिभिः स्फारफणोपरि स्फुरद्भिः । जगतः प्रलयं विधातुमग्रे निजदेहे निहितैरिवांशुमद्भिः ॥५७॥ मुखमुज्वलमेककुण्डलेन श्रमदालोहितलोचनं दधानम् । अलिभिः कलिभिन्नसाहचर्यैः परिवेषायितमास्थितैः परीतम् ॥५८॥ स्फटिकाभवपुःप्रभापरीतं वसने नीलिमधामनी दधानम् । नवनीलसरोजकाननाभ्यामिव गीर्वाणतरङ्गिणीप्रवाहम् ॥५९॥ अवलोक्य तमद्भुताभिरामं स भृशं संभ्रमसंभृतः सभायाम् । प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः फणीन्द्रं विनिबद्धाञ्जलि दूरतोऽवतस्थे ॥६०॥ राजा अजयपाल ने अपने सामने ही स्थित सर्पों के राजराजेश्वर शेषनाग को देखा। वे करोड़ों चन्द्रमाओं की किरणों के समान प्रकाश की किरणों से जगमगा रहे थे और धरातल को फोड़ कर पाताल लोक में प्रकट द्वितीय हिमालय के समान शोभित हो रहे थे। वे कोमल रेशमी वस्त्रों की चादरों से सज्जित और चारों ओर मूंगे, मोती, हीरे, माणिक और नीलम के हारों से जड़े हुए देदीप्यमान सुवर्ण-सिंहासन पर विराजमान थे। अपने फैले हुए फणों पर जगमगाने (५७) प्रलये द्वादशादित्या आविर्भवन्तीत्यागमः । (५८) कलिना कलियुगेन भिन्नं विरहितं साहचर्यं सम्बन्धो येषां तैः। परिवेषायितमास्थितैः परिवेषं मंडलं प्राप्तैः ।
१२ नवमः सर्गः ८९ वाले मणियों की किरणों के कारण उनका तेज कई गुना बढ़ गया था—वे मणि क्या थे मानों विश्व का भावी प्रलय करने के लिये उन्होंने अपने शरीर में सूर्य रख रक्खे थे (प्रलय के समय द्वादश आदित्य उदित होते हैं) । वे एक कुंडल लगा कर (कुंडलाकार होकर) विराजमान थे और उनका मुख घूमते हुए लाल नेत्रों से शोभित था। (उनके मुख के सौरभ से आकृष्ट) कलि- युग से कोई सम्पर्क न रखनेवाले भ्रमर उनके चारों ओर परिधि बना कर स्थित थे। शुभ्र संगमरमर के समान कान्तिवाले शरीर पर दो नीले वस्त्र पहने हुए वे ऐसे शोभित हो रहे थे मानों दोनों तटों पर विकसित नीलकमलों के उपवनों के बीच गंगा जी का शुभ्र प्रवाह हो। राजा अजयपाल उन अद्भुत सौन्दर्यवाले शेषनाग को सभा में विराजमान देखकर अत्यन्त चकित हो गये और बार बार उनको प्रणाम करके, हाथ जोड़, दूर खड़े हो गये ॥५५-६०॥ अथ तं करुणाञ्चितेन किञ्चिन्नृपमालोक्य दृगञ्चलेन देवः । समचारयदीषदन्तिकस्थे भ्रुवमेकां भुजगे सुदामनाम्नि ॥६१॥ भगवान् शेषनाग ने करुणा-युक्त दृष्टि से थोड़ी देर राजा को देखा और फिर समीपस्थ सुदामा नामक सर्प पर थोड़ी दृष्टि डाली ॥६१॥ स तथेति तदिङ्गितं तदानीमभिनन्द्य द्रुतमेव काद्रवेयः । निजमालयमानयन् मनीषी बहुमानेन मनुष्यदेवमेतम् ॥६२॥ वह बुद्धिमान् नराकार सर्प सुदामा, 'जो आज्ञा' कहकर शेषनाग के संकेत का अभिनन्दन कर, राजा अजयपाल को अत्यन्त सम्मानपूर्वक अपने घर ले गया ॥