सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला १०१
धूप में छाया (करने वाली है)। इसी की ओट में (कृष्ण) शीत ऋतु की ठंडी सहते हैं। (इसी की सहायता से) कृष्ण हजारों स्त्रियो के आभूषण चुराकर इसी की ओट मे लाकर रखते हैं (अर्थात् छिपाते हैं)। यही जाति-पांति तथा परिपाटी सिखाती है। सूर के प्रभु कृष्ण के सब विश्रामों का यह एक मात्र उपाय है ॥५४॥ यह कमरी कमरी करि जानति । जाके जितनी बुद्धि हृदय मैं, सौ तितनौ अनुमानति । या कमरी कैं एक रोम पर, वारौं चीर पटंबर । सो कमरी तुम निंदति गोपी, जो तिहुँ लोक अडंबर । कमरी कैं बल असुर संहारे, कमरिहिं तैं सब भोग । जाति-पाँति कमरी सब मेरी, सूर सबै यह जोग ॥५५॥ अर्थ- इस कमरी को (कुछ लोग) केवल कमरी ही करके जानते हैं। जिसके हृदय में जितनी बुद्धि है वह उतना ही अनुमान लगाता है। इस कमरी के एक रोम पर चीर तथा रेशमी वस्त्र न्योछावर कर दूँ। गोपी उसी कमरी की तुम निन्दा करती हो जो तीनों लोकों का आच्छादन है। कमरी के बल से असुरों का नाश किया । कमरी ही से सभी भोग हैं। मेरी जाति-पाँति सब कुछ कमरी ही है। सूरदास कहते हैं कि यही सब प्रकार का योग है ॥५५॥ चीर-हरन भवन रवन सबही बिसरायौ । नँद-नंदन जब तैं मन हरि लियौ, बिरथा जनम गँवायौ । जप, तप, व्रत, संजम, साधन तैं, द्रवनि होत पाषान । जैसे मिलै स्याम सुंदर बर, सोइ कीजै, नहिं आन । यहै मंत्र दृढ़ कियौ सबनि मिलि, यातैं होइ सुहोइ । वृथा जनम जग मैं जिनि खोवहु, ह्याँ अपनी नहिं कोइ । तब प्रतीत सबहिनि कौं आइ, कीन्हौ दृढ़ बिस्वास । सूर स्यामसुंदर पति पावैं, यहै हमारी आस ॥५६॥ अर्थ- सभी गोपियो ने घर और पति को भुला दिया। जब से नन्द के पुत्र कृष्ण ने मन हर लिया (तब से लगता है कि) सारा जीवन व्यर्थ है। जप, तप, व्रत संयम तथा (अन्य) साधनो से पत्थर पिघल जाता है। जैसे कृष्ण वर (पति) के रूप मे मिले, वही कीजिए, दूसरा कुछ नही। सब गोपियो ने मिलकर यही मन्त्र दृढ किया इसी से जो होगा, सो होगा । संसार मे व्यर्थ में जन्म मत खोओ, यहाँ पर अपन कोई नही है। तब सभी को ज्ञान आया तथा सब ने दृढ विश्वास कर लिया। सूरदास कहते हैं श्यामसुन्दर हमे (गोपियो को) पति रूप मे मिलें यही हमारी आशा है ॥५६॥ जमुना तट देखे नंद नदन । मोर-मुकुट मकराकृत-कुंडल, पीत-बसन तन चंदन ।