भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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१०४ सूरसागर सार सटीक अब अंतर मोसों जनि राखहु, वार-वार हठ वृथा करौ । सूर स्याम कह्यौ चीर देत हौं, मौ आगें सिंगार करौ ॥६२॥ अर्थ--(कृष्ण गोपियो से कहते हैं) यह लाज का अन्तर दूर कर दो। जो मैं कहूँ वही करो, तुम बेचारी संकोच क्यो करती हो । जल से तीर पर आकर हाथ जोड़ो। तुम लोग विनय करो हम देखें । अब तुम्हारे व्रत पूरे हो गये, गुरुजनों की शंका दूर कर दो । अब हमसे कोई भेद न रखो । वार-वार व्यर्थ ही हठ करती हो । सूरदास कहते हैं (कृष्ण ने कहा) चीर दे रहा हूँ मेरे सामने श्रृङ्गार करो ॥६२॥ ब्रत पूरन कियौ नंद-कुमार । जुवतिनि के मेटे जंजार ॥ जप तप करि अब जनि तन गारौ । तुम घरनी मैं कंत तुम्हारौ ॥ अंतर सोच दूरि करि डारौ । मेरो कह्यौ सत्य उर धारौ ॥ सरद-रास तुम आस पुराऊँ । अकन भरि सबकौं उर लाऊँ ॥ यह सुनि सब मन हरष बढ़ायौ । मन-मन कह्यौ कृस्न पति पायौ ॥ जाहु सब घर घोष कुमारी । सरद-रास दैहौँ सुख भारी ॥ सूर स्याम प्रगटे गिरिधारी । आनंद सहित गईं घर नारी ॥६३॥ अर्थ-नन्द कुमार कृष्ण ने (युवतियों के) व्रत को पूरा कर दिया। तथा उनके (सब) जंजाल को मिटा दिया । (कृष्ण कहते है) अब जप-तप करके अपने शरीर को गलाओ मत । तुम पत्नी हो मैं तुम्हारा पति हूँ। अन्तर की चिन्ता को दूर कर डालो। मेरे कहने को सत्य मानकर हृदय मे धारण करो । शरद के रास मे तुम्हारी आशा पूरी करूँगा, गोद मे भरकर सबको हृदय से लगाऊँगा । यह सुनकर सब के मन का हर्ष बढ़ गया । (वे) अपने-अपने मन मे कहने लगी कि कृष्ण पति रूप मे मिल गये । सब गोपियां अपने घर जाओ। शरद के रास मे भरपूर सुख दूँगा । सूरदास कहते है कि कृष्ण के प्रकट होने पर गोपियां आनन्द सहित अपने घर गयी ॥६३॥ गोवर्द्धन धारण वाजति नद-अवास वधाई । बैठे खेलत द्वार आपनैं, सात वरस के कुँवर कन्हाई । बैठे नंद सहित वृषभानुहिं, और गोप बैठे सब आई । थापैं देत घरनि के द्वारैँ, गावर्ति मंगल नारि वधाई । पूजा करत इंद्र की जानी, आए स्याम तहाँ चतुराई । बार वार हरि बूझत नंदहिं, कौन देव की करत पुजाई । इंद्र बड़े कुल-देव हमारे, उनतैं सब यह होति बड़ाई । सूर स्याम तुम्हरे हित कारन, यह पूजा हम करत सदाई ॥६४॥ अर्थ- नन्द के घर वधाई बजती है। सात वर्ष के कृष्ण द्वार पर बैठे खेल रहे हैं। नन्द के साथ वृषभानु बैठे है, अन्य गोप भी आकर बैठ गये । स्त्रियां घर के द्वारों पर थाप देती हैं और मङ्गल तथा वधाई गा रही हैं। (उन्हे) इन्द्र की पूजा करते हुए