६२॥ अतिथेः क्षितिलोकवासिनोऽस्य प्रभुणेव प्रथमं समर्थितस्य । उचितं रचयाञ्चकार यत्नान्नरनाथस्य समर्हणं सुदामा ॥६३॥ शेषनाग द्वारा पहले ही समर्थन किये हुए इन मर्त्यलोकवासी अतिथि राजा का सुदामा ने यत्नपूर्वक समुचित सत्कार किया ॥ ६३॥ अवतीर्णममुं कुतोऽपि लोकादपरं मन्मथमेव मन्यमानाः । परिवव्रुरवारिताभियेगा नगरस्था वरवर्णिनीसमूहाः ॥६४॥ किसी दूसरे लोक से आये हुए इन अतिथि को दूसरा कामदेव समझकर नगर की सुन्द- रियों के समूहों ने इन्हें घेर लिया ॥६४॥ विजया निजया ह्रिया निरुद्धा निजसौधस्य निषेव्य चन्द्रशालाम् । नयने विततीकृते कृशाङ्गी बत वातायनवर्त्मनि न्यधत्त ॥६५॥ कृशांगी विजया अपनी स्वाभाविक लज्जा के कारण सम्मुख नहीं आकर अपने महल की चन्द्रशाला (ऊपरी भाग) में चली गई और वहाँ खिड़की की जालियों में अपने फैलाये हुए नेत्र रख कर राजा को देखने लगी ॥६५॥ उपलभ्य च दर्शनं तदानीं तदसंभाव्यतरं मनुष्यभर्तुः । समरोपयदात्मजीविताशालतिकामुच्छ्वसिते पुनः स्वचित्ते ॥६६॥ फिर राजा अजयपाल का अत्यन्त दुर्लभ दर्शन प्राप्त करके विजया ने आनन्द की गहरी साँस ली और मुरझाई हुई जीवन की आशा-लता का अपने प्रसन्न चित्त में आरोपण किया ॥६६॥ (६२)काद्रवेयः नराकृतिसर्पः ।
९० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अपनीतपरिश्रमं कदाचित् प्रणयेन प्रवणीकृतं फणी सः। तमनुक्रमविकलमादपृच्छत् कुलनामाश्रयदेशकाङ्क्षितानि ॥६७॥ राजा की थकावट दूर हो जाने के बाद स्नेह से उन्हें आश्वस्त करके सुदामा ने, क्रम का ध्यान न रखकर, राजा से उनके कुल, नाम, आश्रय, देश और इच्छा के विषय में प्रश्न किये ॥६७॥ मिलितः पृथिवीपतिं पृथिव्यां कृपया यः समशिक्षयद् विधेयम्। भुवनानि परिभ्रमन् स सिद्धः पुरुषः प्रादुरभूत् तयोः पुरस्तात् ॥६८॥ वे सिद्ध पुरुष, जो राजा को पृथ्वी पर मिले थे और जिन्होंने राजा को इच्छा-पूर्ति का साधन बतलाया था, लोकों में घूमते-फिरते, उन दोनों के सामने आ खड़े हुए ॥६८॥ अथ संभ्रमतः समुच्छिताभ्यां कृतपादग्रहणस्तदा स ताभ्याम्। उपविश्य विशेषवित् सुदाम्ने नृपतेः कृत्स्नममुदाजहार वार्ताम् ॥६९॥ तब उन दोनों ने जल्दी-जल्दी उठकर उन सिद्ध पुरुष को पैर छूकर प्रणाम किया। फिर बैठ कर, सब कुछ जानने वाले उन सिद्ध पुरुष ने सुदामा को राजा का सारा हाल सुनाया ॥६९॥ अथ भगवदनुग्रहेण साक्षान्निरुपमरूपनिरूपणेन चास्य। गुणसमुदयमाकलय्य तस्मान् नरपतये तनयां ददौ सुदामा ॥७०॥ इसके बाद भगवान् के अनुग्रह से, राजा अजयपाल का अनुपम रूप देखकर और उनके गुण- समूहों का विचार करके, सुदामा ने राजा को अपनी कन्या दे दी ॥७०॥ स्मरस्य स्वारस्यात् समुचितसमारम्भकृतिनः समानेन प्रेम्णा मिलितमनयोर्यौवनजुषोः। विधित्सुः स्तम्भादिव्यवसितविशेषेण घटयन्- नुदारं दाम्पत्यं समगत समग्रेण यशसा ॥७१॥ समुचित जोड़ी मिलाने में कुशल कामदेव के स्वारस्य के कारण परस्पर समान प्रेम रखने- वाले इन युवक-युवती का मेल कराने के इच्छुक सुदामा ने, विवाह-मण्डप आदि विशिष्ट सामग्री द्वारा इन दोनों का उदार दाम्पत्य रचकर, सम्पूर्ण यश प्राप्त किया ॥७१॥ अथाभिवाद्य क्षितिपः स मान्यान् सुदामपुत्र्यां समुदा समेतः। प्रसेदुषः पन्नगलोकभर्तुर्निदेशतः स्वां नगरीं जगाम ॥७२॥ फिर उन राजा अजयपाल ने, प्रसन्न सुदामा-पुत्री विजया के साथ, मान्य लोगों का अभि- वादन किया और प्रसन्न होनेवाले नागलोक के राजराजेश्वर शेषनाग की आज्ञा लेकर वे स्त्री सहित अपनी नगरी को लौट आये ॥७२॥ भुक्त्वाऽवनिञ्चिरमवञ्चितयाचकोऽयं यास्यन् वनान्तपदवीमथ यौवनान्ते। आसञ्जयद् विजयिनों क्षितिपाललक्ष्मीं पुत्रे गुणोदयगरीयसि गङ्गदेवे ॥७३॥ याचकों को कभी विमुख न करने वाले राजा अजयपाल ने चिरकाल तक साम्राज्य का उप- भोग करके, वार्धक्य में वानप्रस्थ आश्रम को ग्रहण करने की इच्छा से, विजयशील साम्राज्य की लक्ष्मी को गुणों के उदय से श्रेष्ठ अपने पुत्र गङ्गदेव को सौंप दिया ॥७३॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये नवमः सर्गः। (७१) स्तम्भादिव्यवसितविशेषेण विवाहमण्डपादिसामग्रीविशेषेण। समगत संगतोऽभूत्।
दशमः सर्गः जज्ञे नृदेवादथ गङ्गदेवात् सोमेश्वरो नाम समः स्मरेण । राज्यं गुणप्राज्यमनुक्रमज्ञः क्रमागतं यः सुमुखः शशास ॥ १ ॥ राजा गङ्गदेव के कामदेव के समान सुन्दर सोमेश्वर नामक पुत्र उत्पन्न हुए जिन्होंने क्रमा- नुसार कुलपरम्परागत समृद्ध राज्य का शासन किया ॥ १ ॥ प्रलम्बबाहुः परिणाहिवक्षाः प्रलम्बवैरिप्रतिमल्लमूर्तिः । विहारभूमिर्विजयस्य भूमाविहाऽरविन्दप्रभवेन सृष्टः ॥ २ ॥ सोमेश्वर आजानुबाहु, चौड़े वक्षःस्थल वाले, बलदेव के समान वीर थे। उनको ब्रह्मा जी ने मानों पृथ्वी पर विजय की विहार-भूमि के रूप में निर्मित किया था ॥ २ ॥ स्वभावरम्येण मनोजमैत्रीं स्वभाबलेनाऽविरतं दधानम् । विभावयन्ति स्म निभालयन्त्यो विभावरीकान्तममुं सुमध्याः ॥ ३ ॥ स्वभाव से ही सुन्दर अपनी आभा के कारण निरन्तर कामदेव से मित्रता रखनेवाले राजा सोमेश्वर को दखकर रमणियाँ उन्हें चन्द्रमा (सोम) ही समझती थीं ॥ ३ ॥ ० शकुन्तलाऽऽभां गुणरूपशीलैः स कुन्तलानामधिपस्य पुत्रीम् । कर्पूरधारां जनलोचनानां कर्पूरदेवीमुदुवाह विद्वान् ॥ ४ ॥ विद्वान् सोमेश्वर ने कुन्तल देश के राजा की कन्या कर्पूरदेवी का, जो गुण, रूप और शील में शकुन्तला के समान थी और लोगों के नेत्रों को कपूर की धारा के समान आनन्द देती थी, पाणिग्रहण किया ॥ ४ ॥ लावण्यपूर्णामृतपुण्यवेणी मनोभुवो मूर्तिमती प्रशस्तिः । आसीत् कलानामधिदेवता सा विनोदभ
