भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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६८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् दिवोवतीर्णैर्हरिचन्दनानां निर्माय पर्णैरिह पर्णशालाः। वल्कं वसानैरमरद्रुमाणां तपोऽत्र चीर्णञ्चिरमादितैयैः ॥३६॥ स्वर्ग से लाये गये हरिचन्दन वृक्षों के पत्तों से यहाँ पर्णशालायें बना कर कल्पवृक्षों के चीवर पहनने वाले देवताओं ने यहाँ बहुत समय तक तप किया था ॥३६॥ मन्दाकिनी यत्र ममौ विधातुः कमण्डलौ मण्डलितप्रवाहा। तं कोटिशः पूरयतोप्यमुष्य न पूर्णता स्तोकमपि व्यपैति ॥३७॥ गंगा जी अपने प्राकट्य से पहले अपने उद्गम स्थान ब्रह्मा जी के कमण्डलु में समा कर उसी में चक्कर काटा करती थीं। ब्रह्मा जी के उस कमण्डलु को, जिसमें सारी गंगा जी एक बार में ही पूरी समा रही थीं, करोड़ों बार भर देने पर भी इस पुष्कर के जल में ज़रा भी कमी नहीं आई। (पुष्कर में ब्रह्मा जी का मन्दिर है और यह ब्रह्मा जी का ही तीर्थ माना जाता है। संध्यादि नियमों के लिये ब्रह्माजी अपने कमण्डलु को पुष्कर के जल से ही भरते हैं) ॥३७॥ उद्गायतामत्र समं चतुर्णां शृण्वन् मुखेभ्यश्चतुरोऽपि वेदान्। चतुर्मुखीकण्ठनिनादशङ्की चमत्कृतिं याति जरन्मरालः ॥३८॥ एक साथ चार ब्राह्मणों के चार मुखों से चारों वेदों की ध्वनि सुन कर वृद्ध हंस उसे अपने चार मुख वाले स्वामी ब्रह्माजी द्वारा कृत वेदपाठ समझ कर चौंक पड़ता है ॥३८॥ अन्तेवसन्तः कलशिञ्जितानां वाणीपदाम्भोरुहनूपुराणाम्। हिन्दोलनाकौतुकमन्वभूवन् हंसा विधेरस्य ततैस्तरङ्गैः ॥३९॥ अपने सुन्दर स्वरों के उच्चारण में सरस्वती के चरणकमलों के नूपुरों की ध्वनि से शिक्षा लेने वाले ब्रह्मा जी के हंस इस पुष्कर की विस्तृत तरंगों में झूला झूलने का आनन्द ले रहे हैं ॥३९॥ तीर्थान्तराणामपि कोटयोऽस्य सेवाविधिज्ञाः सविधे सदैव। अध्यासते साधयितुं स्वशक्तिं पुंसामसाधारणशुद्धिदात्रीम् ॥४०॥ अन्य करोड़ों तीर्थ, पुष्कर की सेवा में दत्तचित्त होकर लोगों को असाधारण शुद्धि देने वाली अपनी शक्ति को सिद्ध करने के लिये यहाँ सदा बैठे रहते हैं ॥४०॥ एकैकमस्मात् कमलं विचिन्वन् नवं नवं प्रत्यहमासनाय। सरोजिनीखण्डमखण्डरूपमपालयत् कौतुकतो विरिञ्चिः ॥४१॥ अपने आसन के लिये पुष्कर में से प्रति दिन एक नया कमल तोड़ने वाले ब्रह्मा जी ने कौतुक- वश इसमें कभी समाप्त न होने वाला कमलों का समूह लगा रक्खा है ॥४१॥ अत्रावदातं शतपत्रजातं भृङ्गैः क्वचित् मेचकितञ्चकास्ति। सव्योम शङ्के शरदभ्रखण्डं सूर्याशुतापात् पतितं पयःसु ॥४२॥ यहाँ पुण्डरीकों (सफेद कमलों) का समूह, काले भ्रमरों से युक्त होने के कारण, ऐसा (३७) गंगा विधेः कमण्डलोः प्रादुरासीत् ।