भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

१०६ सूरसागर सार सटीक राधिका-छवि देखि भूली, स्याम, निरखैँ ताहि । सूर प्रभु-बस भई प्यारी, कोर-लोचन चाहि ॥६७॥ अर्थ - श्रेष्ठ पर्वत (गोवर्द्धन) कृष्ण के ही समरूप है। यह अपनी हजारो भुजा पसार कर भोजन करता है । नन्द का हाथ पकड़े खडे यही गिरि का रूप है । सखी ललिता राधा से इस रूप को देखकर कहती है । यही कुण्डल, यही माला, यही पीताम्बर पर्वत की शोभा है जो कृष्ण की भी है । बदरीला नाम की नारी वृषभानु के घर की रखवाली करती थी उसने वही से भोग चढ़ाया उसे भुजा पसार कर ले लिया । राधिका इस छवि को देखकर भूल गयी, कृष्ण उन्हे देख रहे हैं । सूरदास कहते है कि प्यारी (राधा) नेत्र के कटाक्ष से देखकर कृष्ण के वश मे हो गयी ॥६७॥ ब्रज बासिनि मोकौँ विसरायो । भली करी बलि मेरी जो कछु, सो सब लै परबतहिं चढ़ायौ । मोसौँ गर्व कियौ लघु प्रानी, ना जानियै कहा मन आयौ । तैँतिस कोटि सुरनि कौ नायक, जानि-बूझि इन मोहिँ भुलायौ । अब गोपनि भूतल नहिँ राखौँ, मेरो बलि मोहिँ नहिँ पहुँचायौ । सुनहु सूर मेरैँ मारत धौँ, परबत कैसेँ होत सहायौ ॥६८॥ अर्थ--ब्रज वासियो ने मुझे (इंद्र को) भुला दिया । अच्छा किया जो मेरी बलि थी उसे लेकर सब पर्वत को चढा दिया । छोटे प्राणियों ने मुझसे गर्व किया । उनके मन मे न जाने क्या (भावना) आयी । तैंतीस करोड देवताओ के नायक को जान-बूझकर इन लोगों ने भुला दिया । अब गोपो को धरती पर नही रहने दूंगा क्योकि उन्होने हमारी बलि हमारे पास नही पहुँचायी । सूरदास कहते है (इन्द्र कहते हैं) मेरे मारते समय देखता हूँ पर्वत कैसे सहायक होता है ॥६८॥ गिरि पर वरषन लागे बादर । मेघवर्त्त, जलवर्त्त, सैन सजि, आए लै लै आदर । सलिल अखड धार धर टूटत, किये इद्र मन सादर । मेघ परस्पर यहै कहत हैं, धोइ करहु गिरि खादर । देखि देखि डरपत ब्रजवासी, अतिहिँ भए मन कादर । यहै कहत ब्रज कौन उबारै, सुरपति कियैँ निरादर । सूर स्याम देखैँ गिरि अरनैँ, मेघनि कीन्ही दादर । देव आपनौ नहीं सम्हारत, करत इद्र सौ ठादर ॥६६॥ अर्थ--पर्वत पर बादल बरसने लगे । मेघवर्त्त तथा जलवर्त्त नामक प्रलयकालीन मेघ अपनी सेना सजाकर आदर पूर्वक लाये । अखंड पानी की धारा से पृथ्वी टूटने लगी । (इससे) बादलो ने आदरपूर्वक इंद्र के मन की बात पूरी की। मेघ आपस मे यही कहते है कि पर्वत को धोकर नीची जमीन मे बदल दो । देख-देखकर ब्रज के निवासी डरने लगे तथा वे मन से बहुत अधीर हो गये । (वे) यही कहते है कि देवराज का