१२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् असूयताऽसौ सुतनुस्तनूजौ जयप्रभावाविव विक्रमार्द्धिः । नृपस्तयोः पूर्वजमाह पृथ्वीराजं स माणिक्यमथानुजातम् ॥ ७ ॥ जैसे पराक्रमशक्ति विजय और प्रभाव को उत्पन्न करती है वैसे ही सुन्दरी कर्पूरदेवी ने दो पुत्रों को जन्म दिया जिनमें बड़े का नाम, राजा सोमेश्वर ने, पृथ्वीराज और छोटे का नाम माणिक्यराज रक्खा ॥ ७ ॥ गुणैर्महाघ्यैर्महसा यशोभिरन्योन्यसाधर्म्यमुभौ दधानौ । सौभ्रात्रसम्पादितशुद्धचित्तावैवयं दधाते स्म यथाश्विनेयौ ॥ ८ ॥ पृथ्वीराज और माणिक्यराज दोनों भाई बहुमूल्य गुणों में, तेज में और यश में एक दूसरे के समान थे और दोनों, भ्रातृप्रेम से विशुद्ध अन्तःकरण वाले होने के कारण, अश्विनीकुमारों की भाँति, एक से लगते थे ॥ ८ ॥ विभज्य राज्यं भुजवीर्यभाजौ पित्रा प्रणीतं प्रतिपालयन्तौ । निशाकरार्काविव न स्वकीयमतीयुतुस्तौ समयं कथञ्चित् ॥ ९ ॥ श्रेष्ठ बाहुबल वाले उन दोनों भाइयों ने पिता के दिये हुए राज्य को आपस में बाँट कर शासन किया और सूर्य तथा चन्द्र के समान कभी एक दूसरे के समय का उल्लंघन नहीं किया ॥ ९ ॥ पित्रार्पितायामवितृप्तचेताः सम्प्रद्य प्राप्तगुणप्रकर्षः । ज्यायांस्तयोः सन्ततमात्मतेजःसमृद्धिसाध्यां विभुतामियेष ॥१०॥ बड़े भाई पृथ्वीराज ने, अपने गुणप्रकर्ष के कारण, पिता के दिये हुए साम्राज्य से सन्तुष्ट न होकर, अपने स्वयं के पराक्रम से अधिक साम्राज्य प्राप्त किया ॥१०॥ पुरो बहिः क्वापि विहारभूमौ वसन्तमेनं प्रतिहारपत्नी । समागतां काञ्चन कान्यकुब्जात् प्रावेदयत् पार्श्वचरीं प्रगल्भाम् ॥११॥ एक दिन जब पृथ्वीराज अपने नगर के बाहर उद्यानभूमि में विहार कर रहे थे तब प्रतिहारी ने निवेदन किया कि कान्यकुब्ज (कन्नौज) देश से आई हुई एक चतुर महिला मिलना चाहती है ॥११॥ तदिङ्गितेनाधिगतप्रवेशा विधाय शश्वन् नृपतौ प्रणामम् । पृष्टा समाचष्ट समाहिताऽसौ हितार्थिनी भर्तुरथात्मजायाः ॥१२॥ राजा के संकेत से अनुमति पाकर प्रतिहारी ने उस महिला को भीतर प्रविष्ट किया । उसने राजा को प्रणाम करके, पूछे जाने पर, सावधानी से, अपने स्वामी की पुत्री के हित के लिये इस प्रकार निवेदन किया ॥१२॥ यमश्ववारा नवलक्षसङ्ख्याः सङ्ख्यास्वसङ्ख्येयगुणं भजन्ते । कन्या ततोऽजायत कान्यकुब्जक्षितीश्वरात् कान्तिमतीति नाम्ना ॥१३॥ जिनकी संख्या की कोई गणना नहीं ऐसे गुणों से युक्त और नौ लाख घुड़सवारों की सेना के स्वामी कान्यकुब्ज देश के राजा की कान्तिमती नामक कन्या है ॥१३॥
दशमः सर्गः ९३ सुवर्णशैलात् पृथिवीविभागं पयांसि पीयूषपयोधिमध्यात् । तेजः शरच्छीतमरीचिबिम्बाच्छ्रीखण्डशैलानिलतस्तदंशम् ॥१४॥ आकाशमाकृष्य पुनः स्वकीयतूणीररन्ध्रान् निजनैपुणेन । विनिर्ममे काचन सृष्टिरन्या मन्ये मनोजेन मनोहरा सा ॥१५॥ उस कान्तिमती को मानों कामदेव ने, स्वर्णमय सुमेरु पर्वत से पृथ्वी का भाग लेकर, अमृत- समुद्र से जल का भाग लेकर, शरद् ऋतु के पूर्ण चन्द्रबिम्ब से तेज का अंश लेकर, (चन्दनों से सुशोभित) मलयगिरि के पवन से वायु का अंश लेकर और अपने तरकस के भीतर से आकाश का अंश निकालकर इन अपूर्व पंच महाभूतों से, अपनी निपुणता को सिद्ध करने के लिए एक अद्वि- तीय सुन्दरी के रूप में रचा है ॥१४-१५॥ निर्माय तां मन्मथजैत्रसिद्धिमाकृष्टसारा विधिना पदार्थाः । ये न्यक्कृताः किन्नु त एव जाताः सुधासुधांशूत्पलपङ्कजाद्याः ॥१६॥ अथवा, स्वयं ब्रह्मा ने कामदेव की विजयसिद्धि के रूप में उसका निर्माण विविध पदार्थों का सार निकाल कर किया और जिन-जिन पदार्थों का सार निकाल कर उन्हें फेंक दिया शायद वे पदार्थ ही लोक में अमृत, चन्द्रमा, कुमुद, कमल इत्यादि नामों से प्रसिद्ध हुये !।१६॥ सुधामयः कोपि भवेत् पयोधिर्मथ्नाति तञ्चेत् स्वयमेव कामः । जायेत चेत् काचन तत्र लक्ष्मीः समानतामृच्छति सैव तस्याः ॥१७॥ यदि कोई अमृत का समुद्र हो और यदि स्वयं कामदेव उसका मन्थन करे और फिर उसमें से कोई लक्ष्मी प्रकट हो तो वह लक्ष्मी ही कान्तिमती की कुछ समानता कर सकती है ॥१७॥ एकैककर्मण्युचिते समर्थाः संमोहना ये मदनस्य बाणाः । इयन्तु तस्य स्फुटयत्यजस्रं कर्माद्भुतं मार्गणपञ्चकस्य ॥१८॥ कामदेव के पाँचों बाण अलग-अलग अपने एक-एक संमोहन कर्म में ही समर्थ हैं, किन्तु यह कान्तिमती तो कामदेव के पाँचों बाणों की एक साथ पाँचों संमोहन कर्मों में निपुण अद्भुत- शक्ति है ॥१८॥ अभ्याशमभ्यासवशाद् गतायाः पितुः कदाचित् तनुमध्यमायाः । कर्णान्तरस्या विविशुस्त्वदीया गुणोच्चयाश्चारणगीयमानाः ॥१९॥ अभ्यासवश एक दिन जब कान्तिमती अपने पिता के पास बैठी हुई थी तब चारणों द्वारा गाए गए आपके गुणसमूहों ने इसके कानों में प्रवेश किया ॥१९॥ सा वर्तमाना तरुणिम्नि नव्ये कामेव धत्तेऽङ्कुरितामवस्थाम् । येते निगूढान्यपि मानसानि निगूहितुं सन्ततमीहितानि ॥२०॥ कान्तिमती नई तरुणावस्था (नवयौवन) में स्थित होकर एक अद्वितीय (कामदेव द्वारा) अंकुरित अवस्था को धारण कर रही है। वह (लज्जावश) मन में छिपी हुई इच्छाओं को भी बार बार छिपाने का यत्न करती है ॥२०॥
