सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः ६७ सप्तापि गाधान् सरितामधीशानल्पप्रमाणान् पुरतः परीक्ष्य । क्रोडाविमर्दक्षममादिमेन क्रोडेन किं निर्मितमष्टमं वा ॥३०॥ अथवा क्या वराहावतार ने, सातों समुद्रों को परिमित और अल्प देख कर, अपनी गोद (शरीर) की टक्कर को सहने में समर्थ यह आठवाँ समुद्र बनाया है ? ॥३०॥ तं तत्र विश्रान्तदृशं धरित्रीपुरन्दरं वीक्ष्य पुरः पुरोधाः । प्रस्ताववित् प्रस्तुतवस्तुतत्त्वविवेचनीं वाचमिमां बभाषे ॥३१॥ बुद्धिमान् पुरोहित ने पृथ्वी के इन्द्र अनलदेव को एकटक गड़ी हुई दृष्टि से पुष्कर को देखते हुये देख कर प्रस्तुत वस्तु (पुष्कर) का वर्णन करने वाली यह वाणी कही ॥३१॥ त्रिधा विभक्तात्मतनोरमुष्य धृतावतारस्य जगद्धिताय । नामापि कामं समुदीर्यमाणं नारायणस्येव पुनाति विश्वम् ॥३२॥ संसार के हित के लिये अवतार ग्रहण करने वाले और जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय के लिये स्वयं को ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूपी