सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला १०५ जानकर कृष्ण आतुर होकर वहाँ आये । बार-बार कृष्ण नंद से पूँछते है कि किस देवता की पूजा कर रहे हो । (नंद उत्तर देते हैं) इंद्र हमारे बड़े कुल देवता हैं उन्ही से इतनी बड़ाई होती है । कृष्ण तुम्हारे ही हित के लिए, यह पूजा हम सदा करते है ॥५४॥ मेरौ कह्यौ सत्य करि जानौ । जौ चाहौ ब्रज की कुसलाई, तौ गोबर्धन मानौ । दूध दही तुम कितनी लैहौ, गोसुत बढ़ें अनेक । कहा पूजि सुरपति सैं पायौ, छांड़ि देहु यह टेक । मुँह माँगे फल जौ तुम पावहु, तौ तुम मानहु मोहिं । सूरदास प्रभु कहत ग्वाल सौं, सत्य बचन करि दोहिं ॥६५॥ अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) मेरी बात सत्य करके जानो । यदि ब्रज की कुशलता चाहते हो तो गोवर्धन को (देवता की तरह) मानो । दूध, दही तुम कितना (भी) लो, गायों के बछड़े अनेक प्रकार से बढ़ेंगे । इंद्र की पूजा से तुम लोगो ने क्या पाया, यह टेक छोड़ दो । मुँह मांगा फल यदि तुम पाओ तो मेरा कहना सही मानो । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ग्वालो को सौगन्ध खाकर समझाते है कि बात सत्य है ॥६५॥ बिप्र बुलाइ लिए नँदराइ । प्रथमारम्भ-जज्ञ कौ कीन्हौ, उठे बेद-धुनि गाइ । गोबर्धन सिर तिलक चढ़ायौ, मेटि इंद्र ठकुराइ । अन्नकूट ऐसौ रुचि राख्यो, गिरि की उपमा पाइ । भाँति-भाँति व्यंजन परसाएँ, कापैं बरन्यो जाइ । सूर स्याम सौं कहत ग्वाल गिरि जेवहिं कहौ बुझाइ ॥६६॥ अर्थ—नन्द ने ब्राह्मणो को बुला लिया । पहले यज्ञ का आरम्भ किया, (सब) वेद की ध्वनि गा उठे । इंद्र के स्वामित्व को मिटाकर गोवर्धन के सिर पर तिलक लगाया । अन्न के पिण्ड को इस प्रकार बनाया जो पर्वत की उपमा पाए । तरह-तरह के भोजन को परोसा जिसका वर्णन किससे किया जा सकता है। सूरदास कहते हैं कि ग्वाल, कृष्ण से कह रहे है कि पर्वत को समझा कर कहो कि वह जेए (खाना खाए) ॥६६॥ गिरिबर स्याम की अनुहारि । करत भोजन अधिक रुचि यह, सहस भुजा पसारि । नंद कौ कर गहें ठाढ़े, यहै गिरि कौ रूप । सखी ललिता राधिका सौं, कहति देखि स्वरूप । यहै कुंडल, यहै माला, यहै पीत पिछौरि । सिखर सोभा स्याम की छवि, स्याम-छवि गिरि जोरि । नारि बदरौला रही, वृषभानु-घर रखवारि । तहाँ तैं उहिं भोग अर्प्यौ, लियौ भुजा पसारि ।