९४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् निजेन्द्रियेभ्योऽपि निगूह्यमानं गाहेत कोऽन्तःकरणं कुमार्याः । अनन्यजन्माऽयमनन्यवृत्तिरुपायतौ यन् मतिमानुपास्ते ॥२१॥ स्वयं अपनी ही इन्द्रियों से भी छिपाये हुए (भावों वाले) कुमारी के अन्तःकरण को कौन जान सकता है ? स्वयं आत्मभू बुद्धिमान् कामदेव, शरीर-रहित होने पर भी, अन्य सब कार्य छोड़ कर बड़े यत्नपूर्वक, कुमारी के अन्तःकरण में प्रवेश पाने के लिये, उपासना किया करता है ॥२१॥ कलाविलासेऽप्यलसं कृशाङ्ग्याः ससञ्ज नालञ्जनरञ्जनाय । क्रीडाविनोदेषु विनोदितायाः सखीसमाजे न ससज्ज चेतः ॥२२॥ कृशांगी कान्तिमती का चित्त, कलाविलास में भी आलस धारण करके, लोगों को प्रसन्न न कर सका और सखीसमाज में भी, क्रीडा और विनोद से सखियों द्वारा कान्तिमती को प्रसन्न करने का प्रयत्न करने पर भी, इसका चित्त प्रसन्न न हो सका ॥२२॥ दिने दिने दूनधियो नताङ्ग्याः प्रपद्यमानं परिपाण्डिमानम् । सुवर्णपङ्केरुहकान्तिवक्त्रं बभूव दुर्वर्णसरोजवर्णम् ॥२३॥ (विरह में) दुःखित मन वाली कृशांगी का दिन-दिन पीला पड़ने वाला मुख, जो पहले खिले हुए स्वर्ण-कमल के समान था, अब मुरझाये हुये पीले कमल के समान हो गया है ॥२३॥ प्रतिक्षणं क्षामतरीभवन्त्या भवत्कृते पाण्डरदीर्घमस्याः । चकर्ष कृष्णप्रतिपन्मृगाङ्कबिम्बस्य कान्तिं मुखमुत्पलाक्ष्याः ॥२४॥ आपके विरह में प्रतिक्षण दुबली होने वाली कमलनयनी कान्तिमती का पीला और लटका हुआ मुख, कृष्णपक्ष की प्रतिपदा के (दिन-दिन ह्रास होने वाले) चन्द्रबिम्ब के समान लग रहा है ॥२४॥ जानौ कफोणि शिथिले कपोलं कराम्बुजन्मन्थ नासिकायाम् । विधाय दृष्टिं त्वयि चित्तवृत्तिं निनाय दीना कतिचिद् दिनानि ॥२५॥ घुटने पर कुहनी, ढीले और दुर्बल कर-कमल पर गाल, नाक पर दृष्टि और आप में मन रख कर बिचारी कान्तिमती किसी तरह कुछ दिन निकाल रही है ॥२५॥ अथैकदा कन्दलितानुरागा यामे तुरीये किल यामवत्याः । स्वप्नान्तरे कञ्चन पञ्चबाणसमानकान्तिं सुमुखी ददर्श ॥२६॥ एक बार सुमुखी कान्तिमती ने, अनुराग बढ़ जाने के कारण, रात के तीसरे पहर में स्वप्न में कामदेव के समान सुन्दर किसी पुरुष को (आपको) देखा ॥२६॥ ततस्तदीयाननपूर्णचन्द्रविलोचनान् मानसमिन्दुमुख्याः । विमुक्तमर्यादमभूत् तरङ्गैर्गभीरमप्यम्बु यथाम्बुराशेः ॥२७॥ तब आपके मुखरूपी पूर्णचन्द्र के दर्शन करने से चन्द्रमुखी कान्तिमती का मानसरोवर के समान गंभीर मन, पूर्णचन्द्र के दर्शन करने से ज्वार आए हुए समुद्र के गंभीर जल के समान, बड़ी-बड़ी तरंगों से उद्वेलित होकर मर्यादा छोड़ बैठा ॥२७॥ (२१) अनन्यजन्मा कामः।
