भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

वृन्दावन लीला १०७ अनादर करने पर ब्रज की रक्षा कौन करेगा ? सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अपने गिरि को देखे । बादलो ने निर्णय कर लिया है। (तुम लोग) अपने देवता को नही सम्हालते और इन्द्र से झगड़ा करते हो ॥६६॥ ब्रज के लोग फिरत बितताने । गयनि लै बन ग्वाल गए, ते धाए आवत ब्रजहिँ पराने । कोउ चितवत नभ-तन चक्रित ह्वै, कोउ गिरि परत धरनि अकुलाने । कोउ लै रहत ओट वृच्छि की, अंध-धुध दिसि बिदिस भुलाने । कोउ पहुँचे जैसेँ तैसेँ गृह, कोउ ढूँढ़त गृह नहिँ पहिचाने । सूरदास गोबर्धन-पूजा, कीन्हे कौ फल लेहु बिहाने ॥७०॥ अर्थ— ब्रज के लोग व्याकुल होकर घूम रहे है। गायो को लेकर जो ग्वाल वन में गये थे वे ब्रज को दौड़ते हुए चले आ रहे है। कोई चकित होकर नभ की ओर देखता है, कोई धरती पर आकुल होकर गिर पड़ता है। कोई वृक्षों की ओट लेता है, अँधेरे के धुंध मे दिशाये भूल गईं। कोई जैसे-तैसे घर पहुँचा और कोई ढूंढता हुआ (अपना) घर ही नही पहचान पा रहा है। सूरदास कहते हैं कि गोवर्द्धन पूजा का फल (तुम लोग) शीघ्र लो ॥७०॥ राखि लेहु अब नंदकिसोर । तुम जौ इंद्र की मेटी पूजा, बरसत है अति जोर । ब्रजवासी तुम तन चितवत हैं, ज्यौँ करि चंद चकोर । जनि जिय डरौँ नैन जनि मूंदौ, धरिहौँ नख की कोर । करि अभिमान इंद्र झरि लायौ, करत घटा घनघोर । सूर स्याम कह्यौ तुम कौँ राखौँ, बूँद न आवै छोर ॥७१॥ अर्थ (ब्रजवासी कृष्ण से निवेदन करते हैं) कृष्ण अब रक्षा करो । तुमने जो इंद्र की पूजा मिटायी (इसी से) बहुत जोर से बरस रहा है। ब्रजवासी तुम्हारी ओर उसी तरह से देखते हैं जैसे चकोर चन्द्रमा की तरफ (देखता है) । (कृष्ण ने कहा) मन मे डरो मत, न तो आंख मूंदो । नाखून की कोर से (पर्वत को) धारण करुँगा । इन्द्र अभिमान करके लगातार वर्षा कर रहा है और घनघोर घटा कर रहा है। पर मैं तुम्हारी रक्षा करुँगा और एक बूंद भी न आएगी ॥७१॥ स्याम लियौ गिरिराज उठाइ । धीर धरौ हरि कहत सबनि सौँ, गिरि गोबर्धन करत सहाइ । नन्द गोप ग्वालनि के आगैँ, देव कह्यौ यह प्रगट सुनाइ । काहे कौँ व्याकुल भएँ डोलत, रच्छा करै देवता आइ । सत्य बचन गिरि-देव कहत हैं, कान्ह लेहि मोहिँ कर उचकाइ । सूरदास नारी-नर ब्रज के, कहत धन्य तुम कुँवर कन्हाइ ॥७२॥