सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ सूरसागर सार सटीक लोचन तृप्त भए दरसन तैं उर की तपनि बुझानी । प्रेम-मगन तब भईं सुंदरी, उर गदगद, मुख-बानी । कमल-नयन तट पर हैं ठाढे, सकुचहिं मिलि ब्रज नारी । सूरदास-प्रभु अंतरजामी, व्रत-पूरन पगधारी ॥५७॥ अर्थ-(गोपियो ने) कृष्ण को यमुना के तट पर देखा । (सिर पर) मोर का मुकुट, (कान मे) मकर के आकार का कुण्डल, शरीर मे पीताम्बर तथा चन्दन धारण करने वाले (कृष्ण) के दर्शन से आंखे तृप्त हो गयी तथा हृदय की तपन बुझ गयी । तब सुन्दरियां प्रेम मे डूब गईं तथा उनके हृदय गद्गद् हो गये । वाणी, मुख मे ही रह गयी । कमल के समान नेत्र वाले कृष्ण तट पर खडे हैं, मिलने से ब्रज की स्त्रियो में संकोच हो रहा है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अन्तर की बात जानने वाले हैं, उन्होने व्रत पूरा करने के लिए कदम बढाया ॥५७॥ बनत नहिं जमुना कौ ऐबौ । सुंदर स्याम घाट पर ठाढे, कहौ कौन विधि जैबौ । कैसेँ बसन उतारि धरैँ हम, कैसेँ जलहिं समैबौ । नंद नंदन हमकौँ देखैंगै, कैसेँ करि जु अन्हैबौ । चोली, चीर, हार लै भाजत, सो कैसेँ करि पैबौ । अकन भरि-भरि लेत सूर प्रभु, काल्हि न इहिं पथ ऐबौ ॥५८॥ अर्थ-यमुना का आना (हम गोपियों के लिए) ठीक नही लगता है । सुन्दर कृष्ण घाट पर खडे हैं, कहो किस तरह जाना होगा । हम लोग वस्त्रों को उतारकर कैसे रखे और जल मे कैसे पैठे । कृष्ण हम लोगों को देखेगे (इस दशा मे) स्नान कैसे होगा । चोली, चीर, हार लेकर (कृष्ण) भागते हैं । इन सब को कैसे पायेगे । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण (सब गोपियो) को गोद मे भर लेते हैं (आलिंगन कर लेते हैं) कल इस रास्ते से आना नही होगा ॥५८॥ नीकैं तप कियौ तनु गारि । आपु देखत कदम पर चढि, मानि लियौ मुरारि । वर्ष भर व्रत-नेम-संजम, श्रम कियौ मोहिं काज । कैसे हूँ मोहिं भजै कोऊ, मोहिं विरद को लाज । धन्य व्रत इन कियौ पूरन, सीत तपति निवारि । काम-आतुर भजीँ मोकौँ, नव तरुनि ब्रज-नारि । कृपा-नाथ कृपाल भए तब, जानि-जन की पीर । सूर-प्रभु अनुमान कीन्हौँ, हरौँ इनके चीर ॥५६॥ अर्थ-शरीर को गलाकर (गोपियो) ने बहुत तप किया । (कृष्ण ने) कदम पर चढ़कर (जब) देखा तब उनकी (तपस्या) को मान लिया । (कृष्ण कहते है) पूरे साल (तुम लोगो ने) मेरे लिए व्रत, नियम तथा संयम किया । मुझे किसी भी तरह कोई