दशमः सर्गः ९५ कुण्ठं विवेकाङ्कुशमाशु कृत्वा व्रीडाख्यवारां विघटय्य दूरात् । छित्वा तदन्तःस्थितिशृङ्खलाञ्च बभ्राम कन्दर्पमदद्विपेन्द्रः ॥२८॥ कान्तिमती का मदनमद-रूपी मदोत्कट हाथी, विवेक-रूपी अंकुश को कुंठित समझ कर (कुछ न गिन कर), तथा शीघ्र लज्जा-रूपी बन्धन-स्थान को दूर से ही तोड़-फोड़ कर और पैरों में बँधी हुई शान्तभाव-रूपी लोह-शृङ्खला को आमूल उखाड़ कर, निरंकुश और उच्छृंखल घूमने लगा ॥२८॥ मृगीदृशा संसदि सङ्गिनीनां हासप्रसङ्गे विहितं तया यत् । शुष्काधरे शीर्णरुचिस्मितं तन् नालं कपोलस्य विकासनाय ॥२९॥ सखी समाज में, हँसी मजाक के प्रसंग में, मृगनयनी कान्तिमती ने अपने सूखे होठों पर जो दिखावटी मुसकान लाने का यत्न किया, उस मुसकान से उसका गाल भी विकसित न हो पाया ॥२९॥ कुशेशयाक्षी निशि निःशलाके यदश्रुपूरं विजहौ निषण्णा । उच्छूनशोणेक्षणमज्जनेन स्नातं तदावेदयदाननाब्जम् ॥३०॥ कमल-नयनी कान्तिमती रात में एकान्त स्थान में बैठ कर जो आँसुओं की धारा बहाती है उसे सूजी हुई लाल आँखों के जल में स्नान करने वाला मुख-कमल बतलाता है ॥३०॥ न्यस्तं स्तनान्ते तनुमध्यमाया बलात् सखीभिर्नलिनीपलाशम् । तदूष्मणा तत्क्षणमेव शीर्णं निःश्वाससंक्षापवनैर्विकीर्णम् ॥३१॥ पतली कमर वाली कान्तिमती के स्तनों के बीच में सखियों ने जो कमल-पत्र रक्खा वह तत्काल विरह-ताप से सूख गया और गहरी साँसों के वेग से टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया ॥३१॥ मृणालजालं यदि नाम तीव्रतापेन नीयेत न नीलिमानम् । निश्चीयतां निश्चलदेहवल्ली कथं नु तस्मिन् मिलिता मृगाक्ष्याः ॥३२॥ कमलपत्रों की सेज यदि विरह के उग्र ताप से मुरझा कर नीली न पड़ जाय तो इसका निश्चय कैसे हो कि मृगनयनी कान्तिमती की निश्चल देह-लता उस पर सोई थी ? ॥३२॥ निर्बन्धपृष्टाऽपि न सन्दधाति प्रश्नानुरूपोत्तरमातुरा सा । बाष्पाम्बुरुद्धार्धपदं कदाचित् स्वयं गृणीते तव नाम तन्वी ॥३३॥ प्रेमपूर्वक कुशल प्रश्न पूछे जाने पर भी व्याकुल कान्तिमती प्रश्नानुकूल उत्तर नहीं दे पाती । दुबले-पतले शरीरवाली वह कभी-कभी आपका नाम लेने का प्रयत्न करती है, किन्तु आँसुओं के जल से कंठ रुँध जाने के कारण आधा नाम ही मुख से निकल पाता है ॥३३॥ ऋज्वी यदीन्दोश्चरमा कला स्याद् यद्युष्णभावं च भजेदभीक्ष्णम् । तदा मनोजाग्नितनूकृतायास्तनोरमुष्यास्तुलनामुपैति ॥३४॥ यदि चन्द्रमा की अन्तिम कला सरल (सीधी) हो और सदा उष्ण बनी रहे तो वह कामाग्नि से तप्त और क्षीण कान्तिमती के शरीर की समानता कर सकती है ॥३४॥ (२८) वारी गजबन्धनस्थानम् । (३०) रात्रौ विजने निषण्णया सरोजलोचनया यद् रुदितं तस्मात् तदीय मुखकमलं शोथं प्राप्तयोर्लोहित- योर्नेत्रयोरश्रुप्रवाहे आत्मानं कृतस्नानं न्यवेदयत् ।
९६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सर्वेन्द्रियाणि प्रतिपत्तिशून्यान्यस्या दधत्याः सततं वयस्याः । विलोचनोन्मीलनमीलनाभ्यां प्रबोधमूर्च्छे परमुन्नयन्ति ॥३५॥ कान्तिमती की सब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने में निश्चेष्ट हैं। इसकी सखियाँ केवल इसके नेत्रों के खुलने और बन्द होने से जागरण और मूर्च्छा का अनुमान लगाती हैं ॥३५॥ अवाप्तदाहस्तनुते स्म दाहं मूर्च्छाङ्गतोऽसौ व्यतरच्च मूर्च्छाम् । मन्ये मनोभूरतनूत्वमस्यै निजं पदं दित्सति सेव्यमानः ॥३६॥ इसकी सेवा से प्रसन्न होकर कामदेव अपनी वस्तुएँ इसे दे रहा ह—कामदेव को शिवजी के तृतीय नेत्र से दाह मिला था, अतः वह कान्तिमती को (पूर्वराग) दाह दे रहा है। उसे (दाह के बाद) मूर्च्छा मिली थी, अतः वह इसे भी मूर्च्छा दे रहा है। कामदेव स्वयं शरीर-रहित है, अतः अत्यन्त प्रसन्न होकर अब वह कान्तिमती को भी अपने समान ही शरीर-रहित बनाना चाहता है ॥३६॥ अत्रान्तरेऽरुन्तुदमन्यदेव दैवेन वैमुख्यभृतोपनीतम् । जामातरं प्रार्थयते प्रतीपो राजन्यमन्यं जनको यदस्याः ॥३७॥ इसी बीच में विमुख विधाता ने एक मर्म-स्पर्शी घटना खड़ी कर दी है। वह यह कि कान्ति- मती के पिता, इसके शत्रु बनकर, एक दूसरे राजा को अपना जामाता बनाना चाहते हैं ॥३७॥ अथातिरेकस्रवदस्त्रवर्षैराप्लावयन्ती वपुरुष्णमुष्णैः । प्रत्येकमाभाष्य सखीः कथञ्चिच्छनैर्बभाषे करुणं कुमारी ॥३८॥ तब दुःख के आवेग से बहनेवाले गरम आँसुओं की वृष्टि से अपने गरम शरीर को सींचती हुई कान्तिमती प्रत्येक सखी को निर्दिष्ट कर किसी प्रकार धीरे-धीरे करुणस्वर से बोली ॥३८॥ अहो महामोहजविभ्रमोऽयं व्योमस्थितेन्दोः परिशीलनाय । रसातलावस्थितपञ्जरान्तःस्थिता चकोरी कुरुते यदाशाम् ॥३९॥ अहो ! पृथ्वी पर स्थित पिंजरे में बन्द चकोरी की आकाश में स्थित चन्द्रमा को प्राप्त करने की आशा कितने बड़े अज्ञान से उत्पन्न मूर्खता की बात है ! ॥३९॥ असंस्तुते पुंसि नराधिनाथे हासाय सन्देशवचो वधूनाम् । तत्रापि पाणिग्रहणाय कन्यावचोविकाशोऽपि विडम्बनाय ॥४०॥ बिना जान-पहचान के पुरुष के लिये, और विशेष कर राजा के लिये, किसी कुमारी का प्रणय- सन्देश वचन हास्यास्पद है। फिर कन्या का अपनी ओर से विवाह का प्रस्ताव तो और भी विड- म्बनापूर्ण है ॥४०॥ अतीव दुष्प्राप्यमनोरथेऽस्मिन्नाशा ङ्कुरस्यापि न मेऽवकाशः । अतः परं पञ्चशरस्य पञ्चसहस्रसङ्ख्या विशिखाः पतन्तु ॥४१॥ मेरे अत्यन्त दुष्प्राप्य इस मनोरथ में आशा के अंकुर उगने का कोई अवकाश नहीं है। अतः अब भले ही कामदेव के पाँच क्या पाँच हज़ार बाण भी मुझ पर पड़ें तो भी कोई चिन्ता नहीं ॥४१॥